
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत मानव समाज को एक अनूठी देन है। यह महज मनोरंजन का माध्यम भर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य और मनुष्यता की परिपूर्णता का द्योतक भी है। सामान्यतया हम लोग कला के विभिन्न आयामों या अनुभव के लिए सौंदर्य (एस्थेटिक) शब्द को प्रयोग में लाते हैं। वहीं प्रमुख भारतीय कला व्याख्याकार डॉ. आनंद कुमारस्वामी उपरोक्त शब्द से असहमति जताते हुए इसे ‘कलात्मक संवेदनशीलता’ या ‘कलात्मक अनुभव’ के रूप में परिभाषित करते हैं। वहीं तमाम पश्चिमी कला विशेषज्ञ और दार्शनिक, जिसमें जर्मनी के मैक्स-मूलर भी शामिल हैं मानते हैं कि भारतीयों के दिमाग कला में सुंदरता का कोई विचार ही नहीं है। जबकि वे स्वयं संस्कृत के विद्वान भी थे, लेकिन क्या उनकी पहुंच संस्कृत के इन शब्दों सौंदर्य, चारुता (सुंदरता, लावण्य, कमनीयता आदि) एवं रमणीयता जैसे शब्दों तक नहीं पहुंच पाई?
हम सभी समझते हैं कि कला में हमेशा भावनात्मकता का तत्त्व मौजूद रहता है। संगीत अपने आप में एक स्वायत्त कलारूप है। तब यहां पर सवाल उठता है कि जब यह स्वायत्त है तो फिर यह किसी भावना या भावनात्मक अभिव्यक्ति को कैसे संप्रेषित कर सकता है? इसका एक उत्तर तो यह हो सकता है कि संगीत भले ही एक प्रतिनिधित्व करने वाली कला नहीं है, परंतु यह अर्थपूर्ण एवं भावनात्मक कलारूप तो है। जिस तरह भारतीय काव्य परंपरा सभी तरह की भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है उसी तरह संगीत भी हमारी प्रत्येक भावना को अभिव्यक्त करने की सामथ्र्य रखता है।
इस संप्रेषण का मुख्य माध्यम ‘रस’ है और इसे तीन प्रमुख गुणों से अभिव्यक्त किया जाता है। पहला गुण है ‘माधुर्य’। इसका शाब्दिक अर्थ होता है मधुरता, आकर्षण, मोहकता और सुघड़ता। इन सभी भावनात्मक गुणों में कोमलता अनिवार्यत: विद्यमान रहती है। ये सभी भावनाएं जिनमें हम महसूस करते हैं कि हमारा हृदय पिघल रहा है, द्रुतिकारणम कहलाती हैं। हमारी भावनाएं बेहद कोमल हो जाती हैं, जैसे स्त्री-पुरुष के मध्य प्रेम, ईश्वर के प्रति प्रेम। इनमें मुख्य स्वर करुणा, शांति और गहन आध्यात्मिक शांति का होता है। दूसरा गुण है ‘ओज’। यह मनुष्य में विद्यमान सर्वोच्च गुणों में से है। यह मूलत: हमारी मानसिक स्पष्टता को बनाए रखता है। ओज वस्तुत: उमंग और हमारा विस्तार दोनों या दोनों का सम्मिलित गुणधर्म भी है। यह शक्ति, महिमा (श्रेष्ठता), भव्यता, विशालता या खुलापन एवं गौरव की अभिव्यक्ति भी है। तीसरा गुण है ‘प्रसाद’। संगीत में इससे तात्पर्य है मधुर स्पष्टता, निर्मलता, विश्राम या तनावमुक्ति, तेजस्विता और स्पष्टता। संगीत की सभी कलात्मक संवेदनाओं को तीन गुणों में समेटा जा सकता है। निष्कर्ष निकालें तो कह सकते हैं ‘माधुर्य’ मनोहारी या लालित्य, ‘ओज’ उत्तेजना और ‘प्रसाद’ सुरुचिपूर्ण होने की अभिव्यक्ति है। इन तीनों का समायोजन संगीत को सर्वाधिक संप्रेषणीय कलारूप में परिवर्तित कर देता है।
Updated on:
04 Apr 2026 04:48 pm
Published on:
04 Apr 2026 04:44 pm
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