पश्चिम बंगाल का टकराव ज्यादा इसलिए चौंकाता है कि अतीत में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक दोस्ती भी रही है।
-राज कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक
अब तक शह-मात में भाजपा पर भारी पड़ती रहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर इस बार उनका दांव उलटा पड़ता दिख रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की 15 जनवरी की टिप्पणियों से तो यही संकेत मिलता है। चर्चित केंद्रीय एजेंसी ईडी की ओर से आइ-पैक के सह-संस्थापक एवं निदेशक प्रतीक जैन के घर-दफ्तर पर आठ जनवरी को मारे गए छापे और उसी दौरान वहां पहुंचकर कुछ दस्तावेज ले गईं ममता के विवाद की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ ईडी के अधिकारियों के विरुद्ध दर्ज एफआइआर पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है, बल्कि इसकी समीक्षा करने पर भी सहमति जताई कि क्या राज्य सरकार की कानून प्रवर्तन एजेंसियां किसी गंभीर अपराध के मामले में केंद्रीय एजेंसी की जांच में हस्तक्षेप कर सकती हैं।
इसी मामले में नौ जनवरी को कलकत्ता उच्च न्यायालय में सुनवाई स्थगन के लिए जिम्मेदार स्थितियों पर भी सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त टिप्पणी की- जैसे यह जंतर-मंतर हो। ममता बनर्जी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने सफाई दी कि वह वहां तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से गई थीं, जिसकी आइ-पैक राजनीतिक सलाहकार है। बेशक सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी नोटिस के जवाब में पश्चिम बंगाल सरकार अपनी बात और विस्तार से रखेगी, लेकिन इस लंबी चल सकने वाली कानूनी लड़ाई से बनने वाली जन धारणा फिलहाल ममता बनर्जी के अनुकूल नहीं लगती, जो अप्रेल-मई में संभावित विधानसभा चुनाव में लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने का जनादेश पाना चाहती हैं। केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच राजनीतिक कटुता लंबे समय से चरम पर है। शाब्दिक तल्खी के अलावा सड़क पर संघर्ष भी देखा जाता रहा है। आइ-पैक प्रशांत किशोर द्वारा स्थापित राजनीतिक सलाहकार कंपनी (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) का संक्षिप्त नाम है। प्रशांत किशोर के बाद प्रतीक जैन इसके प्रमुख हैं। आइ-पैक अब तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनाव रणनीति तैयार कर रही है। अदालती लड़ाई लंबी चल सकती है, लेकिन असल लड़ाई राजनीतिक है। आइ-पैक पर मनी लॉड्रिंग और कोयला घोटाले के धन के चुनावी इस्तेमाल के आरोपों के जवाब में ममता बनर्जी ने सीधे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर निशाना साधते हुए पेन-ड्राइव में सबूत होने का दावा भी कर दिया है। दरअसल पिछले दोनों विधानसभा-लोकसभा चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस एक-दूसरे को सांप्रदायिक व भ्रष्ट बताते हुए कठघरे में खड़ा करती रही हैं। कमोबेश सभी विपक्षी दल और उनकी राज्य सरकारें केंद्र सरकार पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप लगाती रही हैं, पर दिल्ली के बाद सीधा टकराव पश्चिम बंगाल में ही नजर आता है।
पश्चिम बंगाल का टकराव ज्यादा इसलिए चौंकाता है कि अतीत में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक दोस्ती भी रही है। वह उस दौर की बात है, जब ममता केंद्र में वाजपेयी सरकार में मंत्री थीं और पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा का शासन था। पिछले चुनाव में भाजपा के जरिये 'खेला' का पूरा माहौल बनाने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस 213 सीटें जीत गई और दोनों के बीच मत प्रतिशत में दस प्रतिशत का अंतर रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल और भाजपा के बीच का फासला और बढ़ गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में 303 से 240 सीटों पर सिमट जाने के बाद भी हरियाणा, महाराष्ट्र एवं बिहार में एकतरफा जीत हासिल करने वाली भाजपा को लगता है कि पश्चिम बंगाल अब भी नहीं तो कब? बिहार जीतने बाद भाजपा ने कहा था कि गंगा बिहार से बंगाल जाती है, लेकिन भाजपा की चुनावी गंगा इस बार भी बंगाल जा पाएगी या नहीं- इसका अंतिम उत्तर पश्चिम बंगाल के मतदाता ही देंगे।