
बीते शुक्रवार को मक्का में सऊदी अरब, टर्की और पाकिस्तान ने एक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसे देखते हुए प्रथम दृष्टया एक प्रश्न उठा कि तीन इस्लामी देश, दिन शुक्रवार और स्थान मक्का क्यों? क्या यह मध्यकालीन सभ्यता इस्लामी सिविलाइजेशन का प्रतीक बनने का प्रयास तो नहीं। अगर है भी तो क्या आधुनिक सभ्यता से टकराव मोल ले पाएगी, स्पष्टतया नहीं। तो क्या यह इस्लामी दुनिया के अंदर किसी नाटो जैसे रक्षा संगठन बनाने के प्रयासों का हिस्सा है? हो सकता है परंतु नैतिक दृष्टि से नहीं, क्योंकि इनमें से एक देश परमाणु शक्ति सम्पन्न होने के साथ आतंकवाद को पनाह देने के लिए जाना जाता है। दूसरा टर्की उभरते कट्टरपंथी राष्ट्र के रूप में और तीसरा सऊदी अरब इस समय खुद को आधुनिक बनते हुए दिखाना चाहता है। इस दृष्टि से यह संगठन कुछ हद तक बेमेल है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस संगठन को किस तरह से देखा जाए? एक विशुद्ध इस्लामी रक्षा संगठन के रूप में अथवा एक औपचारिक रक्षा संगठन के रूप में? यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब रियाद को यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों से बढ़ते हुए खतरे का सामना करना पड़ रहा है। जब ईरानी मिसाइलें उन देशों के प्रमुख स्थलों और ऊर्जा के बुनियादी ढांचे तक पहुंच जा रही हैं जिन्हें अमरीकी डिफेंस छतरी हासिल थी। तो क्या अब सऊदी अरब को अमरीकी छतरी पर भरोसा नहीं रह गया? महत्वपूर्ण बात यह है कि तीनों देश सफाई देते हुए नजर आ रहे हैं कि यह समझौता किसी 'एक्सिस' अथवा सैन्य धुरी या किसी सांप्रदायिक गुट की स्थापना का प्रयास नहीं है। फिर तो पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ सितंबर 2025 में समझौता कर ही चुका था। अब नए की क्या जरूरत थी? दरअसल जरूरत पाकिस्तान को अधिक है क्योंकि एक तो वह इस्लामी, विशेषकर सुन्नी दुनिया का नेता बनना चाहता है। दूसरे वह यह दिखाना चाहता है कि वह एशियाई-इस्लामी दुनिया में सबसे अधिक सैन्य क्षमता वाला देश है जिसकी कूटनीतिक अहमियत है। वैसे उसकी ये महत्वाकांक्षाएं शुरू से ही रही हैं अन्यथा वह शीत युद्ध के दौरान अमरीका के साथ सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन और साउथ ईस्ट एशिया ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन सीटो में न शामिल हुआ होता। अब वह इस त्रिपक्षीय समझौते के जरिये अपने अंदर के छुपे हुए उत्स को बाहर तक लाना चाहता है। इस समझौते से जो त्रिकोण बना है पाकिस्तान उसके सहारे भारत की सीमा पर चुनौती भी पेश कर सकता है। हालांकि सऊदी अरब के साथ भारत के अच्छे आर्थिक रिश्ते हैं लेकिन संधि के जरिये अपनी सुरक्षा को पाकिस्तान की सुरक्षा से जोड़ देना, बदलती नजर का संकेत हो सकता है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप्प अर्दोआन ने भले ही यह कह दिया हो कि समझौते का मकसद किसी देश को निशाना बनाना नहीं है। लेकिन दुनिया जानती है कि तुर्किए पाकिस्तान के साथ खड़ा है और पाकिस्तान आतंकवाद के साथ और ये दोनों भारत के खिलाफ संकेत स्पष्ट हैं। समझौते में नाटो के अनुच्छेद 5 जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है इसलिए इसका असर मध्य-के अलावा दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ेगा।
मक्का का यह समझौता भारत को केंद्र में रखकर किया गया है, यह कहना उचित नहीं है। लेकिन नई दिल्ली के लिए यह घटना महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक ऐसा बदलाव दिखाई देता है जो भारत की पश्चिम एशिया नीति, पाकिस्तान नीति और समुद्री सुरक्षा, तीनों को प्रभावित कर सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि समझौते में कहा गया है कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। हालांकि पाकिस्तान इसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने का प्रयास कर सकता है लेकिन सऊदी अरब इसमें पाकिस्तान का साथ देगा, ऐसा कहना अभी मुश्किल है। दरअसल भारत-सऊदी अरब रणनीतिक रूप से जुड़े हैं। वैसे इस समझौते के पीछे शायद सबसे महत्वपूर्ण कहानी रियाद की है। एक प्रमुख अमरीकी अखबार ने लिखा है कि ईरान युद्ध ने क्षेत्रीय देशों में अमरीकी सुरक्षा छतरी को लेकर अनिश्चितता पैदा की है। सऊदी अरब ईरान समर्थित हूती खतरे और लाल सागर में अपने जहाजों के जोखिम का सामना कर रहा है, जबकि तुर्की स्वयं ईरानी मिसाइलों का निशाना बन चुका है। इसका अर्थ यह नहीं कि सऊदी अरब अमरीका से दूर जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि वह एक से अधिक सुरक्षा विकल्प रखना चाहता है। यही पैटर्न व्यापक खाड़ी क्षेत्र में भी दिखाई देता है। यूरोपीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट पहले ही रेखांकित कर चुकी है खाड़ी की पेट्रो-राजशाहियां पश्चिमी हथियारों पर निर्भरता घटाकर अपनी रक्षा उद्योग क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। सऊदी अरब का लक्ष्य 2030 तक अपने हथियार बजट का आधा हिस्सा घरेलू उत्पादन पर खर्च करना है। इसलिए अब पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और तुर्की के बढ़ते रक्षा उद्योग को इस रणनीति के साथ जोड़ कर देखने की जरूरत है।
यह केवल एक रक्षा समझौता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा का नया वास्तुशिल्प है, जिसे मक्का में एक शक्ल देने की कोशिश की गई है। जो भी हो, मक्का में हुआ समझौता सुन्नी गठबंधन के करीब दिखने के साथ-साथ कई आयाम समेटे हुए दिख रहा है। वह अमरीकी छतरी के अंदर और बाहर के बीच में दिखने की कोशिश कर रहा है। वह देख रहा है कि अमरीकी सैन्य नेतृत्व को भी लंबे संघर्ष में एयर-डिफेंस मिसाइलों के भंडार पर दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इसका अर्थ है कि जब महाशक्ति की क्षमता सीमित दिखाई देने लगती है तो क्षेत्रीय शक्तियां अपने विकल्प बनाना शुरू करती हैं। इसे देखते हुए भारत को भी यह समझना होगा कि 21वीं सदी की शक्ति केवल सैनिकों की संख्या से तय नहीं होगी।