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जीनोमिक अनुसंधान से सटीक इलाज की ओर कदम

जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट के तहत देश की विविध आबादी पर आधारित एक व्यापक जीनोमिक डेटाबेस तैयार किया गया है। इसमें देश की भाषाई, भौगोलिक, जनजातीय एवं गैर-जनजातीय समुदायों के 9,768 लोगों के संपूर्ण जीनोम का अध्ययन किया गया। इससे लगभग 13 करोड़ आनुवंशिक भिन्नताओं (जेनेटिक वैरिएंट्स) की पहचान की गई है, जिनमें से लगभग 4.4 करोड़ पहले वैश्विक डेटाबेस में दर्ज नहीं थे।
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Jul 12, 2026
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जीनोम इंडिया प्रोजक्ट के तहत भारतीय आबादी का पहला आनुवंशिक डेटाबेस तैयार

देश में स्वास्थ्य और विज्ञान को नया आकार देने वाले जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट के तहत लगभग 10 हजार लोगों के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण का डेटाबेस तैयार कर लिया गया है। भारतीय विज्ञान संस्थान का मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र (सीबीआर) इस परियोजना का समन्वयक केंद्र है। सीबीआर की प्रमुख महिला वैज्ञानिक प्रोफेसर ब्रतती काहाली संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण से संबंधित डेटा के निर्माण, प्रोसेसिंग और विश्लेषण में केंद्रीय भूमिका निभा रही है। डॉ. काहाली से राजस्थान पत्रिका के राजीव मिश्रा ने इस परियोजना की बारीकियों और लाभ के बारे में विस्तार से बातचीत कीं। पेश हैं संक्षिप्त अंश:

प्रश्न- जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट भारत के लिए क्यों जरूरी है? एक आम नागरिक के लिए इसकी क्या उपयोगिता है?

विविधताओं के लिहाज से भारतीय आबादी विश्व में सबसे बड़ी है। यह हजारों वर्षों के प्रवास, सांस्कृतिक भिन्नता और अंतर्विवाह की परंपरा से बनी है। इसकी आनुवंशिक संरचना भी विशिष्ट है। इसके बावजूद वैश्विक जीनोमिक डेटाबेस (आनुवंशिक आंकड़ों) में भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व नगण्य है। बीमारियों के मूल कारण को समझने, नई दवाओं की खोज और सटीक इलाज के लिए यह बेहद आवश्यक है, लेकिन अधिकांश आनुवंशिक जानकारियां यूरोपीय मूल के लोगों के अध्ययन पर आधारित है। चूंकि, एक आबादी से प्राप्त आनुवंशिक निष्कर्ष, दूसरी आबादी पर हमेशा प्रभावी नहीं होते इसलिए दक्षिण एशियाई, विशेषकर भारतीयों के स्वास्थ्य संबंधी खतरों की सटीक पहचान नहीं हो पाती। इस कमी को दूर करने के लिए जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट के तहत देश की विविध आबादी पर आधारित एक व्यापक जीनोमिक डेटाबेस तैयार किया गया है। इसमें देश की भाषाई, भौगोलिक, जनजातीय एवं गैर-जनजातीय समुदायों के 9,768 लोगों के संपूर्ण जीनोम का अध्ययन किया गया। इससे लगभग 13 करोड़ आनुवंशिक भिन्नताओं (जेनेटिक वैरिएंट्स) की पहचान की गई है, जिनमें से लगभग 4.4 करोड़ पहले वैश्विक डेटाबेस में दर्ज नहीं थे। इस तरह एक रेफरेंस जीनोमिक डेटाबेस तैयार हुआ है, जिससे यह समझने में मदद मिलेगी कि विभिन्न समुदायों में कौन-कौन से आनुवंशिक बदलाव चिकित्सकीय दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण है और अलग-अलग दवाओं पर उनकी प्रतिक्रिया क्या हो सकती है। बीमारियों का जल्दी पता लगाने, उनकी रोकथाम और भविष्य में बेहतर आरोग्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिहाज से यह एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

प्रश्न- यह भारत की जैव-प्रौद्योगिकी को कैसे प्रभावित कर सकता है?

यह जीनोमिक्स आधारित अनुसंधान एवं नवाचार के लिए आवश्यक बुनियादी संसाधन उपलब्ध कराएगा। बीमारियों के सटीक डायग्नोसिस, इलाज के तरीकों और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जैव-प्रौद्योगिकी अनुसंधान में मदद मिलेगी। आनुवंशिक बदलावों (दुर्लभ अथवा सामान्य) के आधार पर रोगों की सही पहचान, दवाओं और उनके उचित डोज के चयन, दवाओं की प्रतिक्रिया का बेहतर अनुमान लगाया सकेगा। इस परियोजना की एक प्रमुख उपलब्धि भारतीय इम्प्यूटेशन रेफरेंस पैनल का तैयार होना है। सरल शब्दों में कहें, तो इससे एक सामान्य भारतीय आबादी के डीएनए का नक्शा तैयार करने और उनके स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों का एक मॉडल तैयार करने में मदद मिलेगी। भारत केवल विदेशों में विकसित जीनोमिक तकनीकों का उपयोग करने वाला देश नहीं रहेगा, बल्कि जीनोमिक्स के क्षेत्र में नए ज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार विकसित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक योगदानकर्ता भी बन सकेगा।

प्रश्न- जीनोम सीक्वेंसिंग से पर्सनलाइज्ड मेडिसिन तैयार किया जा सकेगा? भारत में यह कब तक संभव है? इस दिशा में अड़चनें क्या-क्या हैं?

बेशक, जीनोम सीक्वेसिंग पर्सनलाइज्ड मेडिसिन का एक अहम आधार है, लेकिन यह एकमात्र समाधान नहीं है, जो तुरंत हर बीमारी का पता लगा ले या उसका इलाज कर दे। पर्सनलाइज्ड मेडिसिन का अर्थ है, किसी व्यक्ति की आनुवंशिक जानकारी के साथ-साथ उसके चिकित्सकीय इतिहास (मेडिकल हिस्ट्री), जीवनशैली और अन्य कारकों को ध्यान में रखकर बीमारी की पहचान करना, उसकी रोकथाम के लिए सही दवा का चयन करना और दवा की उचित मात्रा के बारे में निर्णय करना। जीनोम इंडिया ने पहले ही भारतीय आबादी में जनसंख्या आधारित कुछ फार्माकोजीनोमिक अंतर की पहचान की है। यानी, आनुवंशिक भिन्नता के आधार पर अलग-अलग लोग कुछ दवाओं के प्रति कैसी प्रतिक्रिया करते हैं। इससे भविष्य में किसी व्यक्ति विशेष के लिए सही दवा और उसकी उचित मात्रा तय करना अधिक आसान हो सकता है। इसके व्यापक चिकित्सकीय उपयोग के लिए एक मजबूत व्यवस्था विकसित करनी होगी। इसमें आनुवांशिक भिन्नताओं को जन्मजात रोगों से जोडऩे वाले अध्ययन, अस्पतालों और इलेक्ट्रोनिक हेल्थ रेकॉर्ड के साथ जीनोमिक जानकारी का इंटीग्रेशन, प्रशिक्षित आनुवंशिक परामर्शदाता, सस्ती जीनोमिक परीक्षण सुविधा तथा स्पष्ट नैतिक एवं कानूनी ढांचा आवश्यक है।

प्रश्न- क्या गर्भावस्था के दौरान ही थैलेसीमिया या सिकल सेल एनीमिया का पता लगाया जा सकता है? अगर हां, तो क्या इनका इलाज गर्भ में ही किया जा सकता है? क्या जीन एडिटिंग की जरूरत है?

जीनोमिक्स की मदद से कुछ वंशानुगत आनुवंशिक रोगों का गर्भावस्था के दौरान पता लगाया जा सकता है, अगर उनसे जुड़े आनुवंशिक बदलावों की जानकारी हो। जैसे, भारत में बीटा-थैलेसीमिया और सिकल सेल रोग का काफी प्रकोप है। हालांकि, रोग का पता लगाना और उसका इलाज दो अलग-अलग बाते हैं। प्रसव पूर्व जांच से यह पता लगाया जा सकता है कि भू्रण में कोई ज्ञात आनुवंशिक रोग है या नहीं? इसके बाद कई विकल्प हैं, जिनमें विवेकपूर्ण प्रजनन संबंधी फैसले, जन्म के बाद आवश्यक उपचार, विशेष चिकित्सकीय देखभाल आदि शामिल हैं। गंर्भ के अंदर ही आनुवंशिक रोगों का इलाज अभी काफी हद तक प्रायोगिक चरण में है। भू्रण के जीन में संशोधन (जीन एडिटिंग) अभी नियमित चिकित्सा पद्धति का हिस्सा नहीं है। जीन एडिटिंग के मामले में वैज्ञानिक, नैतिक और सुरक्षा संबंधी कई चुनौतियां हैं। निकट भविष्य में जीनोमिक्स का सबसे बड़ा लाभ गर्भ में ही रोगों की शीघ्र पहचान, उनकी रोकथाम, आनुवंशिक परामर्श और जन्म के बाद बेहतर उपचार की योजना बनाने में मिलेगा।

प्रश्न- दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत को जीनोम सीक्वेसिंग से किस तरह का फायदा होगा? क्या डायबिटीज जैसी बीमारियों को हमेशा के लिए दूर किया जा सकेगा?

भारतीयों की आनुवंशिक विविधता अनोखी है। जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट से मालूम हुआ कई ऐसे वैरिएंट (जीन के प्रकार) जो दुनिया भर में दुर्लभ हैं, भारत के कुछ खास समुदायों में आम हैं। यह एक महत्त्वपूर्ण खोज है, क्योंकि अलग-अलग समुदायों में रोगों का खतरा और दवाओं का असर अलग-अलग हो सकता है। डायबिटीज जैसी जटिल बीमारियों के मामले में जीनोमिक्स हमें यह समझने में मदद कर सकता है कि किन लोगों में आनुवंशिक कारणों से डायबिटीज का खतरा अधिक है। दूसरा, जीन का खान-पान और जीवनशैली से क्या संबंध है और क्यों कुछ लोगों पर इलाज का असर अलग-अलग तरीके से होता है। इन सवालों के जवाब जानने के लिए ऐसी बीमारियों पर बड़े पैमाने पर शोध की आवश्यकता है। डायबिटीज या कुछ अन्य जटिल रोग सिर्फ जीन की वजह से नहीं होते। इनमें जीवनशैली, पर्यावरण और अन्य कारक भी अहम भूमिका निभाते हैं। जीनोमिक्स बीमारी से जुड़े जीन की पहचान करने, खतरे का अनुमान लगाने, रोकथाम और हर व्यक्ति के हिसाब से इलाज में मदद कर सकता है, लेकिन इस बात की संभावना कम है कि सिर्फ सीक्वेसिंग से डायबिटीज को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकेगा।

प्रश्न- अध्ययन में अब तक हुई प्रगति के आधार पर कौन सी चुनौतियां सामने आ रही हैं?

जीनोम इंडिया प्रोजेक्ट ने देश में आनुवंशिक अनुसंधान की मजबूत नींव रखी है, लेकिन इसके सामने अभी कई महत्त्वपूर्ण चुनौतियां हैं। हालांकि, यह अभी तक का सबसे बड़ा भारतीय जीनोमिक अध्ययन है, लेकिन देश की पूरी आनुवंशिक विविधता इसमें शामिल नहीं हो सकी है। अनेक समुदाय जिनका आनुवंशिक इतिहास अनोखा और अलग है, उनके नमूने भी संग्रहित करने होंगे। कौन से आनुवंशिक बदलाव, किस जन्मजात बीमारी के लिए जिम्मेदार हैं, इसे समझने के लिए बड़े पैमाने पर शोध की जरूरत होगी। आनुवंशिक बदलावों की पहचान मात्र से यह साबित नहीं हो जाता कि बीमारी की असली वजह वही है। चिकित्सकीय पुष्टि और वैज्ञानिक सत्यापन भी आवश्यक होता है। इसके अलावा जीनोमिक अनुसंधान के निष्कर्षों को आम लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बनाने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होगी। जैव-नमूनों और जीनोमिक डेटा के सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था, उच्च क्षमता वाले कंप्यूटेशनल सिस्टम, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी और जेनेटिक काउंसलर के अलावा जीनोमिक चिकित्सा के लिए स्पष्ट नैतिक और कानूनी ढांचे का विकास जरूरी है। यदि किसी खास समुदाय में कोई जन्मजात गंभीर विकार (जैसे सिकल सेल एनीमिया या थैलेसीमिया) का पता चलता है, तो शादी से पहले या नवजात शिशु की स्क्रीनिंग कर पूरी पीढ़ी को इसके असर से लडऩेे में मददगार बना सकते हैं। यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जीनोमिक्स का लाभ केवल उन लोगों तक सीमित न रहे जिन्हें उन्नत स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसका लाभ देश के सभी समुदायों तक पहुंचना चाहिए।

- इस परियोजना की सबसे बड़ी और दिलचस्प खोज भारत की असाधारण आनुवंशिक विविधता रही। अध्ययन में बड़ी संख्या में ऐसे नए जीन वेरिएंट मिले, जिनमें कई केवल भारतीय या कुछ विशेष समुदायों तक सीमित हैं। ये रोगों के खतरे और दवाओं के असर को समझने में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
शोध से यह भी पता चला कि भारतीय आबादी आनुवंशिक रूप से एक जैसी नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों, भाषाओं और समुदायों का अपना विशिष्ट आनुवंशिक इतिहास है। यही विविधता भविष्य में रोगों की बेहतर पहचान, सटीक इलाज और नई दवाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

Updated on:
12 Jul 2026 07:00 pm
Published on:
12 Jul 2026 07:00 pm