सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र को सही मायनों में चरितार्थ करने के लिए भारत की रीढ़- यानी हमारे गांवों- को आर्थिक रूप से सशक्त करना ही एकमात्र विकल्प है । जब तक देश के किसान और मजदूर की जेब में बाजार में खर्च करने लायक पैसा नहीं होगा, तब तक न तो कारखानों के पहिए पूरी रफ्तार से घूमेंगे और न ही विकसित भारत का सपना यथार्थ के धरातल पर उतर पाएगा ।

विप्र गोयल,सामाजिक कार्यकर्ता
भारत की 150 करोड़ की विशाल आबादी को यदि हम आर्थिक चश्मे से देखें, तो यह व्यवस्था मुख्य रूप से चार श्रेणियों के एक पिरामिड में बंटी हुई नजर आती है । इस पिरामिड के सबसे निचले और सबसे बड़े आधार में देश के 6 लाख गांवों में निवास करने वाले वे 10 करोड़ ग्रामीण परिवार आते हैं, जिनकी आजीविका पूरी तरह से कृषि और पशुपालन पर निर्भर है ।
इसके ठीक ऊपर दूसरी श्रेणी है- कस्बों और छोटे शहरों में फैले 7 करोड़ सूक्ष्म (माइक्रो) उद्योगों की। गली-मोहल्ले की किराने की दुकानें, अचार-पापड़-डेयरी का घरेलू व्यापार करने वाले, ऑटो-टेम्पो व ई-रिक्शा चालक, चाय की थडिय़ां, ढाबे वाले, छोटे मरम्मत कर्ता और रेहड़ी-पटरी वाले इसी अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। तीसरी श्रेणी उन 7 लाख छोटे और मध्यम कारोबारियों की है, जो बाजार की असली धडक़न हैं। इनमें राजकोट के नमकीन निर्माता, भावनगर के लहसुन-प्याज व्यापारी, सूरत, भीलवाड़ा और वाराणसी के कपड़ा ट्रेडर व निर्माता, पुणे, गुरुग्राम और चेन्नई के ऑटो-पाट्र्स हब से लेकर ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स कंपनियां शामिल हैं। अंत में, पिरामिड के शीर्ष पर आती है चौथी श्रेणी- वे 7000 बड़े कॉर्पोरेट उद्योग और घराने, जो महानगरों से संचालित होकर देश के लिए बड़े पैमाने पर स्टील, गाडिय़ां, ब्रांडेड कपड़े, दवाइयां और एफएमसीजी उत्पाद बना रहे हैं ।
खपत और आय का चिंताजनक अंतर- चीन से हमारी दूरी
आज देश के सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न इस पिरामिड के आधार यानी ग्रामीण परिवारों की आय का है। आज भारत की इस सबसे निचली श्रेणी की औसत आय मात्र 60,000 से 70,000 रुपए सालाना है, यानी बमुश्किल 5,000 से 6,000 रुपए महीना। इसके विपरीत, हमारे पड़ोसी और आर्थिक प्रतिद्वंद्वी चीन में एक ग्रामीण परिवार की औसत आय 2 से 3 लाख रुपए सालाना है ।
आय की इस भारी खाई ने दोनों देशों के घरेलू बाजारों के परिदृश्य को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। इसे इन जमीनी आंकड़ों से समझिए-
भारत में एक ग्रामीण परिवार प्रतिमाह औसतन 4,000-5,000 रुपए खर्च कर पाता है, जबकि चीन में यह खपत 20,000 रुपए प्रतिमाह के करीब है ।
चीन के लगभग 40 फीसदी घरों में आज चौपहिया गाडिय़ां हैं, जबकि भारत में यह आंकड़ा बमुश्किल 5 फीसदी तक सिमटा हुआ है ।
चीन के 75 फीसदी घरों में दोपहिया वाहन हैं, वहीं भारत में आज भी केवल एक-तिहाई (33 फीसदी) घरों में ही टू-व्हीलर पहुंच पाए हैं ।
चीन का फर्नीचर (लकड़ी) बाजार भारत की तुलना में 3 गुना, कपड़ा बाजार 5 गुना और घरेलू बर्तनों व उपकरणों का बाजार 2 से 3 गुना बड़ा है ।
कड़वा सच यह है कि प्रति व्यक्ति आय और क्रय शक्ति के मामले में आज भारत का जो स्तर है, चीन उस मुकाम पर 2005 में ही पहुंच चुका था। यानी खपत और आमदनी के मामले में हमारे गांव चीन से 10-15 साल पीछे चल रहे हैं ।
मांग का अकाल और उद्योगों पर मंडराता संकट
जब 10 करोड़ ग्रामीण परिवारों की जेब में पैसा नहीं होगा, तो बाजार में मांग कहां से पैदा होगी? फलस्वरूप, आज देश के 7 लाख मध्यम वर्गीय कारोबारी और 7000 बड़े उद्योग एक सुर में कह रहे हैं कि देश में घरेलू मांग का भारी अभाव है। बड़े औद्योगिक घरानों की फैक्ट्रियां आज अपनी कुल क्षमता के मात्र 70 फीसदी स्तर पर ही काम कर रही हैं। मांग न होने के कारण ये घराने अपनी उपलब्ध पूंजी का इस्तेमाल नए निवेश या कारोबार के विस्तार में नहीं कर पा रहे हैं । इसका जीता-जागता और दुखद उदाहरण हाल ही में सूरत की कपड़ा इंडस्ट्री में देखने को मिला। बढ़ती उत्पादन लागत और गिरती बाजार मांग के बीच, तैयार माल के भाव को गिरने से रोकने के लिए सूरत की मिलों को सप्ताह में दो-दो दिन अपनी फैक्ट्रियां बंद रखने का फैसला लेना पड़ा। इस अघोषित मंदी ने न केवल अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया, बल्कि हजारों प्रवासी श्रमिकों को रातों-रात बेरोजगार कर दिया। कल्पना कीजिए, यदि भारत के गांवों में क्रय शक्ति होती, घरेलू मांग का पहिया घूम रहा होता, तो सूरत की फैक्ट्रियां दिन-रात चलतीं। न केवल माल बिकता, बल्कि जीडीपी में इजाफा होता और लाखों नए रोजगार पैदा होते ।
12 फीसदी की दहाई अंक वाली विकास दर से बढ़ें अर्थव्यवस्था
यह बात स्पष्ट है कि हमारी अर्थव्यवस्था के इस चार-चरणीय ढांचे में एक सीधा संबंध है। देश की 70-80 फीसदी आबादी वाले ग्रामीण परिवारों की आय जितनी बढ़ेगी, उसका सीधा फायदा दूसरी श्रेणी के 7 करोड़ सूक्ष्म उद्योगों, तीसरी श्रेणी के 7 लाख एमएसएमई और चौथी श्रेणी के 7000 बड़े उद्योगों को मिलेगा। पैसा नीचे से ऊपर की ओर जाएगा, तभी चक्र पूरा होगा। वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' का लक्ष्य हासिल करने और 160 करोड़ की आबादी को 14,000 डॉलर प्रति व्यक्ति आय के स्तर तक ले जाने के लिए, हमारी अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष कम से कम 12 फीसदी की दहाई अंक वाली विकास दर से बढऩा होगा। यह लक्ष्य केवल कागजी दावों या ऊपरी स्तर पर पूंजी निवेश से हासिल नहीं होगा। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र को सही मायनों में चरितार्थ करने के लिए भारत की रीढ़- यानी हमारे गांवों- को आर्थिक रूप से सशक्त करना ही एकमात्र विकल्प है। जब तक देश के किसान और मजदूर की जेब में बाजार में खर्च करने लायक पैसा नहीं होगा, तब तक न तो कारखानों के पहिए पूरी रफ्तार से घूमेंगे और न ही विकसित भारत का सपना यथार्थ के धरातल पर उतर पाएगा। विकास का सूरज जब तक गांवों के आंगन में नहीं चमकेगा, महानगरों की चमक भी फीकी ही रहेगी ।