
प्रवीण चन्द्र त्रिवेदी
(कुलपति, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर)
Teachers Day Special : सांस्कृतिक मूल्यों के विकास एवं विस्तार के लिए शिक्षा महत्त्वपूर्ण माध्यम है, जिसके जरिए मानव अपने अनुभूतिजन्य अनुभवों को समाज एवं उसकी नई पीढ़ी में संचारित करता है। ऋषि-मुनि जो शिक्षा देते थे, वह उनका समग्र ज्ञान था। वे संस्कृति के रक्षकों का निर्माण करते थे। कर्म से लेकर धर्म तक, नैतिक शिक्षा से चरित्र निर्माण तक, शास्त्रार्थ से युद्ध कौशल तक, व्यवहार से आचरण तक की शिक्षा दी जाती थी। अच्छा इन्सान बनने, मानवीय गुणों को अपनाकर समाज एवं देश की सेवा करने, सहयोग की भावना विकसित करने, सबसे हिल-मिल कर रहने की शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा से मानव में चिंतन, चरित्र, व्यवहार, दृष्टिकोण को आदर्शोन्मुख किया जाता है। शिक्षा मनुष्य में सद्भावना एवं सद्प्रवृत्ति को बढ़ाती है। शिक्षा सुसंस्कृत समाज की आधारशिला है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति में बौद्धिक जागृति होती है और इससे वह नवीन सांस्कृतिक मूल्यों की रचना करता है। शिक्षा बुराई से अच्छाई की ओर, हीनता से उच्चता की ओर, असंभव से संभव की ओर, हिंसा से अहिंसा की ओर, पशुता से मनुष्यता की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करती है। यही जीवन मूल्य है, यही संस्कृति है, जिसका निर्माण शिक्षा से होता है। जे. कृष्णमूर्ति के अनुसार 'उचित प्रकार की शिक्षा का अर्थ है, प्रज्ञा को जागृत करना तथा समन्वित जीवन को पोषित करना और केवल ऐसी ही शिक्षा एक नवीन संस्कृति तथा शान्तिमय विश्व की स्थापना कर सकेगी।'
पाश्चात्यीकरण, भौतिकवादी दृष्टिकोण, तार्किकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण व औद्योगीकरण को विकास का पर्याय मानने से भारतीय संस्कृति का आध्यात्मिक आधार शिथिल हुआ है, जिससे वर्तमान में शिक्षा-व्यवस्था भारतीय संस्कृति व संस्कारों का वाहक बनने के स्थान पर मिश्रित संस्कृति को पुष्ट करने वाली बन गई है। इस मिश्रित संस्कृति के व्यक्तियों में सामाजिकता के स्थान पर वैयक्तिक हित प्रधान होते जा रहे हैं। नैतिक व श्रेष्ठ जीवन मूल्यों के स्थान पर अनैतिक आचरण, भ्रष्टाचार, संकुचित जातिवाद, दायित्वहीनता प्रबल होती प्रतीत हो रही है। अध्यात्म आधारित सुख व खुशहाली के स्थान पर भौतिकतावादी संतुष्टि जीवन का ध्येय बन रही है। यह कोई सुखद स्थिति नहीं है।
आज समाज में असंस्कारित व्यवहार के कारण चारित्रिक दुर्बलताएं मुखर हुई हैं । देश में सर्वत्र स्वार्थ, लोलुपता और अनैतिक आचरण नजर आता है। पाश्चात्यीकरण व भौतिकतावादी वर्चस्व ने प्राचीन संस्कारों व परम्पराओं को प्रभावहीन किया है। नए वातावरण व पर्यावरण के अनुरूप नए मानक व्यवहार व संस्कारों का निर्माण नहीं किया गया है। इससे समाज में भ्रम की स्थिति बनी है। आवश्यकता है कि इस भ्रम की स्थिति को समाप्त करने के लिए प्राचीन संस्कारों एवं परिवर्तित आचरणीय मानकों के बीच समन्वय का मार्ग निकालकर नए नैतिक, धार्मिक, प्रजातान्त्रिक सामाजिक, वैयक्तिक, व्यावसायिक, सांस्कृतिक, मानकों को सबल किया जाए।
यदि शिक्षा-दीक्षा उचित वातावरण में हुई हो, तो व्यक्ति का जीवन मर्यादित, संयमित, अनुशासित, नैतिक गुणों से परिपूर्ण व श्रेष्ठ चारित्रिक गुणों से युक्त होता है। आवश्यकता है अपनी संस्कृति को पहचानने की, अपने अतीत के प्रति गौरव का अनुभव करने की, भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न करने की, युवाओं में राष्ट्र के प्रति प्रेम, राष्ट्रभक्ति, विश्वास और राष्ट्र के पुन:निर्माण का पथ प्रशस्त करने की। इसे प्राप्त करने में संस्कार आधारित शिक्षा ही सक्षम है।