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भारत की बदलती अफगान नीति

ताजिकिस्तान में 9वें एशिया सम्मेलन के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच शांतिवार्ता का भारत समर्थन करता है।
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Apr 02, 2021
भारत की बदलती अफगान नीति
भारत की बदलती अफगान नीति

भारत की अफगान नीति में पिछले कुछ समय में काफी बदलाव आए हैं। खासकर तालिबान के बारे में हमारा रवैया अब कुछ लचीला प्रतीत हो रहा है। ताजिकिस्तान में 9वें एशिया सम्मेलन के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच शांतिवार्ता का भारत समर्थन करता है। इस बयान का खास महत्त्व इसलिए है कि 1990 से ही भारत, तालिबान के साथ किसी तरह की डील के खिलाफ रहा है। धीरे-धीरे सख्ती में कमी तब महसूस की गई जब अमरीका और रूस की पहल पर होने वाली वार्ताओं के संदर्भ में भारत ने लचीला रुख दिखाया। विदेश मंत्री का ताजा बयान ऐसे समय आया है जबकि अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने नया प्रस्ताव पेश किया है। यह प्रस्ताव दो हिस्सों में है। पहला-परस्पर विरोधी पार्टियों को शामिल करते हुए 'यूनिटी ट्रांजिशन गवर्नमेंटÓ बनाना और दूसरा-भारत, पाकिस्तान, चीन, ईरान, रूस और अमरीका के राजदूतों की बहुपक्षीय कांफ्रेंस आयोजित करना। भारत ने अमरीका के प्रस्ताव का समर्थन करके अपने पुराने रुख में बदलाव का संकेत दिया था। अब तालिबान से बातचीत का समर्थन करने से साफ है कि हमारी अफगान नीति लचीली हुई है।

तालिबान के संदर्भ में भारत का लचीला होना दरअसल समय की नजाकत है। एक तरह से यह ठीक भी है। दुनिया की ताकतों के लगातार प्रयास के बावजूद अफगानिस्तान के एक बड़े हिस्से में इसका वजूद अब भी मजबूती से कायम है। अफगानिस्तान और अन्य देशों के लिए भी यह अब पहले जैसा 'अवांछित' नहीं रह गया है। अमरीका ने तो उसके साथ संधि भी की है। रूस शांति वार्ताओं का आयोजन करता रहा है। चीन ने भी तालिबान से संपर्क बनाया है। यूरोपीय देश बातचीत में रुचि लेते रहे हैं। इस जमीनी हकीकत को समझते हुए यदि भारत सरकार का रुख भी लचीला हुआ है, तो इसमें दोनों देशों का फायदा नजर आता है। अफगान सरकार के साथ हमारे रिश्ते हमेशा से अच्छे रहे हैं। भारत ने वहां काफी निवेश भी किया है। ऐसे में यदि सरकार पर पूरी तरह तालिबान का नियंत्रण हो जाता है, तो इससे हमें नुकसान ही होगा। इसलिए हमें शांति वार्ताओं में शामिल होकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि किसी समझौते से वहां तालिबान का वर्चस्व स्थापित न होने पाए। शांति वार्ताओं से एकदम अलग-थलग होकर ऐसा संभव नहीं है। हालांकि तालिबान को सत्ता में भागीदारी मिलने के बाद वहां क्या हालात बनेंगे, यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है। फिर भी आगे बढ़ती गतिविधियों पर नजदीक से नजर रखना ही समझदारी कही जाएगी।

Published on:
02 Apr 2021 07:06 am