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गैस निर्भरता घटाने का उपाय बन सकती है ‘ई-कुकिंग’

भारत में कुकिंग के लिए पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) और पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) का प्रयोग होता है। भारत अपनी रसोई और औद्योगिक ऊर्जा जरूरतों के लिए आयातित एलपीजी और प्राकृतिक गैस पर काफी हद तक निर्भर है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Apr 06, 2026

हृदयेश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

पश्चिम एशिया में जंग थमने के कोई स्पष्ट आसार नहीं दिख रहे। संभावित युद्ध विराम को लेकर अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के बयानों के बीच यूएस-इजरायल और ईरान के एक दूसरे पर हमलों का सिलसिला जारी है। पूरी दुनिया में इस युद्ध का असर अलग अलग तरीके से दिख रहा है, लेकिन भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता ऊर्जा सुरक्षा को लेकर है। विशेष रूप से कुकिंग फ्यूल को लेकर। न केवल आम लोगों की रसोई पर संकट है बल्कि ठेलों-ढाबों से लेकर रेस्तरां और बड़े होटलों तक इसका असर दिख रहा है। भारत में कुकिंग के लिए पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) और पाइप्ड नेचुरल गैस (पीएनजी) का प्रयोग होता है। भारत अपनी रसोई और औद्योगिक ऊर्जा जरूरतों के लिए आयातित एलपीजी और प्राकृतिक गैस पर काफी हद तक निर्भर है। जहां नेचुरल गैस जमीन से निकलती है और पेट्रोलियम गैस कच्चे तेल की रिफाइनिंग करते समय बाइ प्रोडक्ट के रूप में मिलती है। नेचुरल गैस को पाइप के माध्यम से घरों तक भेजा जाता है, जिसे पीएनजी कहते हैं वहीं पेट्रोलियम गैस को तरल अवस्था में सिलेंडरों में भरकर उपयोग किया जाता है, जिसे एलपीजी कहा जाता है।

भारत ने पिछले दिनों साफ ईंधन की ओर रुख किया तो आज 32 करोड़ घरों के पास कुकिंग गैस कनेक्शन है। इनमें से ज्यादातर सिलेंडर वाले परिवार हैं यानी एलपीजी इस्तेमाल करते हैं। पिछले डेढ़ दशक के भीतर ही एलपीजी की खपत दोगुना हो गई है। वर्तमान में देश अपनी एलपीजी खपत का 60 प्रतिशत से अधिक और प्राकृतिक गैस की जरूरतों का लगभग 50 प्रतिशत आयात करता है। पिछले 15 सालों में एलपीजी का आयात करीब 6 एमएमटी से बढक़र कोई 21 एमएमटी हो गया है यानी खपत में जो भी बढ़ोतरी हुई है वह लगभग सारी ही आयात के जरिये आ रही है। विशेषज्ञ बताते हैं कि गैस आयात पर निर्भरता घटाने के लिए सीधे बिजली के उपकरणों से किचन को सुसज्जित करना एक कारगर उपाय है विशेषकर शहरी उपभोक्ताओं के लिए। इसे ई-कुकिंग कहा जाता है, जिसमें इंडक्शन स्टोव, ई-कुकर और इलेक्ट्रिक तवों का प्रयोग हो। भारत बिजली उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर है। उसकी कुल बिजली करीब 70 प्रतिशत कोयले और बाकी अन्य ऊर्जा स्रोतों से पूरा होता है जिसमें सौर और पवन ऊर्जा शामिल है। कोयले के बजाय साफ ऊर्जा स्रोतों का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए ग्रिड को लचीला बनाने और ट्रांसमिशन से जुड़ी बाधाओं को दूर करना होगा। इससे अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा को इंडक्शन स्टोव और अन्य उपकरणों के जरिये इलेक्ट्रिक कुकिंग (ई-कुकिंग) में इस्तेमाल किया जा सकता है। जानकारों के मुताबिक यह अधिक सुरक्षित, किफायती और ऊर्जा-कुशल तरीका है, साथ ही दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करता है।

इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस व इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डवलपमेंट जैसे संगठनों के अध्ययनों के अनुसार, ई-कुकिंग और बायोगैस सहित स्वच्छ खाना पकाने के समाधान को बड़े पैमाने पर अपनाने से भारत की आयातित ईंधनों पर निर्भरता काफी घट सकती है और 2050 तक लगभग 2.4 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी बचत संभव है। आइईईएफए की लीड एनर्जी विशेषज्ञ पूर्वा जैन कहती हैं कि एलपीजी और पीएनजी कनेक्शन का कवरेज 115 प्रतिशत से अधिक होने के बावजूद लगभग 38-40 प्रतिशत आबादी अब भी ठोस ईंधनों पर निर्भर है। उनके अनुसार, ई-कुकिंग को बढ़ावा देने से न केवल ऊर्जा पहुंच बेहतर होगी, बल्कि यह भारत के व्यापक विद्युतीकरण मार्ग और दीर्घकालिक डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों के अनुरूप भी होगा।

शहरी परिवार छत पर लगे सोलर पैनल या ग्रिड बिजली से इलेक्ट्रिक कुकिंग अपना सकते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि व जैविक कचरे से बायोगैस आधारित प्रणालियां अपनाई जा सकती हैं। ग्रीन हाइड्रोजन आधारित कुकिंग जैसे उभरते विकल्प, जो अभी शुरुआती चरण में हैं, भविष्य में भारत की स्वच्छ और घरेलू ऊर्जा टोकरी को और मजबूत कर सकते हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक ऊर्जा संकटों के बीच स्वच्छ खाना पकाना ऊर्जा सुरक्षा का एक अहम स्तंभ बनता जा रहा है। जाहिर है कि मौजूदा भू-राजनीतिक संकट ने एक बार फिर तेल, गैस और एलपीजी जैसे जीवाश्म ईंधनों में कीमतों की अस्थिरता और आपूर्ति बाधाओं को उजागर किया है। ई-कुकिंग प्राकृतिक गैस और एलपीजी पर निर्भरता को अभी पूरी तरह खत्म नहीं कर सकती, लेकिन यह बदलाव भारत को इन बाहरी झटकों से बचाने की दिशा में पहला कदम जरूर हो सकता है।