
इसमें दो राय नहीं है कि महिलाएं आज हर क्षेत्र में नेतृत्व व कार्यक्षमता को साबित कर रही हैं। इतना ही नहीं, महिलाएं चुनौतीपूर्ण पेशा चुनने का साहस भी दिखा रही हैं। न्यायपालिका और वकालत का क्षेत्र भी ऐसा ही है, जहां महिलाएं अपनी क्षमता और दक्षता की मिसाल पेश कर रही हैं। यह भी सच है कि कानूनी क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में भी प्रगति हुई है, लेकिन प्रगति की यह रफ्तार दूसरे क्षेत्रों के मुकाबले काफी कम नजर आती है। वैसे भी महिलाओं के लिए लंबे समय तक काम करने की आवश्यकता और पेशेवर प्रतिबद्धताओं के कारण इस क्षेत्र में पारिवारिक जीवन और कॅरियर में संतुलन बनाना कठिन होता है।
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने महिलाओं की न्यायपालिका और वकालत के क्षेत्र में कम भागीदारी पर वाजिब चिंता जताई है। उनका कहना है कि केंद्र व राज्य सरकारों को कम से कम तीस फीसदी लॉ ऑफिसर और पब्लिक सेक्टर की तीस फीसदी पैनल वकील महिलाएं होनी चाहिए। जस्टिस नागरत्ना की यह राय इसलिए भी अहमियत रखती है क्योंकि वकीलों के नामांकन में महिलाओं की संख्या अभी महज 16 फीसदी ही है। चिंता इस बात की भी कि पिछले 65 साल में कोई महिला बार काउंसिल का अध्यक्ष भी नहीं रही। जाहिर है जो महिलाएं वकालत के क्षेत्र में सक्रिय हैं वे भी समुचित अवसर नहीं मिलने के कारण न्यायिक क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ पा रहीं। अब तक का जो परिदृश्य है उससे भी यह लगता है कि विधि के क्षेत्र में महिलाओं का नेतृत्व व निर्णय लेने का अधिकार सीमित रहा है।
न्यायपालिका, विधायी प्रक्रियाओं और कानूनी सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़े तो सकारात्मक सामाजिक बदलाव लाना आसान होगा। लेकिन ये अवसर भी निश्चित भागीदारी तय किए बिना मिल पाएंगे यह कहना बहुत मुश्किल है। विधि के क्षेत्र में महिलाएं उतनी आसानी से जगह नहीं बना पा रही हैं जितना पुरुष। ऐसे में जरूरत इस बात की भी है कि न्यायपालिका व वकालत के क्षेत्र में प्रवेश के लिए महिलाओं को न केवल आरक्षण दिया जाए बल्कि इस क्षेत्र में उनके सफल होने में मदद करने का वातावरण भी बनाया जाना चाहिए।
पंचायत राज संस्थाओंं और स्थानीय निकायों में मिले आरक्षण की वजह से ही नगरों में मेयर व नगरीय निकायों के अन्य प्रमुख तथा गांवों में सरपंच पद पर पहुंचने का संवैधानिक अधिकार मिल सका है। समय-समय पर यह भी कहा जाता रहा है कि महिलाओं को सहानुभूति के माध्यम से नहीं, बल्कि कानून के माध्यम से सशक्त बनाया जाना चाहिए। विधि के क्षेत्र में ये अवसर बढ़ेंगे तो कई कानूनी पहलुओं में उस संवेदनशीलता का भी परिचय मिल सकेगा, जो महिलाओं में स्वभावत: होती है। क्योंकि आम शिकायत यह भी रहती है कि विधि के क्षेत्र में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व के कारण कई मामलों में पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलता है।
Published on:
06 Apr 2026 02:09 pm
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