
बाबूलाल जाजू, पशु पक्षी विशेषज्ञ
देश में डॉग बाइट की घटनाएं अब केवल स्थानीय समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर का गंभीर जनस्वास्थ्य संकट बन चुकी है। लगभग प्रतिदिन किसी न किसी शहर से बच्चों, महिलाओं अथवा बुजुर्गों पर लावारिस श्वानों के हमले की खबर सामने आती है। कई घटनाओं में मासूम बच्चों की दर्दनाक मृत्यु तक हो जाती है। हर बार घटना के बाद नगर निकायें सक्रिय होने का दिखावा करती है, बैठकें होती हैं, निर्देश जारी होते हैं और कुछ दिनों तक अभियान चलाने की घोषणाएं होती हैं। लेकिन जैसे-जैसे घटना लोगों की स्मृति से धुंधली पड़ती है, वैसे-वैसे प्रशासन की सक्रियता भी समाप्त हो जाती है। परिणाम यह होता है कि कुछ समय बाद फिर कोई नई घटना सामने आ जाती है और वही क्रम दोहराया जाता है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इस भयावह स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या केवल लावारिस डॉग जिम्मेदार हैं या फिर वे नगर निकायें भी, जिन पर कानून के अनुसार उनकी संख्या नियंत्रित करने और जनसुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है?
कानून को नहीं दी गई प्राथमिकता
भारत सरकार ने वर्ष 2001 में एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स, 2001 लागू किए थे। इन नियमों का उद्देश्य लावारिस श्वानों को मारना नहीं, बल्कि उनका वैज्ञानिक तरीके से बधियाकरण एवं एंटी रेबीज टीकाकरण कर उनकी संख्या को नियंत्रित करना था। इन नियमों के अनुसार हर महानगर निगम, नगर निगम, नगर परिषद एवं नगर पालिका की यह कानूनी जिम्मेदारी है कि वह अपने क्षेत्र में नियमित रूप से बधियाकरण कार्यक्रम संचालित करे। यदि इन नियमों का ईमानदारी और निरंतर पालन वर्ष 2001 से ही किया गया होता, तो आज राजस्थान सहित पूरे देश में डॉग बाइट की घटनाएं इतनी भयावह स्थिति तक नहीं पहुंचतीं। वास्तविकता यह है कि अधिकांश शहरी निकायों ने वर्षों तक इस कानून को प्राथमिकता ही नहीं दी। जब तक जनता का दबाव नहीं बना, तब तक कई स्थानों पर बधियाकरण अभियान शुरू ही नहीं किए गए। जहां अभियान चलाए भी गए, वहां उनकी गुणवत्ता, पारदर्शिता और वास्तविक उपलब्धियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े होते रहे। अनेक स्थानों पर हजारों श्वानों के बधियाकरण के दावे किए गए, लेकिन जमीन पर उनकी संख्या और प्रभाव दिखाई नहीं दिए। यदि स्वतंत्र एजेंसियों से इन अभियानों का सामाजिक एवं तकनीकी ऑडिट कराया जाए, तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। केवल कागजों में लक्ष्य पूरे कर देना और बजट खर्च दिखा देना समस्या का समाधान नहीं है।
मनुष्य और पशु के बीच संतुलित सह-अस्तित्व करना जरूरी
यह समझना आवश्यक है कि डॉग बाइट की समस्या का स्थायी समाधान केवल घटनाओं के बाद कुत्तों को पकडऩे से नहीं होगा। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि यदि किसी क्षेत्र में नियमित रूप से बड़े पैमाने पर बधियाकरण और एंटी रेबीज टीकाकरण किया जाए, तो कुछ वर्षों में कुत्तों की आबादी नियंत्रित होने लगती है, उनका प्रजनन नियंत्रित होता है और आक्रामक व्यवहार में भी कमी आती है। यही कारण है कि विश्व के अनेक देशों में इसी मॉडल से सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है, जिस पर बहुत कम चर्चा होती है। हमारी भारतीय संस्कृति में सभी जीवों के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व की भावना रही है। एक रोटी गाय को और एक रोटी कुत्ते को देने की परम्परा रही है। पहले गांवों और शहरों में गायों और कुत्तों के लिए रोटी दी जाती थी इससे वे भोजन की तलाश में इधर-उधर नहीं भटकते थे और आकामक नहीं होते थे। आज शहरीकरण, कचरा प्रबंधन की अव्यवस्था और भोजन के पारंपरिक स्रोत समाप्त होने से कई आवारा कुत्ते भूख और असुरक्षा का सामना करते हैं। भूख, झुंड की प्रतिस्पर्धा और लगातार बढ़ता तनाव उन्हें अधिक आक्रामक बना सकता है। इसलिए जहां एक ओर नियमित बधियाकरण और टीकाकरण अनिवार्य है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर नियत स्थानों पर भोजन और पानी की मानवीय व्यवस्था भी आवश्यक है। इससे मनुष्य और पशु के बीच संतुलित सह-अस्तित्व स्थापित किया जा सकता है।
तात्कालिक अभियान चलाना पर्याप्त नहीं
डॉग बाइट की प्रत्येक बड़ी घटना के बाद केवल संवेदना व्यक्त करना या तात्कालिक अभियान चलाना पर्याप्त नहीं है। सरकारों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रत्येक नगर निकाय से प्रतिवर्ष यह जवाब लिया जाए कि कितने कुत्तों का वास्तविक बधियाकरण हुआ, कितनों का टीकाकरण हुआ, उनका डिजिटल रेकॉर्ड कहां है और उसका स्वतंत्र सत्यापन किसने किया। यदि किसी निकाय ने वर्षों तक अपने वैधानिक दायित्वों की उपेक्षा की है, तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। जनसुरक्षा से जुड़े विषयों में लापरवाही को सामान्य प्रशासनिक कमी मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह भी आवश्यक है कि स्टरलाइजेशन की निगरानी के लिए शहरवासियों में से चुनिंदा लोगों को भी निगरानी समिति में लिया जाए ताकि पारदर्शिता रहे। आज आवश्यकता किसी नए कानून की नहीं, बल्कि वर्ष 2001 से बने कानून को ईमानदारी से लागू करने की है। यदि प्रत्येक नगर निकाय अपने वैधानिक दायित्व का गंभीरता से पालन करे, नियमित बधियाकरण एवं टीकाकरण सुनिश्चित करे, कार्यों का स्वतंत्र ऑडिट कराए और समाज भी जीवों के प्रति अपनी संवेदनशील परंपरा को पुनर्जीवित करे, तो डॉग की संख्या नियंत्रित होगी और बाइट की घटनाओं में कमी आएगी।