
कर्नाटक ने समाज के सबसे महत्वपूर्ण पेशों में से एक को सम्मान देने की दिशा में एक छोटा, लेकिन महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य ने घोषणा की कि शिक्षक अपने नाम के आगे Tr उपसर्ग का इस्तेमाल कर सकते हैं जैसे डॉक्टरों के लिए Dr. और प्रोफेसरों के लिए Prof. होता है। यह उस पेशे के प्रति सम्मान का प्रतीक है, जो जीवनभर युवा मन को आकार देता है। इस निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए। हर डॉक्टर, इंजीनियर, उद्यमी, वैज्ञानिक, सिविल सेवक, सैनिक और राजनीतिक नेता के जीवन में कोई न कोई शिक्षक रहा है, जिसने उसकी यात्रा को प्रभावित किया है। शिक्षक केवल विषय नहीं पढ़ाते, वे बच्चों को उनकी क्षमताओं को पहचानने, आत्मविश्वास विकसित करने और जीवन के लिए तैयार होने में मदद करते हैं।
भारत में शिक्षकों को लंबे समय से बहुत सम्मान देने की बात कही जाती रही है, लेकिन इन बातों और वास्तव में इस पेशे को मिलने वाले सम्मान के बीच आज भी एक अंतर है। शिक्षकों की संख्या बताती है कि यह मुद्दा कितना महत्वपूर्ण है। यूडाइस 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के स्कूलों में लगभग 14.72 लाख स्कूलों में 1.01 करोड़ से अधिक शिक्षक हैं, जो करीब 24.69 करोड़ विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं। यह दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षक व्यवस्थाओं में से एक है। लगभग 69 प्रतिशत स्कूल सरकारी हैं। इनमें कुल शिक्षकों के आधे से कुछ अधिक शिक्षक कार्यरत हैं और वे लगभग आधे विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं। दूसरी ओर, निजी स्कूल कुल स्कूलों के लगभग एक पांचवें हिस्से में हैं, लेकिन उनमें करीब 38 प्रतिशत शिक्षक कार्यरत हैं और लगभग एक-तिहाई विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं। विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात में भी लगातार सुधार हुआ है- प्रारंभिक स्तर पर 15:1 से घटकर 10:1, माध्यमिक से पहले के स्तर पर 26:1 से 17:1 और माध्यमिक स्तर पर 31:1 से 21:1। अब यह अनुपात राष्ट्रीय शिक्षा नीति में सुझाई गई प्रति शिक्षक अधिकतम 30 विद्यार्थियों की सीमा के भीतर है। फिर भी औसत आंकड़े पूरी तस्वीर नहीं बताते। आज भी एक लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक है। लेकिन कोई भी उपाधि, चाहे वह कितनी भी सम्मानजनक क्यों न हो, अकेले किसी पेशे का दर्जा नहीं बदल सकती।
यदि शिक्षक वास्तव में समाज की नींव रखते हैं, तो यह विश्वास उनके वेतन, काम की परिस्थितियों और सामाजिक सम्मान में भी दिखाई देना चाहिए। वारकी फाउंडेशन के ग्लोबल टीचर स्टेटस इंडेक्स में शिक्षक के सामाजिक दर्जे और शिक्षा के परिणामों के बीच संबंध बताया गया है। 35 देशों में 2018 में किए गए उसके अध्ययन में पाया गया कि 28 देशों में शिक्षकों को जनता की नजर में उनके उचित वेतन से कम भुगतान किया जाता था। यूनेस्को ने भी 2030 तक दुनिया में लगभग 4.4 करोड़ शिक्षकों की कमी की चेतावनी दी है। यदि भारत चाहता है कि उसकी सबसे प्रतिभाशाली युवा पीढ़ी शिक्षण को पहली पसंद बनाए, न कि कोई दूसरा विकल्प नहीं मिलने पर इसे चुने, तो इस पेशे में सम्मान, बेहतर वेतन और आगे बढऩे के अवसर होने चाहिए। दूसरे देशों से भी कुछ उपयोगी सीख ली जा सकती है। फिनलैंड में शिक्षण व्यवस्था पेशेवर विश्वास पर आधारित है। वहां शिक्षकों के लिए मास्टर स्तर की योग्यता व उच्च स्तर का शिक्षण-प्रशिक्षण जरूरी है। उन्हें स्वतंत्रता दी जाती है, पर उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। सिंगापुर में शिक्षक बनने वालों का चयन शैक्षणिक योग्यता की समीक्षा, साक्षात्कार व कुछ मामलों में ऐसी परिवीक्षा अवधि के आधार पर किया जाता है, जिसमें संवाद क्षमता, सहानुभूति व सीखने की इच्छा को परखा जाता है।
शिक्षक कौन बने, शायद इस पूरी चर्चा का महत्वपूर्ण हिस्सा यही है। यदि हम शिक्षक का दर्जा बढ़ाना चाहते हैं, तो शिक्षक बनने के लिए आवश्यक मानकों को भी ऊंचा करना होगा। भारत को अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आधारित ऐसी चयन व्यवस्था पर विचार करना चाहिए, जो केवल अंकों या एक परीक्षा तक सीमित न हो। इसमें विषय का ज्ञान तो परखा ही जाए, साथ ही संवाद क्षमता, सहानुभूति, तर्क करने की क्षमता और भावनात्मक परिपक्वता को भी महत्व दिया जाए क्योंकि केवल बी.एड डिग्री पर्याप्त नहीं है। साक्षात्कार, कक्षा में पढ़ाने का प्रदर्शन और किसी अनुभवी शिक्षक की निगरानी में व्यावहारिक प्रशिक्षण भी चयन प्रक्रिया का हिस्सा हो सकते हैं। यह ओईसीडी की उस सोच के अनुरूप होगा, जिसमें विषय पर मजबूत पकड़ के साथ उसे प्रभावी ढंग से पढ़ाने की क्षमता पर भी जोर दिया जाता है। यह किसी वर्ग विशेष को बढ़ावा देने की बात नहीं है, यह शिक्षण को वास्तव में एक पेशेवर पेशा बनाने की बात है। अच्छे लोगों का चयन करें, उन्हें अच्छा प्रशिक्षण दें, उन्हें काम करने की स्वतंत्रता दें और उनके काम के लिए जवाबदेह भी बनाएं। अधिक सम्मान के साथ अधिक जिम्मेदारी भी आती है। आज का शिक्षक केवल जानकारी देने वाला व्यक्ति नहीं हो सकता। शिक्षक की वास्तविक भूमिका बच्चों को यह सिखाने में है कि वे जो सीखते हैं, उस पर सवाल कैसे करें, उसे समझें और उसका जीवन में उपयोग कैसे करें। शिक्षा केवल गणित, विज्ञान, भाषाओं और इतिहास तक सीमित नहीं हो सकती चरित्र और नागरिकता की समझ भी उसका हिस्सा है। 2047 का भारत तकनीक आधारित अर्थव्यवस्था के लिए वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, उद्यमियों और शोधकर्ताओं की मांग करेगा। शिक्षकों को बच्चों में रटने की आदत नहीं, बल्कि जिज्ञासा पैदा करनी होगी। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि 'मुझे क्या याद रखना है?' बल्कि यह होना चाहिए कि 'मैं कैसे सोचूं और समस्या का समाधान कैसे करूं?' जो बच्चा पानी बचाना और सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान सीखता है, वह इन आदतों को कक्षा से बाहर भी अपने जीवन में लेकर जाता है।
Tr उपसर्ग वाले शिक्षक को ज्ञान को अद्यतन करते रहना चाहिए और विद्यार्थियों के साथ निष्पक्षता व सम्मान से व्यवहार करना चाहिए। इसका समाधान अधिक कागजी काम नहीं है, बल्कि जटिल होती भूमिका निभाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण, संसाधन और काम करने की स्वतंत्रता देना है। भारत और उसके शिक्षकों के बीच समझौता सरल होना चाहिए- सम्मान, बेहतर वेतन व अच्छी तरह पढ़ाने की स्वतंत्रता के बदले जिम्मेदार नागरिक एवं राष्ट्र निर्माता तैयार करना। इस नजरिये से देखें तो Tr का अर्थ टीचर, ट्रस्ट व ट्रांसफॉर्मेशन- अर्थात शिक्षक, विश्वास और बदलाव तीनों हो सकता है। यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो यह बदलाव वहीं से शुरू होगा, जहां हर पीढ़ी की यात्रा शुरू होती है- कक्षा में, एक शिक्षक के मार्गदर्शन में।
(स्वतंत्र निदेशक एवं मैनेजमेंट कंसलटेंट)