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पर्यावरण संरक्षण का मार्ग जीवन संतुलन में निहित

हम सही-गलत का भेद छोड़कर किसी भी तरह अपनी भौतिक समृद्धि बढ़ाने में जुटे रहते हैं। पर यह व्यूह है, इसका अंदाजा भी नहीं लगता, क्योंकि यह हमारी पहचान बनने लगता है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jun 05, 2026

world enviroment day

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गिरीश्वर मिश्र, (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा)

इस पृथ्वी पर मनुष्य हर दिन सफलता के नए प्रतिमान स्थापित करता चल रहा है। संचार, आवागमन, मीडिया और स्वास्थ्य की दुनिया में हलचल मचा देने वाली तकनीकी कामयाबी अपने देश-काल पर मनुष्य की विजय पताका फहराती-सी लग रही है। मनुष्य इन उपलब्धियों को देखकर फूला नहीं समाता। बुद्धि तथा कौशल पर इतराता हुआ वह तेजी से अपने लिए और अधिक सुविधाएं जुटाने के उपाय खोजने में लग जाता है। आज की आम मन:स्थिति में जो उपलब्ध है, उससे संतुष्टि नहीं है और जो उपलब्ध नहीं है, उसे पाने की चाह अत्यंत तीव्र है। इस तरह अतृप्ति की भावना सतत रूप से एक तनाव बनती जा रही है, जो किसी भी तरह कम होने का नाम नहीं लेती।

भर्तृहरि ने इस स्थिति का वर्णन करते हुए बड़ी सटीक बात कही थी-'कालो न यातो वयमेव याता:, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीणा:' अर्थात काल नहीं बीतता, हम ही व्यतीत हो जाते हैं, तृष्णा नहीं घटती, हम ही वृद्ध हो जाते हैं। हमारे जीवन में तृष्णा अप्राप्त को पाने की कामना के साथ लालसा को और उद्दीप्त करती है। फलत: धीरे-धीरे अतृप्त बने रहना जीवन-शैली का अंग बनता जाता है। आज यही तृष्णा मनुष्य की नियति बनती जा रही है और हमारा पर्यावरण इस अदम्य लालसा की भेंट चढ़ता जा रहा है। तृष्णा की भावना जिस तरह विश्व में फैल रही है, वह हमारे वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए जोखिम का कारण बन रही है। सच्चाई यही है कि इच्छाओं की तृप्ति होने से तृप्ति की इच्छा कम नहीं होती। एक के बाद दूसरी नई इच्छा को जन्म देती रहती है। हम सही-गलत का भेद छोड़कर किसी भी तरह अपनी भौतिक समृद्धि बढ़ाने में जुटे रहते हैं। पर यह व्यूह है, इसका अंदाजा भी नहीं लगता, क्योंकि यह हमारी पहचान बनने लगता है। हम इसी व्यूह को अपने आत्मप्रकाशन का क्षेत्र बना लेते हैं। वस्तुत: इच्छा या चाह का कोई ओर-छोर नहीं होता।

इनके साथ और इनके बीच दौड़ते-उफनते हमें यदा-कदा प्रगति का अहसास तो होता है, पर वास्तव में वह मृगतृष्णा ही होती है। 'थोड़ा और थोड़ा और' कहते-सुनते हमारी दुनियावी यात्रा खोने-पाने के तनाव के बीच अनवरत चलती रहती है। हमारी इच्छाओं का संक्रमण अगली पीढ़ी तक पहुंचता है, जिसमें कुछ और इच्छाएं जुड़ती जाती हैं।यह सब विकास के एक सीधी रेखा में चलने वाले नजरिए का परिणाम है, जो इच्छाओं और कामनाओं को मनुष्य की कर्मठता का 'ड्राइवर' मानता है। मन की इच्छाओं का यह व्यापार इस मायने में अंधा होता है कि उससे उपजती आसक्ति बड़े वेग से सब कुछ की अनदेखी करती हुई बलवती होती जाती है।

उसका केंद्र आत्मसंवर्धन, या कहें 'अहं' की पुष्टि और विस्तार होता है। इसी के चलते आज हम सब उपभोग या खर्च को विकसित होने का पैमाना मानने लगे हैं। इसका स्वाभाविक परिणाम प्रतिद्वंद्विता, कलह, धोखाधड़ी और हिंसा जैसे असामाजिक आचरणों के रूप में दिखाई पड़ रहा है। धन-संपदा एकत्र कर सुख यानी भोग के साधन जुटाने के दबाव को सुलझाना आसान नहीं होता। ऊपर से मनुष्य की अनिश्चित काल तक जीवित रहने की चाह-योग की शब्दावली में कहें तो 'अभिनिवेश' इसे और भी कठिन बना देती है। अब प्रौद्योगिकी इस पूरे परिदृश्य को जटिल आयाम देने में जुट गई है। मनुष्य को प्रौद्योगिकी पर स्वयं से अधिक भरोसा होता जा रहा है। गौरतलब है कि हम सबका आश्रय-स्थल यह धरती बड़ी उदारमना है और अपने संसाधन सभी आश्रितों के भरण-पोषण के लिए उपलब्ध कराती रहती है। पर इसकी भी निश्चित सीमा है।

बढ़ती जनसंख्या और उनकी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अधिकाधिक संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है, जबकि सभी साधन सीमित हैं। ऐसे में साधनों पर कब्जे के लिए संघर्ष बढ़ता जाता है। लोग दूसरों के संसाधनों पर अधिकार जमाना चाहते हैं। विशेष रूप से विकास के नाम पर संसाधनों का निरंतर दोहन आज बड़े और विकसित देशों का केंद्रीय सरोकार बनता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन से जुड़ा संकट, जिससे पूरी दुनिया जूझ रही है और जिस प्रकार पृथ्वी संकटग्रस्त दिखाई दे रही है, वह गंभीर चिंता का विषय है। पृथ्वी और सृष्टि के प्रति हमारा यह दृष्टिकोण पश्चिम की औद्योगिक क्रांति की देन माना जा सकता है। मानवीय हस्तक्षेप और अटूट विकास के भ्रम ने उपभोक्तावादी जीवन-शैली को बढ़ावा दिया है। प्रकृति को भुलाकर उससे केवल लाभ लेने का नशा अंतत: मृग-मरीचिका ही सिद्ध हो रहा है।

अनंत विकास के रैखिक मॉडल के ध्वस्त होने के बाद अब सस्टेनेबल डवलपमेंट की बात की जाने लगी है। इस स्थिति से उबरने के लिए जब हम विचार करते हैं, तो हिंदू, जैन और बौद्ध सभी परंपराओं में उपलब्ध चिंतन हमें अपने भीतर झांकने की सलाह देता है। ये विचार मनुष्य और उसके परिवेश के बीच संबंधों की भी चर्चा करते हैं। संबंधों को महत्त्व देने वाला दृष्टिकोण हमें व्यक्तिकेंद्रितता से ऊपर उठाकर दूसरों के हित की चिंता की ओर अग्रसर करता है। इसके लिए संग्रह पर अंकुश लगाने की बात कही जाती है। अनासक्ति, दान और त्याग के आचरण पर बल दिया जाना भी हमें इसी दिशा में ले जाता है। जीवन की रक्षा के लिए सीमित संसाधनों को ध्यान में रखते हुए अपने उपभोग की आदतों में परिवर्तन लाना आवश्यक है। पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक मार्ग बाहरी संसाधनों के विस्तार में नहीं, बल्कि इच्छाओं के संयम और जीवन के संतुलन में निहित है।