
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट को लेकर जिस तत्परता से कदम उठाया है, वह स्वागत योग्य है। चिंता की बड़ी बात यह है कि पिछले मात्र एक सप्ताह में बच्चों के साथ बलात्कार का वीडियो इंस्टाग्राम पर अपलोड करने के पचास से ज्यादा मामले आयोग के संज्ञान में आए हैं। इतनी बड़ी संख्या में ऐसे मामलों का सामने आना यह दर्शाता है कि यह आइटी कंपनियों की व्यवस्थागत विफलता है, जिस पर तत्काल और गंभीर हस्तक्षेप की आवश्यकता है। एनएचआरसी ने आठ राज्यों के पुलिस महानिदेशकों को नोटिस जारी कर एफआइआर दर्ज करने और सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। साथ ही, इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा को भी नोटिस भेजा गया है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी पूरे प्रकरण से अवगत कराया गया है। यह बहुस्तरीय कार्रवाई इस बात का संकेत है कि आयोग इस मुद्दे को केवल राज्यों की कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि आइटी प्लेटफॉर्म की जवाबदेही मानकर आगे बढ़ रहा है।
भारत के आइटी नियमों के तहत मध्यस्थ प्लेटफॉर्मों को बाध्य किया गया है कि वे अवैध और आपत्तिजनक सामग्री की सूचना मिलते ही उसे हटाएं। बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री तो सबसे गंभीर श्रेणी में आती है, जिसे किसी भी स्थिति में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अव्वल तो इसे प्लेटफॉर्म पर आने से पहले ही रोका जाना चाहिए। आयोग ने मेटा को ठीक ही याद दिलाया है कि उसे अपनी जिम्मेदारी समझते हुए ऐसी सामग्री को तत्काल प्रभाव से हटाना होगा। सवाल यह भी उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में ऐसी सामग्री प्लेटफॉर्म की स्वचालित निगरानी प्रणालियों से कैसे बचती रही। क्या व्यावसायिक कारणों से इसे जानबूझकर फैलने दिया गया? यह आइटी कंपनियों की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। दूसरी ओर, पुलिस की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जो शिकायतों पर अपेक्षित गंभीरता और तेजी से कार्रवाई नहीं कर पा रही है।
एनएचआरसी की पहल केवल नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। परिणाम तभी दिखेगा जब राज्यों की पुलिस दोषियों को सजा दिलाए। मेटा जैसी कंपनियां अपने मंच पर आपत्तिजनक सामग्री की पहचान और हटाने की प्रक्रिया को और मजबूत करे और केंद्र सरकार आवश्यकता पडऩे पर कानूनी ढांचे को और सख्त बनाए। बच्चों की सुरक्षा की दिशा में उठाया गया हर कदम महत्वपूर्ण है। इस घटनाक्रम से कुछ ऐसे सवाल भी उठ रहे हैं जिनके जवाब जरूरी हैं। क्या भारत में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर बाल सुरक्षा से जुड़े कंटेंट निगरानी के मौजूदा नियम पर्याप्त हैं? क्या आइटी कंपनियों पर लगाम के और कड़े प्रावधान अब जरूरी हो गए हैं? यह समस्या डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी बड़ी और स्थायी चुनौती की ओर इशारा करते हैं।