ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी दोहराया है कि तेहरान अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है। हालांकि खाड़ी देशों से जारी बयान इस दावे का खंडन करते हैं।
डॉ. जतिन कुमार - असिस्टेंट प्रोफेसर, राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विवि,
पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में ईरान और खाड़ी देशों के बीच संबंध लंबे समय से प्रतिस्पर्धा, सीमित सहयोग और रणनीतिक संतुलन के मिश्रण पर आधारित रहे हैं। वर्ष 2015 में ईरान और पी 5+1 देशों (चीन, फ्रांस, जर्मनी, रूस, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमरीका एवं यूरोपीय संघ) के बीच संयुक्त व्यापक कार्ययोजना (जेसीपीओए) समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद भी खाड़ी देश ईरान को एक संभावित सुरक्षा चुनौती के रूप में देखते रहे, जिसने खुफिया स्तर पर खाड़ी देशों तथा इजरायल के संबंधों को भी एक सकारात्मक दिशा दी।
यदि बात सऊदी अरब के ईरान के साथ राजनयिक संबंधों की करें तो दोनों देशों के बीच संबंध 1987 से 1990 के बीच निलम्बित रहे और बाद में 2016 से 2023 तक फिर से रोक दिए गए थे। इसका मुख्य कारण यमन में सऊदी अरब का सैन्य हस्तक्षेप(ऑपरेशन डेसिसिव स्टॉर्म), शिया धर्मगुरु शेख निम्र की फांसी और ईरान में सऊदी राजनयिक मिशनों पर हुए हमलों पर विवाद था। सऊदी अरब के इस कदम के बाद बहरीन और कतर ने भी अपने राजदूतों को वापस बुला लिया था, हालांकि संयुक्त अरब अमीरात ने वहां अपना मिशन खुला रखा, लेकिन उसने अपने कूटनीतिक संबंधों को सीमित कर दिया था। मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से ईरान और सऊदी अरब के बीच सात वर्षों से टूटे हुए राजनयिक संबंधों की पुन: बहाली हुई, जिसने क्षेत्रीय कूटनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया। जिसके परिणामस्वरूप बाकी खाड़ी देशों के साथ भी ईरान के रिश्तों में सकारत्मक बदलाव देखा गया।
फिर पिछले वर्ष 9 सितंबर को इजराइल का कतर सरकार के आवासीय परिसर में ठहरे हुए हमास के नेतृत्व को निशाना बनाने की घटना ने एक ऐसी स्थिति का निर्माण किया, जिसमें ईरान तथा खाड़ी देश एक दूसरे के और नजदीक आते हुए प्रतीत हुए। किंतु अमरीका/इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव उत्तर में ईरान का खाड़ी देशों पर मिसाइल एवं ड्रोन्स के माध्यम से हमलों ने इस संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। साथ ही ईरान के खाड़ी देशों (सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन और ओमान) के साथ सुधरते रिश्तों को एक बार फिर से अविश्वास एवं अस्थिरता के नए दौर में ढकेल दिया है। खाड़ी देशों पर हवाई हमलों के संदर्भ में ईरान का मानना है कि उसे अपने खाड़ी पड़ोसियों के प्रति कोई शत्रुता नहीं है और वह अपनी कार्रवाइयों को खाड़ी देशों पर सीधे हमले के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्र में अमरीकी सैन्य उपस्थिति के जवाब के तौर पर देखता है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी दोहराया है कि तेहरान अपने पड़ोसी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है। हालांकि खाड़ी देशों से जारी बयान इस दावे का खंडन करते हैं। साथ ही खाड़ी देशों से जारी सार्वजनिक बयान, ईरान की कार्रवाइयों की स्पष्ट रूप से निंदा कर रहे हैं और गंभीर परिणामों की चेतावनी भी देते हैं।
इतना तो साफ है कि ईरान के खाड़ी देशों पर हमलों ने इन देशों की तेहरान के साथ सावधानीपूर्ण और संतुलित संबंध बनाए रखने की नीति को भारी हानि पहुंचाई है। खाड़ी देशों की इजरायल के साथ व्यापक सुरक्षा साझेदारी की संभावनाओं के मार्ग को प्रशस्त किया है। यदि इतिहास के पन्नों को पलटा जाए तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि 2015 में ईरान एवं पी5+1 देशों के बीच जेसीपीओए पर हस्ताक्षर ने इजरायल तथा कुछ खाड़ी देशों को एक दूसरे के काफी करीब ला दिया था। वहीं दूसरी तरफ जिस तरह खाड़ी देशों ने एकजुट होकर ईरान के हमलों की निंदा की है। उससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि ईरान एवं खाड़ी देशों के बीच राजनयिक संबंध एक बार फिर से बदतर स्थिति में जा चुके हैं, यूएई का तेहरान में दूतावास बंद कर राजदूत वापस बुलाने के निर्णय में स्पष्ट देखा जा सकता है।
यदि ईरान खाड़ी देशों में अपने हमलों को नहीं रोकता तो निसंदेह बाकी के खाड़ी देश भी इस तरह का कदम उठा सकते है। इतना ही नहीं, यदि ईरान खाड़ी देशों में अपने कैम्पेन को बढ़ाता है तो खाड़ी देशों के साथ एक व्यापक सैन्य संघर्ष की स्थिति भी बन सकती है। कतर ने पहले ही ईरान के खिलाफ आत्मरक्षा में सीमित हवाई कार्रवाई शुरू कर दी है। कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजेद अल-अंसारी ने कहा है कि कतर, ईरान को निशाना बनाने वाले अभियान का हिस्सा नहीं है। जानकारों का मानना है कि सऊदी अरब व यूएई भी इस तरह की रक्षात्मक कार्रवाई ईरान के खिलाफ कर सकते हैं। इसमें संदेह नहीं है कि खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों ने तेहरान के पश्चिम एशियाई क्षेत्र में कूटनीतिक रूप से और अधिक अलग-थलग पडऩे की संभावनाओं को बढ़ा दिया है।