
सीमाएं दो देशों को अलग जरूर करती हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा और जनजीवन के स्तर पर उन्हें जोड़ती भी हैं। बांग्लादेश इसका स्पष्ट उदाहरण है। तीन ओर से भारत से घिरा होने के कारण उसके अनेक आर्थिक और सामरिक हित स्वाभाविक रूप से भारत से जुड़े हैं। इसलिए भारत-बांग्लादेश संबंध विदेश नीति के साथ बांग्लादेश की आर्थिक स्थिरता और आम नागरिकों के हितों से भी सीधे जुड़ा प्रश्न है। इसी पृष्ठभूमि में ढाका की मौजूदा राजनीतिक और कूटनीतिक स्थिति कई सवाल खड़े करती है। प्रधानमंत्री तारीक रहमान के भारत दौरे के निमंत्रण पर लंबे समय से विचार किए जाने और इसके लिए नई दिल्ली द्वारा कथित रूप से 'अनुकूल वातावरण' तैयार करने की अपेक्षा यह संकेत देती है कि ढाका उच्चस्तरीय संवाद को कुछ राजनीतिक शर्तों से जोड़कर देख रहा है। समानता, संप्रभुता और पारस्परिक सम्मान किसी भी स्वस्थ द्विपक्षीय संबंध के आवश्यक आधार हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन सिद्धांतों को सभी साझेदार देशों के साथ समान रूप से लागू किया जा रहा है? यदि भारत के साथ संबंधों में राष्ट्रीय गरिमा और समानता रहमान की सर्वोच्च कसौटी हैं, तो चीन के साथ संबंधों में वही कसौटी उतनी कठोर क्यों नहीं दिखाई देती?
रहमान की चीन यात्रा के दौरान दिखाई गई राजनयिक गर्मजोशी और आर्थिक सहयोग की तत्परता इस प्रश्न को और महत्वपूर्ण बनाती है। इससे यह धारणा बन रही है कि रहमान भारत के संदर्भ में अधिक कठोर मानदंड और अन्य शक्तियों के संदर्भ में अपेक्षाकृत लचीला रवैया अपना रहे हैं। बांग्लादेश को भारत से शिकायतें हैं तो उन्हें व्यक्त करने का उसे पूरा अधिकार है। सीमा, जल, व्यापार, वीजा, सुरक्षा या किसी अन्य मुद्दे पर ढाका अपनी असहमति स्पष्ट रूप से रख सकता है। किसी संप्रभु पड़ोसी की वैध चिंताओं को गंभीरता से लेना भारत के अपने हित में भी है। लेकिन परिपक्व कूटनीति में शिकायत संवाद का विकल्प नहीं, बल्कि संवाद का आधार होती है।
वर्तमान तनाव पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना से जुड़ा है। अगस्त 2024 की राजनीतिक उथल-पुथल के बाद उनके भारत आने और उसके बाद ढाका द्वारा लगातार प्रत्यर्पण की मांग ने द्विपक्षीय संबंधों को जटिल बना दिया है। भारत से हसीना के सार्वजनिक वक्तव्यों ने बांग्लादेश की वर्तमान सरकार को असहज किया है। ढाका का तर्क है कि भारतीय भूमि से बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति पर की जाने वाली टिप्पणियां संबंधों के पुनर्निर्माण में बाधा डाल रही हैं। इसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। किसी पड़ोसी देश में पूर्व शासक की राजनीतिक सक्रियता वर्तमान सरकार के लिए संवेदनशील विषय हो सकती है। किंतु प्रत्यर्पण जैसे गंभीर विषय का निर्णय राजनीतिक दबाव या नाराजगी के आधार पर नहीं, बल्कि कानूनी दायित्वों के अनुसार होना चाहिए। भारत से शीघ्र निर्णय की अपेक्षा एक राजनयिक मांग हो सकती है, लेकिन किसी उच्चस्तरीय यात्रा को उसी निर्णय की पूर्व-शर्त बना देना अनुचित है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह हसीना के राजनीतिक वक्तव्यों का समर्थन नहीं करता।
इसके बावजूद यदि ढाका पहले 'अनुकूल वातावरण' और उसके बाद उच्चस्तरीय यात्रा की बात करता है, तो रहमान की यात्रा, जो संवाद और विश्वास बहाली का माध्यम बन सकती थी, विवाद का विषय बन गई है। इससे कूटनीति में 'पहले आप' की मानसिकता पैदा होती है, दोनों पक्ष एक दूसरे से पहल की अपेक्षा करते रहते हैं और वास्तविक समस्याएं समाधान से दूर होती जाती हैं। बांग्लादेश के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि संप्रभुता का अर्थ पड़ोसी से दूरी बनाना नहीं है। चीन, भारत, अमरीका, जापान या किसी अन्य शक्ति के साथ संबंध विकसित करना ढाका का संप्रभु अधिकार है। लेकिन किसी एक शक्ति के साथ निकटता को दूसरे पड़ोसी पर राजनीतिक दबाव बनाने के साधन के रूप में इस्तेमाल करना दीर्घकाल में बांग्लादेश के अपने हितों के विरुद्ध जा सकता है। बांग्लादेश की वास्तविक ताकत संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति में है। संतुलन और झुकाव में स्पष्ट अंतर है। संतुलन का अर्थ है विभिन्न साझेदारों से आर्थिक, तकनीकी और सामरिक लाभ लेते हुए अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता बनाए रखना। वहीं झुकाव तब दिखाई देता है जब एक संबंध को दूसरे संबंध पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने लगे। भारत-बांग्लादेश संबंधों की असली परीक्षा यह नहीं है कि कौन पहले झुकेगा। वास्तविक परीक्षा यह है कि दोनों देश अपने मतभेदों को संस्थागत संवाद में किस प्रकार बदलते हैं।
भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि ढाका और नई दिल्ली एक-दूसरे की संवेदनशीलताओं को समझते हुए अपने-अपने राष्ट्रीय हितों के बीच साझा जमीन कितनी जल्दी तलाश पाते हैं। पाकिस्तान के सैन्य हुक्मरानों की दमनकारी नीतियों से संघर्ष करने में भारत के सहयोग ने साझा स्मृतियां दीं और अर्थव्यवस्था ने परस्पर निर्भरता पैदा की। अब रहमान की जिम्मेदारी है कि इन वास्तविकताओं को टकराव का कारण नहीं, बल्कि सहयोग की नींव बनाएं। बांग्लादेश के हित में यही है कि वह तात्कालिक राजनीतिक लाभ से आगे देखे और भारत के साथ ऐसा संबंध विकसित करे जिसमें दबाव के बजाय पारस्परिक सम्मान, व्यावहारिक सहयोग और निरंतर संवाद प्रमुख हों। यदि ढाका चाहता है कि उसकी राष्ट्रीय चिंताओं को गंभीरता से लिया जाए, तो उसे भी नई दिल्ली की सुरक्षा चिंताओं, वैध राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक संवेदनशीलताओं का सम्मान करना होगा। यही वास्तविक पारस्परिकता है और यही भारत-बांग्लादेश संबंधों को स्थायी और भविष्य उन्मुख बनाने का सबसे व्यावहारिक आधार हो सकता है।