अनुमान है कि यदि वर्तमान तापमान वृद्धि की गति जारी रही तो 2100 तक हिमालय के एक-तिहाई से अधिक ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं। हिमालय 'एशिया का जल मीनार' है, लेकिन उत्तराखंड, हिमाचल, लद्दाख और सिक्किम में बर्फबारी का समय और स्वरूप बुरी तरह बदल चुका है।
अश्विनी शर्मा, शोधार्थी ( येल विवि, अमरीका )
यूरोप-अमरीका में बिताए अपने अनुभवों के बाद यह साफ हुआ कि बर्फ समाज, अर्थव्यवस्था और भविष्य की स्थिरता का सूचक है। जर्मनी से लेकर नॉर्वे और अमरीका के ठंडे क्षेत्रों तक, हर जगह सर्दियां अब वैसी नहीं रहीं जैसी कुछ दशक पहले हुआ करती थीं। स्थानीय लोग बताते हैं कि जहां कभी हफ्तों तक जमीन सफेद रहती थी, अब वहां सर्दियां ज्यादा बारिश और धूसर आसमान के साथ गुजर जाती हैं। ब्लैक फॉरेस्ट और दक्षिणी जर्मनी के इलाकों में सर्दियों की निरंतरता टूट चुकी है। यह बदलाव केवल मौसम का नहीं, बल्कि जलस्रोतों और कृषि चक्र का भी है। नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों में जहां बर्फ जीवन का हिस्सा रही है स्थिति और भी प्रतीकात्मक है। अमरीका में यह संकट और अधिक तीखे रूप में सामने आता है।
अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार, विश्व के पर्वतीय ग्लेशियर हर वर्ष औसतन 267 गीगाटन बर्फ खो रहे हैं। यूरोप के आल्प्स क्षेत्र में 1850 के बाद से अब तक लगभग 60 प्रतिशत ग्लेशियर द्रव्यमान समाप्त हो चुका है। हिमालयी क्षेत्र में स्थिति और भी संवेदनशील है। अनुमान है कि यदि वर्तमान तापमान वृद्धि की गति जारी रही तो 2100 तक हिमालय के एक-तिहाई से अधिक ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं। हिमालय 'एशिया का जल मीनार' है, लेकिन उत्तराखंड, हिमाचल, लद्दाख और सिक्किम में बर्फबारी का समय और स्वरूप बुरी तरह बदल चुका है। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, नदियां अनिश्चित हो रही हैं और आपदाएं बढ़ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज के अनुसार, पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान वृद्धि वैश्विक औसत से अधिक तेज है, जिससे बर्फ और ग्लेशियर असमान गति से पिघल रहे हैं। अब सवाल यह है कि भारत नीतिगत स्तर पर क्या कर रहा है? भारत में जलवायु नीति आज भी बड़े पैमाने पर घोषणाओं, अंतरराष्ट्रीय मंचों और लक्ष्य-आधारित भाषणों तक सीमित है। पर्वतीय पारिस्थितिकी को लेकर समग्र और संवेदनशील नीति दिखाई नहीं देती।
भारत को अब जिस नीति की जरूरत है, वह केवल 'ग्रीन डवलपमेंट' की भाषा नहीं, बल्कि पर्वतीय विकास की पुनर्परिभाषा है। इसमें तीन बातें केंद्रीय होनी चाहिए। पहला, हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बुनियादी ढांचों पर पुनर्विचार और स्थानीय पारिस्थितिकी की वहन-क्षमता को नीति का आधार बनाना। दूसरा, स्थानीय समुदायों, पर्वतीय, आदिवासी और घुमंतू समाजों के पारंपरिक ज्ञान को नीति निर्माण में वास्तविक स्थान देना और तीसरा, जल, बर्फ और जलवायु को केवल 'प्राकृतिक संसाधन' नहीं, बल्कि 'सार्वजनिक उत्तरदायित्व' के रूप में देखना। यूरोप और अमरीका यह दिखाते हैं कि संसाधन और तकनीक होने के बावजूद संकट टाला नहीं जा सका। हिमालय हमें चेतावनी देता है कि अगर हमने अब भी नहीं सीखा, तो इसकी कीमत कहीं ज्यादा भारी होगी।