अदालतों ने कहा कि माता-पिता के विवाद में बच्चे का हित सर्वोपरि है, और साझा अभिरक्षा उसके बेहतर विकास के लिए जरूरी है।
डॉ. ऋतु सारस्वत समाजशास्त्री एवं स्तंभकार
हाल में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट व गुजरात हाईकोर्ट की ओर से चाइल्ड कस्टडी से जुड़े मामलों में दिए गए निर्णयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि माता-पिता के बीच हुए अलगाव की सजा किसी भी स्थिति में बच्चों के हिस्से में नहीं आनी चाहिए। उल्लेखनीय है कि ‘ज्योत्सना गोयल बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य’ के मामले में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि ‘यह स्थापित विधि सिद्धांत है कि नाबालिग बच्चे से संबंधित मामलों में बच्चे का कल्याण और सर्वोत्तम हित सर्वोपरि विचार होता है, जो पक्षकारों के कानूनी अधिकारों से भी ऊपर होता है। ‘कल्याण’ की अवधारणा व्यापक है और इसमें बच्चे का शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, शैक्षिक व समग्र विकास सम्मिलित होता है।’
दरअसल, यह मामला एक मां की ओर से दायर उस याचिका से संबंधित है, जिसमें पति से अलगाव के बाद उस 9 वर्षीय अपनी पुत्री को वापस पाने के लिए हेबियस कॉर्पस (व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की रिट) याचिका दायर की थी, जो कि पिता के पास रह रही थी किंतु न्यायालय ने याचिका को खारिज कर दिया। मां ने आरोप लगाया था कि वह अपनी पुत्री से किसी प्रकार का संपर्क नहीं रख पा रही है, किंतु न्यायालय ने इसे सही नहीं पाया, क्योंकि वास्तविकता यह थी कि माता नियमित रूप से टेलीफोन एवं वीडियो कॉल के माध्यम से बच्ची के संपर्क में बनी हुई थी। ठीक ऐसे ही मासीबेन बनाम केशवजीभाई दामजीभाई घेटिया मामले में अभिरक्षा (चाइल्ड कस्टडी) परिवार न्यायालय के निर्णय को खारिज कर गुजरात हाईकोर्ट ने मामले में कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि अभिरक्षा मामलों में परिवार न्यायालय को संवेदनशील, मानवीय और बाल-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। परिवार न्यायालय को यह समझना चाहिए कि अभिरक्षा संबंधी विवाद केवल पक्षकारों के बीच कानूनी लड़ाई नहीं हैं, बल्कि यह सीधे तौर पर बच्चे के भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक और विकासात्मक कल्याण को प्रभावित करते हैं।
वर्ष 2020 में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए ‘यशिता साहू बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान’ के निर्णय का उल्लेख अनिवार्य हो जाता है, जिसमें स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है कि ‘एक बच्चा, विशेषकर कम आयु का बच्चा, दोनों माता-पिता के प्रेम, स्नेह, साथ और संरक्षण की आवश्यकता रखता है। यह केवल जरूरत ही नहीं, बल्कि उसका मूल मानव अधिकार है। यह निर्विवाद सत्य है कि देशकाल की सीमाओं से परे, आधुनिकता की तमाम तथाकथित परिभाषाओं के बावजूद विश्व का कोई भी न्यायालय यह स्वीकार नहीं करता कि बच्चे माता-पिता के संघर्ष का साधन बनें। बच्चे किसी भी प्रकार के विवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संरक्षण के अधिकारी हैं।
जूडिथ वालरस्टीन ने अपनी पुस्तक ‘द अनएक्सपेक्टेड लेगेसी ऑफ डिवोर्स ए 25 ईयर लैंडमार्क स्टडी’ में लगभग 25 वर्षों तक बच्चों के जीवन का सतत अनुगमन करने के पश्चात यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया हैं कि माता-पिता के अलगाव का प्रभाव बच्चों पर दीर्घकालिक रूप से पड़ता है, जो उनके भावनात्मक विकास, आत्मविश्वास तथा भविष्य के संबंधों को प्रभावित करता है। यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि बचपन में अनुभव किया गया पारिवारिक विघटन, वयस्क होने पर भी उनके व्यवहार और संबंधों में अस्थिरता उत्पन्न कर सकता है। ऐसी स्थिति में आवश्यक है कि माता-पिता अपने व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर बच्चों के भविष्य को केंद्र में रखें। अंतत: बच्चों का जीवन किसी संघर्ष का परिणाम नहीं, बल्कि संवेदनशील निर्णयों का प्रतिबिंब होना चाहिए और इसके लिए साझा अभिरक्षा (शेयर्ड चाइल्ड कस्टडी) जैसी व्यवस्था एक संतुलित, मानवीय और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करती है।