एआइ इंपैक्ट समिट ने संदेश दिया है कि भारत इसमें तीसरे स्तंभ के रूप में उभर रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर 'मानव एआइ' की अवधारणा पेश की। यह सोच अमरीका- चीन के तकनीकी वर्चस्व के मुकाबले नैतिक और मानवीय विकल्प पेश करती है।
इंडिया एआइ इंपैक्ट समिट, जहां पांच लाख से अधिक लोगों की भागीदारी रही, इस आयोजन ने बहुत कुछ दिया है- भारत को भी और एआइ के वैश्विक इकोसिस्टम को भी। एआइ की होड़ में अमरीका और चीन सबसे आगे हैं, लेकिन इस समिट ने संदेश दिया है कि भारत इस दौड़ में तीसरे स्तंभ के रूप में उभर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर 'मानव एआइ' की अवधारणा पेश की- ऐसी तकनीक जो इंसानों की हो, इंसानों द्वारा बनाई गई हो और इंसानों के भले के लिए काम करे।
यह सोच अमरीका और चीन के तकनीकी वर्चस्व के मुकाबले एक नैतिक और मानवीय विकल्प पेश करती है। आपको याद होगा कि भारत लंबे अरसे से सामाजिक रूप से जिम्मेदार एआइ की बात करता रहा है और कुछ साल पहले इसी थीम पर हमारे यहां एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (रेज 2020) भी हो चुका है।
मौजूदा समिट अपनी श्रेणी के चुनिंदा, बड़े, वैश्विक शिखर सम्मेलनों में से एक है। इस तरह के सम्मेलन पिछले कुछ वर्षों में ब्लेचली पार्क (ब्रिटेन), फ्रांस, कोरिया आदि में भी हुए हैं और इसी तरह का अगला शिखर सम्मेलन 2027 में स्विट्जरलैंड में होगा। दिल्ली शिखर सम्मेलन में राजनीति, कारोबार और तकनीक की दुनिया के वैश्विक दिग्गजों की मौजूदगी महत्वपूर्ण थी। इसमें 20 से अधिक देशों के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए।
दिग्गज कंपनियों के सीईओ मसलन गूगल के सुंदर पिचाई, ओपनएआइ के सैम ऑल्टमैन और एंथ्रोपिक के डारियो अमोदेई भी पहुंचे। इतनी बड़ी शख्सियतों की मौजूदगी वैश्विक राजनीति, कारोबार और टेक्नॉलॉजी में भारत की बढ़ती अहमियत का सबूत है। दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियों के लिए भारत का मतलब है डेढ़ अरब लोगों का बाजार, करोड़ों युवा इंजीनियर और अथाह डेटा का खजाना। एआइ के लिहाज से ये सभी बहुत कीमती हैं और कोई भी आइटी दिग्गज इन्हें अनदेखा करना नहीं चाहेगा।
समिट में कई आर्थिक उपलब्धियां दर्ज हुईं। दुनियाभर के निवेशकों ने इंफ्रास्ट्रक्चर में 250 अरब डॉलर से अधिक के निवेश के वादे किए। डीप टेक यानी अत्याधुनिक तकनीक के लिए 20 अरब डॉलर की वेंचर कैपिटल का वादा भी किया गया। वैश्विक एआइ कंपनियों, जैसे ओपनएआइ, एंथ्रोपिक, एनवीडिया, एएमडी, आइबीएम, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि के इंफोसिस, टीसीएस, लार्सन एंड टूब्रो आदि प्रमुख भारतीय कंपनियों और राज्य सरकारों के साथ भागीदारी के समझौते भी हुए हैं। सबसे बड़ी रणनीतिक उपलब्धि रही भारत का पैक्स सिलिका गठबंधन में शामिल होना।
यह अमरीका की अगुवाई में बना एक महत्वपूर्ण मंच है, जो एआइ चिप्स और तकनीकी आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और ताइवान जैसे देश पहले से ही इसमें शामिल हैं। भारत को इसमें शामिल किए जाने का अर्थ है कि अमरीका प्रौद्योगिकी और एआइ में भारत को एक भरोसेमंद साझेदार मानता है। किसी विकासशील देश में एआइ को केंद्र में रखते हुए पहली बार इतना बड़ा आयोजन हुआ है। भारत ने इस मंच का उपयोग 'ग्लोबल साउथ,' यानी एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमरीका के विकासशील देशों की प्रतिनिधि शक्ति के रूप में किया।
सत्तर से ज्यादा देशों ने 'नई दिल्ली एआइ घोषणापत्र' पर हस्ताक्षर किए जिसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि एआइ के नियम-कायदे केवल अमरीका और यूरोप न तय करें बल्कि उसे सही अर्थों में समावेशी और लोकतांत्रिक बनाया जाए। भारत ने इतने देशों को सामने ला खड़ा किया जो उसकी अपनी राजनैतिक महत्ता के साथ-साथ एआइ जैसी रूपांतरकारी तकनीक पर उसके नजरिए की स्वीकार्यता का प्रतीक भी है। समिट ने भारतीय प्रतिभा को दुनिया के सामने रखने का मौका दिया। भारतीय स्टार्टअप कंपनी सर्वम एआइ ने 105 अरब पैरामीटर वाला एक ऐसा भाषाई मॉडल पेश किया जो लोकप्रिय वैश्विक मॉडलों को टक्कर दे सकता है।
खास बात यह है कि इसे उनकी तुलना में बहुत ही कम संसाधनों के साथ बनाया गया है और यह भारतीय भाषाओं का बेहतरीन समर्थन करता है। 'भारत जेन' जैसे अन्य स्वदेशी मॉडलों ने भी ध्यान खींचा। आइआइटी गुवाहाटी के एक छात्र शालिग्राम देवांगन ने मात्र 1.1 लाख रुपए की लागत में बने दस भारतीय भाषाओं में काम करने वाले एआइ मॉडल को दिखाया। यह कम खर्च में बड़ा काम करने की भारतीय क्षमता का जीता-जागता उदाहरण है। भारत ने टीबी की जांच के लिए एआइ आधारित एक्स-रे स्कैनिंग, सरकारी सेवाओं के लिए बहुभाषी वॉयस बॉट्स और किसानों के लिए मौसम पूर्वानुमान जैसे उपयोगी प्रयोगों को दुनिया के सामने रखा।
समिट के बाद अब नजरें 'इंडिया एआइ मिशन 2.0' पर हैं। इसके तहत 20 लाख नागरिकों को एआइ का प्रशिक्षण देने, एआइ विकास और शोध के लिए 20,000 अतिरिक्त जीपीयू उपलब्ध कराने और स्वदेशी फाउंडेशनल मॉडल लॉन्च करने की योजना है। हालांकि आज की हकीकत यह है कि भारत अब भी 90% जीपीयू बाहर से आयात करता है। जीडीपी का सिर्फ 7% ही अनुसंधान एवं विकास पर खर्च होता है, डेटा सुरक्षा के कड़े कानूनों का अभाव है और एआइ के कारण 2030 तक 30 करोड़ नौकरियों के प्रभावित होने का अनुमान है।
इन सब पर कोई ठोस बात फिलहाल सामने नहीं आई है। यह समिट एक ऐसा आईना है जिसमें हमारी क्षमताएं, कामयाबियां और महत्वाकांक्षाओं की तस्वीर दिखाई देती है। इंडिया एआइ समिट से यकीनन भारत में एआइ का फलक विस्तार लेगा- शोध, इंफ्रास्ट्रक्चर, नवाचार, अर्थव्यवस्था, रोजगार, कौशल आदि पर ठोस प्रभाव पड़ेगा। एआइ विश्व में हमारी मजबूत उपस्थिति भी रेखांकित होगी, किंतु हमें अब भी कई बड़ी बाधाएं पार करनी हैं।