कर के रूप में जब इतनी बड़ी राशि जमा हुई है तो सेवा शुल्क के रूप में बैंकों ने इससे कई गुना राशि वसूली होगी।
भारतीय जनता पार्टी हो या कांग्रेस-भारत में शासन करने वाली केन्द्रीय सरकारों की एक बड़ी बीमारी रही है- नकल करने की। खासतौर से पश्चिमी देशों की नकल। ‘लिव इन रिलेशन’ से लेकर ‘डिजिटलीकरण’ तक की अवधारणाएं एक-एक करके देश में आयात की जाती हैं। और फिर सरकारें उन्हें ज्यों-की-त्यों भारत में लागू करने पर पिल जाती हैं। भले ही फिर देश का सामाजिक और आर्थिक ढांचा छिन्न-भिन्न क्यों न हो जाए।
पिछले दो वर्षों से केन्द्र सरकार भारत में चाबुक के जोर पर कथित बैंकिंग सुधार और मुद्रा के डिजिटलीकरण को लागू करने में जुटी हुई है। इन सुधारों की आड़ में भारतीय नागरिकों को जबरन बैंकिंग सेवा के दायरे में लाया जा रहा है। छोटे से छोटे किसान और मजदूर तक को मजबूर किया जा रहा है कि पहले वे बैंक खाता खुलवाएं और फिर सर्विस चार्ज, ब्याज और जुर्माने के चक्रव्यूह में फंस जाएं। बैंक खाता नहीं तो सरकार की उनके प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं।
भारतीय अर्थव्यवस्था में आम नागरिक हमेशा नकदी आधारित लेन-देन करते रहे हैं। अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान गृहिणियों की नकदी की घरेलू बचत का रहा है। इसी के बूते पर भारत वैश्विक मंदी की मार भी झेल गया। शायद भारत की यही ताकत विकसित देशों को नहीं सुहाई। विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़े अर्थशास्त्रियों के सुझाव पर भारत की इस ताकत को कमजोर करने के प्रयास शुरू हो गए। आज स्थिति यह है कि भारत का हर नागरिक बैंकिंग व्यवस्था के शिकंजे में फंस चुका है। नकद लेन-देन की स्वतंत्रता बीते समय की बात होती जा रही है।
हाल ही में सूचना के अधिकार से एक नागरिक ने यह जानकारी जुटाई कि पिछले पांच वर्षों में बैंकों की ग्राहक ‘सेवा’ के कर से सरकारी खजाने में ४२ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा पहुंचे। कर के रूप में जब इतनी बड़ी राशि जमा हुई है तो सेवा शुल्क के रूप में बैंकों ने इससे कई गुना राशि वसूली होगी। यही कारण है कि आज देश के ९० प्रतिशत से ज्यादा बैंक भारी मुनाफा कमा रहे हैं। उन्होंने ग्राहक सेवा के कार्य एटीएम तथा दूसरी मशीनों को सौंप दिए हैं। यहां तक कि चेक लगाने पर भी कोई रसीद नहीं दी जाती। डिब्बे में डालो और रवाना हो जाओ। चेक गुम हो जाए तो बैंक की कोई गारंटी नहीं है। कर्मचारियों की संख्या घटा दी गई है। हर बात का शुल्क शुरू हो गया। पैसे जमा कराओ तो शुल्क, निकालो तो शुल्क, एटीएम काम में लो तो शुल्क, क्रेडिट और डेबिट कार्ड काम में लो तो भी शुल्क। ऊपर से सरकार को सेवा कर।
बैंकों में जमाओं पर देय ब्याज और ऋण पर वसूले जाने वाले ब्याज में इतना बड़ा अंतर (३ से ६ प्रतिशत) होता है कि सारे खर्च निकालने के बाद भी बैंक मोटे मुनाफे कमा रहे हैं। फिर भी उपभोक्ताओं के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। कोई डिजिटल ठगी का शिकार हो जाए तो बैंक हाथ झटक लेते हैं। हमारे साइबर कानून भी इतने कमजोर हैं कि उपभोक्ताओं को ठगी हुई राशि मिलना लगभग असंभव होता है। आए दिन एटीएम लूट लिए जाते हैं। बैंकों को इसकी रत्ती भर भी चिंता नहीं, आखिर में जेब तो नागरिकों की ही कटेगी।
डिजिटलीकरण के पीछे तर्क दिए जाते हैं कि इससे काला धन खत्म होगा। पिछले दो साल में कितना कम हो गया? दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि छोटी-छोटी आय की गणना देश की विकास दर में नहीं हो पाती। तो क्या गणित साधन के लिए जेब काटने की छूट दी जाती रहेगी?
हो सकता है कि मुद्रा का डिजिटलीकरण दीर्घावधि में लाभदायक हो, पर ऐसी जल्दीबाजी क्यों? क्या भारत की भौगोलिक स्थितियां, जनसंख्या, मौसम, शिक्षा का स्तर विकसित देशों जैसा है? जहां आबादी का बड़ा हिस्सा अब भी निरक्षर है, वहां जनता को जबरन बैंकिंग के शिकंजे में धकेलना न्यायसंगत है? पांच साल में बैंकिं ग सुविधा से मिलने वाले करों से ज्यादा राशि तो यहां एक-दो धनपति लूटकर देश से बाहर फरार हो जाते हैं। तो क्या इन लुटेरों के घर भरने के लिए निरीह नागरिकों की जेबें सरकारी कानूनों के डंडे से धमका कर काटने को ही हम प्रगति का ***** मानते हैं!