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जनमत में पिछड़े जर्मन चांसलर, फिर भी पद पर क्यों बने हुए हैं?

बर्लिन स्थित जर्मनी की राष्ट्रीय संसद - बुंडेस्टाग, किसी चांसलर को तभी हटा सकती है, जब वह साथ-साथ किसी उत्तराधिकारी का चुनाव भी कर ले। संघीय गणराज्य के इतिहास में ऐसा केवल एक बार हुआ है, जब वर्ष 1982 में हेल्मुट कोल इस प्रक्रिया के जरिये चांसलर बने थे।
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Updated: 4 Nov 2026, 5:53 PM IST
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जर्मनी के महज 14 प्रतिशत नागरिक ही फ्रेडरिक मर्ज को चांसलर पद के लिए सही विकल्प मानते हैं। देशभर में उनकी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) को लगभग 20 प्रतिशत लोगों का समर्थन हासिल है, जबकि धुर दक्षिणपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) करीब 30 प्रतिशत समर्थन के साथ आगे है। सितंबर में पूर्वी जर्मनी के सैक्सनी-आनहाल्ट राज्य में एएफडी ने 43.8 प्रतिशत वोट हासिल किए और राज्य की विधानसभा में पूर्ण बहुमत हासिल करने से वह महज तीन सीट पीछे रह गई। वहीं, सीडीयू को केवल 17.2 प्रतिशत वोट मिले। दुनिया के किसी भी उदार लोकतंत्र में इतने खराब आंकड़ों के साथ सरकार के मुखिया के लिए गंभीर राजनीतिक संकट पैदा हो जाता। लेकिन मर्ज अब भी अपने पद पर बने हुए हैं और बर्लिन में बहुत कम लोगों को उम्मीद है कि निकट भविष्य में स्थिति बदल सकेगी।

इसकी वजह जर्मनी का वह संविधान है, जिसे देश के पहले लोकतांत्रिक प्रयोग के कड़वे अनुभवों से मिले गहरे सबक के आधार पर तैयार किया गया था। 1919 से 1933 तक अस्तित्व में रहे वाइमर गणराज्य के पतन की एक बड़ी वजह यह थी कि संसद में वामपंथी और दक्षिणपंथी छोटे दल बिना कोई नई सरकार बनाए पुरानी सरकारों को गिरा सकते थे। अंतत: इसी का फायदा उठाकर एडोल्फ हिटलर सत्ता में आया था। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए 1949 में जर्मनी ने नया संविधान अपनाया, जिसे वहां बेसिक लॉ यानी मूल कानून कहा जाता है। इस मूल कानून में सरकार को हटाना बहुत मुश्किल बना दिया गया। बर्लिन स्थित जर्मनी की राष्ट्रीय संसद - बुंडेस्टाग, किसी चांसलर को तभी हटा सकती है, जब वह साथ-साथ किसी उत्तराधिकारी का चुनाव भी कर ले। संघीय गणराज्य के इतिहास में ऐसा केवल एक बार हुआ है, जब वर्ष 1982 में हेल्मुट कोल इस प्रक्रिया के जरिये चांसलर बने थे। जर्मनी की संसद खुद को भंग भी नहीं कर सकती। समय से पहले चुनाव केवल चांसलर की ओर से शुरू की गई एक प्रक्रिया के जरिये ही हो सकते हैं। इसके लिए चांसलर को संसद में विश्वास मत हासिल करना होता है।

यदि एक सोची-समझी रणनीति के तहत उनके सत्तारूढ़ गठबंधन के सदस्य जानबूझकर उनके खिलाफ वोट दे देते हैं और वह हार जाते हैं, तब जाकर संघीय राष्ट्रपति संसद को भंग कर सकते हैं। इसके अलावा राष्ट्रपति की भूमिका काफी हद तक औपचारिक ही होती है। वर्ष 2024 में तत्कालीन चांसलर ओलाफ शोल्त्स ने यही रास्ता अख्तियार किया था और उसके बाद हुए चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इस पूरी प्रक्रिया में अंतिम फैसला उसी व्यक्ति के हाथ में होता है, जिसे सत्ता गंवाने का सबसे अधिक खतरा होता है। मर्ज की सरकार में शामिल सीडीयू और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी) चाहें तो मौजूदा गठबंधन सरकार से अपना समर्थन वापस ले सकती हैं। लेकिन उसके सामने खुद की ही समस्याएं हैं। सामने आए जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक, यदि समय से पहले चुनाव कराए जाते हैं तो संसद के कई सदस्यों को अपनी सीट गंवानी पड़ सकती है और अनेक मंत्रियों को अपने पदों से हाथ धोना पड़ सकता है। इसलिए मर्ज से छुटकारा पाने की कोशिश करने वाले किसी भी नेता को इसकी भारी-भरकम राजनीतिक कीमत चुकाने के लिए तैयार रहना होगा। दूसरी ओर, मतदाताओं के पास भी मर्ज को उनका कार्यकाल पूरा होने से पहले पद से हटाने का कोई रास्ता नहीं है। उन्होंने 2025 के संघीय चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था। अब नियमित चुनाव का अगला अवसर 2029 में ही आएगा।

साप्ताहिक समाचार पत्र 'डी साइट' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चांसलर के करीबी लोग अल्पमत सरकार बनाने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं। इसके लिए एसपीडी को सत्तारूढ़ गठबंधन का साथ छोडऩा होगा और सीडीयू को संसदीय बहुमत न होते हुए भी अकेले सरकार चलानी होगी। सीडीयू को अलग-अलग विधेयकों और प्रस्तावों को पारित कराने के लिए अलग-अलग दलों का समर्थन जुटाना पड़ेगा। एएफडी का सहारा लिए बिना उसे उन्हीं प्रस्तावों तक सीमित रहना होगा, जिनका समर्थन सोशल डेमोक्रेट और ग्रीन पार्टी करने को तैयार हों। इससे सीडीयू के लिए उस मुद्दे पर ठोस कदम उठाने की गुंजाइश बहुत कम रह जाएगी, जिस पर उसके अनेक मतदाता उससे छिटक कर एएफडी के साथ चले गए हैं- यानी आव्रजन का मुद्दा। जर्मनी का राजनीतिक भविष्य शायद बर्लिन के बजाय सैक्सनी-आनहाल्ट की राजधानी मैग्डेबर्ग में तय हो। दिसंबर में राज्य की विधानसभा मंत्री-प्रमुख का चुनाव करेगी। यदि एएफडी इस पद पर काबिज होने में कामयाब रहती है, तो यह एक ऐसा राजनीतिक मील का पत्थर होगा जिसके परिणाम राज्य की सीमाओं से बहुत आगे तक जाएंगे। जर्मनी में यह पहला मौका होगा जब एएफडी जैसी दक्षिणपंथी पार्टी किसी राज्य सरकार का नेतृत्व करेगी। इससे सीडीयू पर दबाव और बढ़ जाएगा। एएफडी के साथ सहयोग नहीं करने के अपने फैसले पर कायम रहना उसके लिए पहले से ज्यादा मुश्किल होगा। फिलहाल मर्ज इसलिए अपने पद पर बने हुए हैं, क्योंकि कोई भी उनकी सरकार गिराने का जोखिम नहीं उठाना चाहता। लेकिन सवाल यह है कि जर्मनी आखिर कब तक उन्हें इस तरह पद पर बनाए रखने की राजनीतिक कीमत चुकाने का जोखिम उठा सकता है? (राल्फ बिलस्टीन सबस्टैक प्रकाशन 'कॉन्टिनेंटल ड्रिफ्ट' के लेखक हैं। इनके पास वित्तीय क्षेत्र में दो दशक से अधिक का अनुभव है)

राल्फ बिलस्टीन,(अर्थशास्त्री एवं सीएफए चार्टरहोल्डर)

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4 Nov 2026, 5:53 PM IST
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