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विदेश में जन्मीं और भारत में जनता की सेवा में हो गईं समर्पित

वर्ष 1899 में कलकत्ता में फैली प्लेग की बीमारी में उन्होंने अपने आप को खतरे में डालते हुए भी आमजन की निरंतर सेवा की। पंडित रामकृष्ण परमहंस की सहधर्मिणी मां शारदा, निवेदिता को अपनी पुत्री मानती थीं।
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Updated: 28 Oct 2026, 6:14 PM IST
भगिनी निवेदिता
भगिनी निवेदिता

भारत माता को आदर्श जननी मानते हुए राष्ट्र सेवा के लिए समर्पित प्रेरक व्यक्तित्व भगिनी निवेदिता का जन्मदिन सेवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। 28 अक्टूबर,1867 को उत्तर आयरलैंड के टायरोन प्रान्त के उपनगर डन्गानान में जन्मी मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल भारतीय संस्कृति और संस्कारों से बहुत प्रभावित थीं। स्वामी विवेकानंद के मानवता की सेवा के आह्वान ने उनको इतना प्रेरित किया कि वे भारतीय जनता की सेवा में 'निवेदित' हो गईं।पादरी दादा और पिता की संतान, मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल बचपन से ही गरीबों की सेवा में रुचि लेती थीं। उनके जीवन में महत्वपूर्ण क्षण तब आया जब उनकी एक मित्र ने उनकी भेंट स्वामी विवेकानंद से भारतीय साधु के रूप में कराई। स्वामीजी के उपदेश 'प्रत्येक धर्म ईश्वर तक पहुंचने का माध्यम है' ने निवेदिता को बहुत प्रभावित किया। भारतीय महिलाओं के कल्याण तथा शिक्षा के लिए विभिन्न योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए स्वामीजी द्वारा उन पर जताए गए विश्वास कि- 'तुम्हें संसार को परिवर्तित करने के लिए अपने आपको तैयार करना है, हे महान् आत्मा! जागो', ने मार्गरेट को अपना देश छोड़ भारत आने का साहस प्रदान किया।

28 जनवरी 1898 को वह कलकत्ता पहुंचीं। स्वामीजी ने उन्हें ब्रह्मचारिणी की दीक्षा दी और निवेदिता नाम दिया। कलकत्ता के लोगों में भगिनी निवेदिता लोकप्रिय हो गईं। उन्होंने बंगाली भाषा सीखी, साहित्य पढ़ा। स्वामीजी की दो अमरीकी शिष्याएं सारा सी बुल और जोसेफिन मैक लियोड भी भारत आईं और भगिनी निवेदिता की सहेलियां बन गईं। उनकी कुटिया आश्रम बन गई। स्वामीजी ने उन्हें मंत्र दिया- भारत से प्यार करो, भारत की पूजा करो यही सब कुछ है। इस मंत्र की पालना में जीवन समर्पित करने का नाम ही भगिनी निवेदिता है। यह समर्पण अपने आदर्श स्वामी विवेकानंद के पदचिह्नों पर चलते हुए भारत की सेवा करने का है। भारत भूमि को अपनी कर्मभूमि स्वीकारते हुए उन्होंने वर्ष 1898 में कलकत्ता में बालिकाओं के लिए निवेदिता पाठशाला प्रारंभ की। भगिनी निवेदिता का कहना था कि भारतीय स्त्रियों के लिए एक ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जिसका उद्देश्य मानसिक और आध्यात्मिक वृत्तियों में परस्पर सहयोगात्मक विकास करना हो। उन्होंने मातृभाषा पर गर्व करने और प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा तथा साहित्य को विभिन्न भारतीय भाषाओं में रचकर आमजन के समक्ष मुखर करने की प्रेरणा दी। उन्होंने भारत में अनेक स्थानों का भ्रमण किया। उस समय के प्रमुख लोगों से मिलने, उन्हें बहन-मां जैसा स्नेह प्रदान करने और भारत की सेवा के लिए प्रवृत्त करने का कार्य किया। वर्ष 1899 में कलकत्ता में फैली प्लेग की बीमारी में उन्होंने अपने आप को खतरे में डालते हुए भी आमजन की निरंतर सेवा की। पंडित रामकृष्ण परमहंस की सहधर्मिणी मां शारदा, निवेदिता को अपनी पुत्री मानती थीं।

रामकृष्ण मिशन की आर्थिक सहायता के लिए निवेदिता ने कई देशों की यात्रा की। स्वामीजी से प्राप्त दृष्टिकोण से उन्होंने तत्कालीन भारत की दुर्दशा को देखा और आवश्यक राष्ट्रीय भाव की प्रेरणा जाग्रत करने के लिए उस समय के प्रख्यात विभिन्न देशी और विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में प्रेरक लेखन कार्य किया। उस समय के भारतीय क्रांतिकारियों के वह निरंतर संपर्क में थीं।चाफेकर बंधुओं के बलिदान के उपरांत वह उनकी माताजी से मिलीं और उनकी चरण-रज को माथे पर लगाया। उस समय के इतिहासकारों रमेशचंद्र दत्त और यदुनाथ सरकार को उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास लिखने का परामर्श दिया। दार्जिलिंग भ्रमण के समय उनका स्वास्थ्य खराब हुआ और 13 अक्टूबर 1911 को वह अनंत में विलीन हो गईं। उनकी समाधि पर अंकित है- 'यहां भगिनी निवेदिता चिर निद्रा में सो रही हैं, जिसने भारत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।'

नर्बदा इंदौरिया,(अतिरिक्त निदेशक, सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, राजस्थान)

Updated on:
28 Oct 2026, 6:14 PM IST
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