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शरीर ही ब्रह्माण्ड: साम्राज्य माया का

प्रकृति में गतिशीलता भी जड़ है। यह माया की शक्ति (विक्षेप) है, आत्मा का रूप नहीं है। माया का सब खेल है। ब्रह्म को निराकार कहा है। इसी चेतना के भीतर परा शक्ति है। इसी के गर्भ में अनन्त अस्तित्व है।

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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Jun 13, 2026

Sharir Hi Brahmand Photo

फोटो: पत्रिका

जिन पदार्थों में इन्द्रियों का विकास है, उन्हें चैतन्य कहा है। जिनमें इन्द्रियां कार्य नहीं करतीं वे अचेतन कहलाते हैं। इनमें चेतन श्रेष्ठ हैं, जड़ या अचेतन गौण। चेतन वर्ग चर है, जड़ विभाग अचर है। जड़ यानी भौतिक शरीर रूप, चेतन का अर्थ है समनस्क (मन सहित) इन्द्रिय भाव। अहिल्या स्त्री रूप में चैतन्या थी, पाषाण बनते ही जड़ हो गई। आत्मसत्ता अथवा आत्मा का अभाव चेतन-जड़ वर्ग का विभाजक नहीं है। आत्मा जड़ में भी है, चेतन में भी हैं। इनका विभाजक इन्द्रिय भाव है। जिन पदार्थों में इन्द्रियों का विकास है, वे चेतन हैं। जिनमें यह विकास नहीं वे जड़ है। जिनमें पृथ्वी का भूत भाग ही व्यक्त रहता है, ऐसे लौह, पाषाण, मृत्पिण्डादि-शरीरजावी-अनिन्द्रिय पार्थिव पदार्थ जड़ हैं। जिनमें पृथ्वी के साथ चान्द्र भाग भी व्यक्त हो जाता है, वे सेन्द्रिय-चेतन जीव कहलाते हैं। इनकी चार श्रेणियां हैं—कृमि, कीट, पक्षी, पशु। इनमें विशेष प्रकार के सर्प, भ्रमर, कीट, पिक-शुक, हाथी-घोड़े आदि में बुद्धिशीलता के उदाहरण भी हैं। जिनमें चन्द्रमा के साथ-साथ सूर्य के प्राण भी जुड़ जाते हैं वे बुद्धिजीवी होते हैं। पशु आदि में जीव है, किन्तु आत्मा? आत्मा भी है, किन्तु विभूति रूप से। जिस प्राणी में आत्मभाव की पूर्ण अभिव्यक्ति हो, वही श्रेष्ठतम मानव सर्ग है।

असंज्ञ जीवों में माया ही शरीर है। भीतर प्रतिष्ठित चेतना ब्रह्म है। इनमें मन एवं इन्द्रियों की अपरिपक्वता माया का ही प्रभाव है। आत्मबोध के अभाव के कारण सभी जड़ पदार्थ प्रकृति के नियमों से ही चलते हैं। यहां ज्ञान की संभावना नहीं रहती। यद्यपि ब्रह्म तो है। चेतना भी है, किन्तु अभिव्यक्त नहीं होती। मन-बुद्धि के अभाव के कारण सुख-दु:ख की अनुभूति नहीं है। आत्मा से जड़ न होते हुए भी माया के प्रभाव से लगता है कि वे जड़ हैं। पत्थर के भीतर का आकाश (अवकाश) परमात्मा ही है।

जड़ का अस्तित्व ही सत है। उसका होना- कहीं-कहीं वृद्धि होना सत्व को ही प्रतिबिंबित करता है। चेतना का अंश सुप्त रहता है। मूच्र्छित हो मानो। तमोगुण की प्रधानता होने से आवरण रूप में है। सत्व-रजस् अत्यल्प मात्रा में रहते हैं। अत: आत्मा को यात्रा करनी पड़ती है। क्रमश: ससंज्ञ-अन्त:संज्ञ-पशु-मानव आदि योनियों से गुजरना पड़ता है। शुद्ध ब्रह्म के रहते हुए भी चेतना आवृत रहती है। पत्थर बढ़ते भी हैं, किन्तु उनमें चेतना प्रभावित नहीं होती। अन्त:संज्ञ वृक्ष आदि जीवों और ससंज्ञ मनुष्य आदि चेतन जीवों का क्रम से परिवर्धन दिखता है। उनमें बाल्य, तारुण्य आदि विशेष अवस्था वृद्धि का स्वरूप प्रतीत कराती है।

असंज्ञ पदार्थों में तमोगुण के साथ रज-सत्व के अंश भी रहते हैं। इसी कारण उनमें वृद्धि दिखाई देती है। वृद्धि का अर्थ यहां चेतना नहीं है, संयोग-वियोग का भौतिक नियम है। बर्फ घटता-बढ़ता है किन्तु संज्ञ नहीं है। यह वृद्धि या क्षरण उपाधि के स्तर पर होता है। आत्मा के स्तर पर नहीं होता। जैविक वृद्धि में आंतरिक चेतना की क्रिया रहती है। यह चेतना का मात्र आभास है। अजैविक वृद्धि में केवल रासायनिक/भौतिक क्रिया है। संवेदन नहीं है।

प्रकृति में गतिशीलता भी जड़ है। यह माया की शक्ति (विक्षेप) है, आत्मा का रूप नहीं है। माया का सब खेल है। ब्रह्म को निराकार कहा है। इसी चेतना के भीतर परा शक्ति है। इसी के गर्भ में अनन्त अस्तित्व है। यह शक्ति है कामना रूप-चेतना का आन्तरिक स्पन्दन-कुछ बनने का। सृजन की इच्छा, जिससे द्वैत का उदय होता है। एक चेतना, एक शक्ति। एक ज्ञान रूप, एक क्रिया रूप। ब्रह्म बेबस है - कर्ता भाव नहीं है। माया की अनंतता सर्वविदित है। माया ही इच्छा है, आमुखता है। सृजन के लिए माया का महामाया रूप, प्रकृति स्वरूप- सत-रज-तम रूप ही कार्यरत रहता है। इस माया भाव को समझना बहुत दुष्कर है। जैसा कि स्वयं कृष्ण भी कह रहे हैं-
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ (गीता ७.१४)

सारा जगत ब्रह्म का विवर्त है। माया ही ब्रह्म की शक्ति है। विश्व विवर्त माया का खेल है। ब्रह्म तो कामना करके मानो सो गया और माया मुखिया बनकर बैठ गई। अब ब्रह्म के हाथ में कुछ नहीं रह गया। ब्रह्म भी माया के चंगुल से कैसे छूटे! माया ही नर को प्रेरित करती है। नारी कामना का मूल स्रोत है। क्षुधा रूप यह कामना चेतना के जागरण के बाद जागती है। पुरुष कब आगे बढ़ जाता है, कब माया आहुत हो जाती है - एक स्वप्न जैसा खेल लगता है। इस बीच माया का रचना संसार आगे बढ़ जाता है।

विश्व में न तो कामना के नियम-कायदे ही हैं, और न ही 'बहुस्याम्' की कोई मर्यादा। समाज ने भिन्न-भिन्न रूप में मर्यादाएं तय करने के प्रयास भी किए हैं, किन्तु सभी मुखौटे बनकर रह गईं। कुछ प्रारब्ध से, तो कुछ लाचारी से, और कुछ स्वभावगत आचरण से। सभ्यता की भी अपनी एक दिशा होती है।

क्या सारे नियम तथा विस्तार का प्रारूप मानव योनि के लिए ही बना है? बाकी योनियों का अस्तित्व भी तो मानव योनि पर ही टिका है। शेष योनियां मानव के कर्मों की ही भोग योनियां हैं। किन्तु हर योनि में भूमिका तो माया की ही दिखाई देती है। उदाहरण के लिए समुद्री घोड़े की मादा अण्डे देकर नर घोड़े के शरीर में रख देती है। मादा कोयल अपने अण्डे कौवे के घोंसले में रख आती है। नर कोयल ऊंची आवाज में कुहू-कुहू करके उपस्थिति दर्ज कराता है। उसकी आवाज की सीमा में यदि कोयल (मादा) सुनती है तो मन्द आवाज देकर आमंत्रित करती है। कोयल (नर) वहां पहुंचता है।

स्त्री त्रिकालदर्शी कहलाती है। जिस प्रकार वह सन्तान के तीनों काल जानती है, वह अपने पति के हृदय से जुड़कर उसको अपने अन्तर्मन में समझती रहती है। उसका निर्माण करती रहती है। यह कार्य स्वयं पुरुष नहीं कर सकता। कृष्ण दुर्योधन से समझौता करने जा रहे थे। द्रौपदी को खटका हुआ। यदि समझौता हो गया तो उसका संकल्प कभी पूरा नहीं होगा। कब भीम दु:शासन को मारेगा, एवं कब वह अपने केश उसके खून से रंगेगी। उसने तपाक से कृष्ण को रोका। ''तुम जा रहे हो तो समझौता कैसे नहीं होगा! तब मेरा क्या होगा?'' कृष्ण मुस्कुराए - ''कृष्णे! मुझ पर भरोसा नहीं है, तो दुर्योधन पर तो करो।'' स्त्री की आंख भविष्य पर रहती है, दूसरी आंख सूक्ष्म शरीर-आत्मा-पर। पुरुष वर्तमान से बंधा रहता है।

इसमें भी एक बड़ा भेद यह है कि माया ब्रह्म की शक्ति है। क्रिया भाव न होने से अधिकांशत: सुप्त अवस्था में रहती है। सृजनात्मक स्त्रैण ऊर्जा तब तक सुप्त रहती है जब तक योग-प्रार्थना-आग्रह करके उसे जगाया न जाए। ब्रह्मांश पुरुष का अंश है। पत्नी जीवन की ऊर्जा है। स्थिर चेतना को जीवन और अनुभूति देती है। उसके हर इंगित 'बहुस्याम्' के संकेत होते हैं - कुछ स्पष्ट, कुछ परोक्ष। इसका अर्थ यही है कि वह जीव को लौटने से रोकना चाहती है। विश्व ही उसका साम्राज्य है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com