भारत की 90 प्रतिशत श्रम शक्ति अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, लेकिन वहां मजूदरों की सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं है। यहां मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के काम करते हैं। औपचारिक क्षेत्र में भी ज्यादातर हादसे रिपोर्ट ही नहीं होते। नियोक्ता, पुलिस और अस्पताल मिलकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। यह स्थिति सिस्टम की गहरी खामी को दर्शाती है।

ज्ञान चंद पाटनी
(वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार )
एक तरफ देश को विकसित देश बनाने का सपना देखा जा रहा है, दूसरी तरफ भारत के कारखानों के हालात श्रमिकों के लिए युद्धक्षेत्र जैसे नजर आते हैं। औद्योगिक दुर्घटनाओं में कामगार अपनी जान गंवा रहे हैं। तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में एक फैक्ट्री में अमोनिया गैस के रिसाव के कारण श्रमिकों की मौत का ताजा मामला भी इसी बात की पुष्टि कर रहा है। पिछले दिनों विशाखापत्तनम में एक इस्पात संयंत्र में हुए धमाके में भी नौ श्रमिक मारे गए थे। छत्तीसगढ़ में वेदांता पावर प्लांट के बॉयलर विस्फोट में करीब दो दर्जन कामगारों की मौत का मामला भी पुराना नहीं है। देश के विभिन्न भागों में पटाखों की वैध और अवैध फैक्ट्रियों में विस्फोट का सिलसिला भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। इन हादसों की कड़ी में याद कीजिए 2019 में दिल्ली की एक फैक्ट्री में हुआ वह भयावह अग्निकांड, जिसमें 43 श्रमिक सोते हुए आग की भेंट चढ़ गए थे।
सुरक्षा के मामले में बरती जा रही लापरवाही
इन हादसों की पृष्ठभूमि देखें तो एक पैटर्न साफ नजर आता है। कारखानों में बुनियादी सुरक्षा उपायों की अनदेखी हो रही है। भोपाल गैस त्रासदी की यादें अब भी ताजा हैं। 1984 में हुए इस भीषण हादसे ने हजारों परिवारों को तबाह कर दिया था, लेकिन कारखानों में आज भी उसी तरह की लापरवाही बरकरार है। खतरनाक रसायनों का असुरक्षित भंडारण, अपर्याप्त वेंटिलेशन और रखरखाव में लापरवाही जैसी समस्याएं नई नहीं हैं, लेकिन इनकी अब भी अनदेखी की जा रही है। विशाखापत्तनम में हुए हादसे के बाद ट्रेड यूनियनों और पूर्व कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि संयंत्र में उपकरण पुराने हो गए थे। रखरखाव में लापरवाही के साथ ठेके पर रखे गए कर्मचारियों पर निर्भरता बढ़ गई थी। यह वाकई चिंता की बात है कि आजकल खर्च बचाने के लिए ठेके पर कर्मचारी रखने को प्राथमिकता दी जाती है। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। इन कर्मचारियों को पैसा तो कम दिया ही जाता है, उनकी सुरक्षा के मामले में भी हद दर्जे की लापरवाही बरती जाती है। दुनिया के विकसित देशों से तुलना करें तो हमारी स्थिति बहुत ही शर्मनाक है। विकसित देश हादसों से सबक लेते हैं। जैसे 1976 में इटली के सेवेसो में हुए रासायनिक रिसाव के बाद पूरे यूरोपीय संघ के औद्योगिक सुरक्षा ढांचे को नया रूप दिया गया। उसके बाद 2019 से 2022 तक ईयू में औद्योगिक दुर्घटनाओं का वार्षिक औसत महज 22 रहा। वहां हादसे के बाद जांच समितियां केवल खानापूर्ति के लिए गठित नहीं होती हैं, सख्त कार्रवाई होती है और जिम्मेदारों को सजा मिलती है।
भारत में हादसों से सबक लेने की परंपरा नहीं
दूसरी तरफ भारत में हादसों से सबक लेने की जैसे परंपरा ही नहीं है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन भारत को श्रमिकों के लिए सबसे ज्यादा जोखिम वाले देशों में शुमार करता है। नवंबर 2017 में ब्रिटिश सेफ्टी काउंसिल द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि भारत में हर साल काम के दौरान होने वाले हादसों में करीब 48,000 लोग अपनी जान गंवाते हैं। यह अलग बात है कि भारत सरकार के महानिदेशक कारखाना सलाह सेवा और श्रम संस्थान के आंकड़े बताते हैं कि 2017 से 2020 के बीच पंजीकृत कारखानों में हर साल औसतन 1,109 मौतें हुईं। इन दोनों आंकड़ों में इतना बड़ा अंतर होने का मुख्य कारण यह है कि सरकारी आंकड़े केवल पंजीकृत कारखानों के हैं। भारत के अधिकांश मजदूर असंगठित या अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, जहां सुरक्षा की व्यवस्था बहुत खराब है और दुर्घटनाओं की सूचना ही नहीं मिलती। ब्रिटिश सेफ्टी काउंसिल के अनुसार, कुल मौतों में से सबसे ज्यादा, यानी करीब 24 प्रतिशत मौतें अकेले निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों की होती हैं। यह रिपोर्ट करीब आठ वर्ष पुरानी है, लेकिन अब भी हालात में खास परिवर्तन नहीं हुआ है। ऑटोमोबाइल (कारों, ट्रकों, मोटरसाइकिलों) के लिए आवश्यक कलपुर्जे बनाने वाले ऑटो एंसिलरी उद्योग को तो दुर्घटनाओं का हॉटस्पॉट माना जाता है, वहां हाथ-पैर गंवाने वाले मजदूरों की तादाद बहुत ज्यादा है।
मजदूरों की सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं
भारत की 90 प्रतिशत श्रम शक्ति अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत है, लेकिन वहां मजूदरों की सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं है। यहां मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के काम करते हैं। औपचारिक क्षेत्र में भी ज्यादातर हादसे रिपोर्ट ही नहीं होते। नियोक्ता, पुलिस और अस्पताल मिलकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। यह स्थिति सिस्टम की गहरी खामी को दर्शाती है। ये हादसे परिवारों को तबाह करते हैं। मजदूरों की मौत से बच्चे अनाथ और महिलाएं विधवा हो जाती हैं। अनौपचारिक श्रमिकों के पास बीमा भी नहीं होता। ऐसी हालत में इनके परिवार भुखमरी का शिकार होते हैं। हादसे के बाद कारखाने पर भी असर पड़ता है। अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है, इसलिए कारखानों में सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान देना मजदूरों ही नहीं उद्योगपतियों और पूरे देश के हित में है। असल में हमारी सामूहिक चेतना में आम लोगों के जीवन की कीमत ही नहीं है। फैक्ट्रियों में बुनियादी सुविधाएं जैसे फायर अलार्म और प्रॉपर वायरिंग पर भी खास ध्यान नहीं दिया जाता। निगरानी तंत्र पूरी तरह से चरमरा गया है। कारखानों के निरीक्षण के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। जब समस्या को ही नहीं समझा जाएगा, तो समाधान कैसे होगा? तमाम समस्याओं के बावजदू इन हादसों को रोकना कोई असंभव कार्य नहीं है, चाहिए बस सच्ची प्रतिबद्धता। सबसे पहले निगरानी प्रणाली को मजबूत बनाएं। सीसीटीवी, सेंसर और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) से रीयल-टाइम मॉनिटरिंग सुनिश्चित की जाए। स्पार्क-प्रूफ उपकरण, विस्फोट-रोधी वेंटिलेशन सिस्टम और ऑटोमेटिक फायर फाइटिंग यंत्र हर फैक्ट्री में सुनिश्चित किया जाए।
हादसे रोकने में सरकार की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण
साथ ही श्रमिकों के प्रशिक्षण पर विशेष जोर दें। हर नए मजदूर को जोखिमों की पूरी जानकारी दी जाए, आपातकालीन मॉक ड्रिल कराएं। जरूरत हो तो हेलमेट, दस्ताने, चश्मे, स्पेशल ड्रेस और फस्र्ट एड किट जैसी सुविधाएं उपलब्ध करवाएं। कानूनी सख्ती बढ़ाएं, उल्लंघन पर मालिक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशा (ओएसएच) संहिता, 2020 को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और अनौपचारिक क्षेत्र को भी इसके दायरे में लाएं। जागरूकता अभियान चलाएं, स्कूलों से लेकर गांवों तक सुरक्षा के महत्त्व को पहुंचाएं। हादसे रोकने में सरकार की भूमिका बेहद महत्त्वपूर्ण है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मानकों को अपनाएं। उद्योगपतियों को जिम्मेदार बनाएं। ये कदम न केवल मजदूरों की मौतें रोकेंगे, बल्कि उत्पादकता बढ़ाएंगे, जिससे अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और विकसित भारत का सपना साकार होगा। भारत के कारखाने इसलिए खतरनाक हैं क्योंकि जिम्मेदार अधिकारी लापरवाह हैं। उद्योगपति मुनाफे के चक्कर में सुरक्षा पर ज्यादा खर्च करने से बचते हैं। मुआवजा बांटना या शोक सभा करना काफी नहीं है। मजदूरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। मुनाफा कमाने के लिए मजदूरों की जान को दांव पर लगाना अमानवीय और अपराध है। इस प्रवृत्ति को सख्ती से खत्म किया जाना चाहिए।