
गजेंद्र सिंह,(लोक नीतिविश्लेषक)
भारत में शिक्षा व्यक्ति को ज्ञान, कौशल और अवसर प्रदान कर उसकी सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति में सुधार करने का माध्यम बनती है। शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति अपनी पारिवारिक, जातीय या आर्थिक सीमाओं से ऊपर उठकर सम्मानजनक रोजगार, बेहतर आय और समाज में उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है। इसलिए भारतीय समाज में शिक्षा को केवल ज्ञान अर्जन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, समान अवसर और समावेशी विकास की आधारशिला माना जाता है।
भारत विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देशों में है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश तभी वास्तविक आर्थिक शक्ति में परिवर्तित होगा, जब यह युवा आबादी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आवश्यक कौशल से लैस होगी। वर्तमान में भारत की विद्यालयी शिक्षा प्रणाली में लगभग 24.8 करोड़ विद्यार्थी, 14.75 लाख विद्यालय और 98 लाख से अधिक शिक्षक हैं। लेकिन इतनी विशाल व्यवस्था के सामने आज एक नई चुनौती भी उभर रही है। नीति आयोग के अनुसार पिछले एक दशक में लगभग 94,000 सरकारी विद्यालय बंद हुए हैं और सरकारी विद्यालयों में दो करोड़ से अधिक विद्यार्थियों का नामांकन घटा है। यह संकेत देता है कि सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को गुणवत्तापूर्ण और सशक्त बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विश्व बैंक के अनुसार स्कूली शिक्षा का प्रत्येक अतिरिक्त वर्ष व्यक्ति की आय में औसतन लगभग 10 प्रतिशत की वृद्धि कर सकता है। शिक्षा असमानता घटाती है और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति देती है। किंतु सरकारें अकेले इतने बड़े तंत्र की सभी आवश्यकताओं की पूर्णत: पूर्ति नहीं कर सकतीं। इसलिए परोपकारी निवेश, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, सामुदायिक सहभागिता और समाज की सक्रिय भागीदारी शिक्षा सुधार की अनिवार्य शर्त बन जाती है।
सीएसआर बॉक्स की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय कंपनियों ने 72,000 से अधिक परियोजनाओं के माध्यम से कुल 40,794 करोड़ का सीएसआर व्यय किया, जिसमें से 13,877 करोड़ लगभग 34 प्रतिशत केवल शिक्षा क्षेत्र पर खर्च किए गए। हालांकि भारत की चुनौती अब बच्चों को सीखने में सक्षम बनाने की है। वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट 2024 दर्शाती है कि ग्रामीण भारत में कक्षा पांच के केवल 48.8 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा दो स्तर का पाठ सहजता से पढ़ सकते हैं। यदि प्राथमिक स्तर पर यह नींव कमजोर रह जाती है, तो आगे की शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार की संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं। इसलिए शिक्षा में सबसे महत्वपूर्ण निवेश वह है जो सीखने के परिणामों को सुधारता है। यहीं से प्रारंभिक बाल्यावस्था और प्राथमिक शिक्षा का महत्व सामने आता है। जीवन के पहले आठ वर्षों में मस्तिष्क का सर्वाधिक तीव्र विकास होता है। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जेम्स हेकमैन के शोध बताते हैं कि प्रारंभिक बाल्यावस्था में किया गया निवेश सबसे अधिक सामाजिक और आर्थिक प्रतिफल देता है।
यूनेस्को के अनुसार शिक्षित समाज बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर पोषण, लैंगिक समानता, महिलाओं की अधिक श्रम भागीदारी, कम बाल विवाह, मजबूत लोकतांत्रिक भागीदारी और अधिक सामाजिक विश्वास का निर्माण करता है। यही कारण है कि शिक्षा में किया गया निवेश अनेक क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन का आधार बनता है। फिर भी भारत में अधिकांश सीएसआर निवेश आज भी भवन निर्माण, स्मार्ट कक्षाओं और सामग्री वितरण जैसी दृश्य परियोजनाओं तक सीमित है। साथ ही, अनेक विद्यालयों में आयु-अनुकूलता और स्थानीय आवश्यकता-आकलन के बिना यौन शिक्षा, सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा और वैश्विक नागरिक शिक्षा जैसे वैचारिक कार्यक्रमों तथा एआइ, कोडिंग और कम्प्यूटेशनल थिंकिंग जैसे विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है। यद्यपि इन पहलों का अपना महत्व हो सकता है, किंतु अक्सर ये मूलभूत साक्षरता और गणितीय दक्षता जैसे आधारभूत अधिगम से ध्यान हटाकर शिक्षकों और विद्यालयों पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं। प्राथमिक शिक्षा सुधार की वास्तविक कुंजी शिक्षक क्षमता निर्माण, प्रारंभिक भाषा एवं गणितीय दक्षता, विद्यालय नेतृत्व, सामुदायिक सहभागिता और सीखने के परिणामों में निहित है। यदि सीएसआर निवेश प्रारंभिक बाल्यावस्था, विद्यालयी शिक्षा और कौशल विकास को एकीकृत दृष्टि से देखें, तो उसका सामाजिक और आर्थिक प्रतिफल कई गुना बढ़ सकता है।
दक्षिण कोरिया और फिनलैंड का अनुभव दर्शाता है कि शिक्षा सुधार की शुरुआत बच्चों, शिक्षकों और सीखने की गुणवत्ता से होती है। विश्व बैंक और यूनेस्को की एजुकेशन फाइनेंस वॉच 2024 भी रेखांकित करती है कि शिक्षा में केवल निवेश नहीं, बल्कि संसाधनों का न्यायसंगत, परिणामोन्मुख और प्रभावी उपयोग ही स्थायी परिवर्तन का आधार बनता है। भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन विकसित राष्ट्र केवल राजमार्गों, औद्योगिक गलियारों और डिजिटल अवसंरचना से नहीं बनते। वे उन बच्चों से बनते हैं जिन्हें सीखने, सोचने, नवाचार करने और नेतृत्व करने का अवसर मिलता है। एक सड़क बाजारों को जोड़ती है, एक पुल शहरों को जोड़ता है, लेकिन एक शिक्षित बच्चा पीढिय़ों का भविष्य बदल देता है। और शायद यही भारत के लिए सबसे अधिक प्रतिफल देने वाला निवेश है।