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नाना: अभिनय, विचार और जुनून का समन्वय

नाना पाटेकर सिर्फ अभिनेता नहीं, जुनून और विचारों की जीवंत मिसाल थे। ‘क्रांतिवीर’ के संवादों से लेकर ‘प्रहार’ के सैन्य अनुशासन तक, उन्होंने हर किरदार को जिंदगी दी। अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार नाना ने किसानों के लिए अपनी जेब भी खाली कर दी। कला, देश और समाज के प्रति उनका समर्पण उन्हें सबसे अलग बनाता है। नाना चले गए, लेकिन उनकी आवाज, विचार और किरदार हमेशा जिंदा रहेंगे।
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Oct 11, 2026
Nana Patekar
Nana Patekar

प्रो. अमिताभ श्रीवास्तव

( लेखक राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय में संस्कृति एवं मीडिया विभाग में आचार्य और सामाजिक विज्ञान संकाय के अध्यक्ष हैं)

मोनोलॉग के दीवानों के लिए वो ‘क्रांतिवीर’थे। जब लगा पल भर में दिल से निकले शब्दों के बौछार पहचान बन गई है, ‘खामोशी’ में मूक हो गए। ‘परिंदा’ ने साइको विलेन का ठप्पा लगा दिया, तो कॉमेडी में ‘वेलकम’ हो गया। सेना के सम्मान में ‘प्रहार’ किया, तो जीवन के अंतिम समय तक किसानों के प्यासे खेतों के लिए पानी भी जुटाते रहे। मुलायम दिल, जबरदस्त आवाज और जुनून की जिंदगी जीने वाले नाना चले गए। नाना के जाने का अर्थ उनकी मौजूदगी खत्म या कम हो जाना नहीं है क्योकि शब्द ब्रह्म होते हैं और कला शाश्वत। और नाना तो दोनों में सिद्धहस्त थे। नाना ने कभी खुद से उस बच्चे जाने नहीं दिया जो कला से शिद्दत से प्यार करता था। जेजे स्कूल ऑफ आट्र्स से अध्ययन किया। एडवरटाइजिंग एजेंसी में विज़ुअलाइजर भी बने। साथ-साथ जीवन में नाटक के प्रति प्यार परवान चढ़ता रहा। सामने दोराहा था-नौकरी या नाटक? प्यार को चुना। बाद में मराठी थिएटर अभिनय की वे बारीकियां सीखीं जिसने पुरुष जैसे नाटकों के जरिए रंगकर्म को ही समृद्ध नहीं किया बल्कि सिनेमा की दुनिया को एक नई गहराई दी।
अभिनय को कर दिया जीवंत
सिनेमाई दुनिया में सशक्त हस्ताक्षर बनने के बावजूद नाटक से प्यार बरकरार रहा। सायास कहें या अनायास ऐसे कई किरदार निभाए जो नाटक से जुड़े थे। इनमें नटसम्राट और वजूद अहम है। अपने मन की दुनिया को संवादों और शारीरिक अभिनय से जीवंत कर देना उनकी विशेषता रही। वैसे फिल्मी में अभिनय की शुरुआत ‘गमन’ से हुई जो नेगेटिव शेड लिए किरदार था। पर पहली बड़ी पहचान मिली ‘अंकुश’ से जो कनून को हाथ में लेने वाले युवाओं से सीधे संवाद करती है, उनके मन को पढ़ती है और ख़ुद पर अनुशासन का अंकुश रखने का अहसास कराती है, जो युवा ‘गज शक्ति’ को समाज तोडऩे में नहीं, सृजन में लगा सके।
अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार
देखा जाए तो नाना के जिए कई किरदार उनकी जिंदगी से जुड़े थे। ‘प्रहार’ फिल्म में कमांडो के किरदार को जिस शिद्दत से जिया, बच्चों को सेना की सोच और सैन्य अनुशासन देने की वकालत की, दशकों बाद भी प्रभाव कायम रखने वाला वह अभिनय दुर्लभ है। प्रहार जैसी फिल्म कोरे वाचिक आंगिक अभिनय से नहीं आती। क्या यह आसान है कि एक अभिनेता वास्तविक जीवन में भी सैनिक ट्रेनिंग ले, उसके बाद कारगिल युद्ध हो जाने पर सैनिक ट्रेनिंग का अनुभव दिखाकर जॉर्ज फर्नांडीज जैसे जीवट रक्षा मंत्री से जिद करे और आखिरकार इस युद्ध में क्विक रिएक्शन टीम का सदस्य बन सीमा की रक्षा करे । सैन्य जीवन से उनका रिश्ता उनके जीवन का एक और एक और अदभुत समन्वय सामने लाता है। एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी के घोर पैरोकार की कि जो जी आया वो बोला, जिससे बोलना हो उससे बोला और जितना जी आया उतना बोला। ‘खून देख कर बता यह हिंदू का या मुसलमान का’ जैसी ऊर्जाभरी डायलॉग डिलिवरी के बाद वे ही 26/11 में कसाब को तैयार करने वाली धर्मांध सोच के खिलाफ भारत के विचार का बड़े पर्दे पर प्रतिनिधित्व कर सकते थे। शायद इसीलिए अमिताभ बच्चन उनको हस्तलिखित पत्र भेजकर उनके अभिनय का खुद को प्रशंसक बताते हैं। वास्तव में नाना के विचार विपरीत ध्रुव नहीं थे, वह समन्वय था जो सोच को समग्र बनाता है।

किसानों के लिए कर दी जेब खाली
इस सोच को कायम रखने के लिए उन्होंने वो त्याग किए, जो आज कठिन हैं। प्रलोभन भरे राजनीतिक प्रस्ताव न आए हों ऐसा संभव नहीं। वैचारिक झुकाव संभव है, पर हर राजनीतिक दल से सुरक्षित दूरी रखी। दशकों की लोकप्रियता अदभुत डायलॉग डिलीवरी और काम करने का कमिटमेंट। किस दल को नहीं चाहिए होगा ये सब? पर नाना को ये लगा वे नेता हो गए तो नाना नहीं रह पाएंगे। लोगों ने पागल भी कहा, नाना ख़ुद को कई भी बार यही कहते थे। डायरेक्टर तक से बर्तन तक मंजवा दिए, पर अपना घर देकर फिल्म भी पूरी कराई। तभी तो जब तिरंगा में अब अपने तेवर के लिए जाने वाले राजकुमार से उनके भिड़ंत की कोशिश कराई गई, नाकाम रही। उन्हें समझने के लिए याद कीजिए प्रतिघात का वह फटे कपड़े वाला पागल जो कुटिल राजनेताओं द्वारा निर्वस्त्र कर दी गई महिला का शरीर तिरंगे से ढक देता है। उस पल सिनेमा हाल में सिहरन हो जाती थी। मी टू मूवमेंट के दौरान व्यक्तिगत जीवन में आरोप भी लगे। कितने सच थे कितने स्टंट या तो वे दो समाज के सामने आ कर बता सकते थे या अदालत के। जो भी हो सृजन, सैन्य जीवन और समाज के प्रति उनके योगदान की विरोधी भी अनदेखी नहीं कर सकते। उनके तेवर विचार, कला और कलाकारों को प्रतिष्ठा से जुड़ा थे। जिसे पागलपन कहा गया वो कला, विचार देश के प्रति जुनून था। फिल्म के लिए मुंह मांगी कीमत मांगने वाला कलाकार जीवन के आखिरी वर्षों में किसानों के तालाब भरने कीलिए अपनी जेब खाली करता रहा। कला-प्रतिभा समाज देश के लिए कुछ करे, यह उन्होंने बस कहा नहीं, कर के दिखाया। तुम्हें भूलना नामुमकिन है नाना!

Updated on:
11 Oct 2026 04:21 pm
Published on:
11 Oct 2026 04:07 pm