ऑस्ट्रेलिया वर्ष 2035 तक सर्वाइकल कैंसर को लगभग समाप्त करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है व उसके परिणाम उत्साहजनक हैं। वहीं कई देशों ने व्यापक टीकाकरण अभियान चलाकर सर्वाइकल कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है।
महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों में गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिस पर टीकाकरण से काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। इसी दिशा में भारत सरकार की ओर से ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) टीकाकरण को राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में लागू करने की पहल महत्वपूर्ण व दूरदर्शी कदम है। यह पहल न केवल 'स्वस्थ नारी' के संकल्प को मजबूती देगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचाने की ठोस रणनीति भी साबित होगी।
एचपीवी टीकाकरण की शुरुआत विश्व स्तर पर वर्ष 2006 में हुई, जब सबसे पहले संयुक्त राज्य अमरीका और ऑस्ट्रेलिया ने इसे अपने राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल किया। इसके बाद ब्रिटेन, कनाडा, जापान सहित 160 से अधिक देशों ने इस वैक्सीन को अपनाया। ऑस्ट्रेलिया वर्ष 2035 तक सर्वाइकल कैंसर को लगभग समाप्त करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है व उसके परिणाम उत्साहजनक हैं। वहीं कई देशों ने व्यापक टीकाकरण अभियान चलाकर सर्वाइकल कैंसर के मामलों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की है।
भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं में होने वाला दूसरा सबसे आम कैंसर है। इससे हर साल करीब 75 हजार महिलाओं की मृत्यु होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार एचपीवी संक्रमण इस कैंसर का प्रमुख कारण है। यह संक्रमण लंबे समय तक शरीर में निष्क्रिय रह सकता है। इसलिए संक्रमण से पहले ही प्रतिरक्षा विकसित करना जरूरी है। यही कारण है कि राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत 14 वर्ष की आयु की बालिकाओं को यह टीका देने का निर्णय लिया गया है। वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि 9 से 14 वर्ष की आयु के बीच दी गई एचपीवी वैक्सीन शरीर में सबसे प्रभावी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है।
इसके साथ ही कम उम्र में दी गई वैक्सीन की दो खुराकें ही पर्याप्त होती हैं, जबकि अधिक आयु में तीन डोज की आवश्यकता पड़ सकती है। प्रत्येक वर्ष लगभग 1.15 करोड़ बालिकाओं को कवर करने का लक्ष्य इस कार्यक्रम की व्यापकता को दर्शाता है। यदि यह अभियान प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो आने वाले दशकों में भारत में सर्वाइकल कैंसर के मामलों में भारी गिरावट देखी जा सकती है। इससे न केवल हजारों जिंदगियां बचेंगी, बल्कि परिवारों और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ भी कम होगा।
इस पहल की सफलता जनजागरूकता पर निर्भर करेगी। टीकाकरण को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करना आवश्यक है। स्कूलों, आंगनवाडिय़ों और स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से जागरूकता अभियान चलाकर अभिभावकों को समझाना होगा कि यह टीका सुरक्षित एवं प्रभावी है। एचपीवी टीकाकरण कार्यक्रम सिर्फ एक स्वास्थ्य योजना नहीं, बल्कि महिला सशक्तीकरण की दिशा में बड़ा कदम है। भारत इस अवसर को प्रतिबद्धता के साथ अपनाता है, तो वह आने वाले वर्षों में सर्वाइकल कैंसर पर निर्णायक विजय प्राप्त कर सकता है।