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दोहरी त्रासदी के बीच गंभीर संकट में फंसा ईरान

क्या तेहरान ने अपनी वैचारिक नीतियों और रणनीतिक भूलों के कारण खुद को इस मोड़ तक पहुंचा दिया है? 1956, 1967 और 1973 के अरब-इजरायल युद्धों के समय ईरान अरब देशों के साथ नहीं था।

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Mar 09, 2026

डॉ. खींवराज जांगिड़ - प्रोफेसर, सेंटर फॉर इजरायल स्टडीज, ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी, सोनीपत,

मध्य-पूर्व लंबे समय से इजरायल और ईरान के बीच सीधे सैन्य टकराव की आशंका से घिरा रहा है। पहले से ही अस्थिर हालात के बीच 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले ने पूरे क्षेत्र की भू-राजनीति को झकझोर कर रख दिया था। इस पूरे घटनाक्रम में ईरान ने लेबनान में हिज्बुल्लाह और यमन में हूती जैसे अपने सहयोगी संगठनों के जरिये महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अलावा, 2024 में और फिर जून 2025 में ईरान और इजरायल के बीच सीधे टकराव भी हुए, जिससे क्षेत्र में तनाव और गहरा गया। इसी क्रम में 28 फरवरी को इजरायल और अमरीका ने ईरान पर हमला किया। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनके साथ ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के चालीस से अधिक वरिष्ठ कमांडर और शीर्ष अधिकारी मारे गए। हैरानीजनक यह रहा कि पिछले एक महीने से अमरीकी युद्धपोतों की भारी तैनाती के बावजूद ईरान इस हमले के लिए पूरी तरह तैयार नहीं था।

खामेनेई की हत्या ईरानी शासन के केंद्र पर सबसे गंभीर हमलों में से एक मानी जा रही है। हालांकि ईरान के भीतर खामेनेई के विरोधी भी मौजूद रहे हैं, लेकिन उनकी इस तरह की मौत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। ईरानियों को अभी तक इस आघात से उबरने और ठीक से शोक मनाने का भी अवसर नहीं मिला है। यह केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक और रणनीतिक जोखिम है, जिसके दूरगामी परिणाम पूरे क्षेत्र में दिखाई दे सकते हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसे नियंत्रित करने की कोशिशों को लेकर दशकों से विवाद चलता रहा है। लेकिन मौजूदा स्थिति आर-पार की लड़ाई जैसा निर्णायक टकराव लग रही है। यह भी बड़ा सवाल है कि अरब देश और क्षेत्र के तुर्की जैसे बड़े देश ईरान की मौजूदा स्थिति के प्रति लगभग उदासीन क्यों हैं? क्या तेहरान ने अपनी वैचारिक नीतियों और रणनीतिक भूलों के कारण खुद को इस मोड़ तक पहुंचा दिया है? 1956, 1967 और 1973 के अरब-इजरायल युद्धों के समय ईरान अरब देशों के साथ नहीं था। 1950 में, तुर्की के बाद उसने इजरायल को मान्यता दे दी थी। उसी वर्ष भारत ने भी ऐसा किया था। उस समय शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासन में ईरान और इजरायल के बीच कई साझा हित थे। दोनों मिस्र के नेता नासिर के पैन-अरबवाद और सोवियत साम्यवाद से आशंकित थे। औपचारिक राजनयिक संबंध न होने पर भी तेहरान में इजरायल का व्यापार मिशन था और दोनों के बीच मजबूत खुफिया सहयोग था। 1960-70 के दशक में ईरान इजरायल को तेल बेचता था और सैन्य-तकनीकी सहयोग के साथ दोनों देशों के संबंध काफी घनिष्ठ थे। लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति ने पूरा परिदृश्य बदल दिया। खामेनेई के नेतृत्व में शिया धर्मगुरुओं ने शाह के खिलाफ चल रहा जन आंदोलन अपने नियंत्रण में ले लिया और उसे कट्टर इस्लामी जामा पहना दिया। खामेनेई ने अमरीका-इजरायल को पश्चिमी भ्रष्टाचार के प्रतीक तथा इस्लाम के दुश्मन के रूप में पेश किया।

2017 में इस वैचारिक शत्रुता के प्रतीक रूप में तेहरान में एक 'डूम्सडे क्लॉक' लगाई गई, जो 2040 तक इजरायल के कथित विनाश की उलटी गिनती दिखाती है। यह घड़ी 2015 में अयातुल्लाह खामेनेई द्वारा दिए गए उस बयान से प्रेरित थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि 2040 तक इजरायल का वजूद मिट जाएगा। इस बीच, ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और परमाणु कार्यक्रम से अपनी सैन्य शक्ति को तो काफी मजबूत किया, लेकिन वह अपने लिए मजबूत अंतरराष्ट्रीय मित्र नहीं बना पाया। मध्य-पूर्व में अमरीका विरोधी माहौल बनाने के लिए चीन और रूस ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ईरान का समर्थन जरूर किया, लेकिन यह समर्थन अधिकतर औपचारिक या कूटनीतिक ही रहा। यहां तक कि निकटवर्ती पड़ोसी खाड़ी देशों, मिस्र, जॉर्डन, लेबनान और सीरिया के साथ भी ईरान स्थायी और भरोसेमंद गठबंधन बनाने में सफल नहीं हो पाया। इसके पीछे दो प्रमुख कारण रहे। पहला, 1979 की शिया क्रांति के बाद ईरान ने शिया इस्लाम के प्रसार को अपना मिशन बना लिया, जिससे सुन्नी बहुल अरब देश असहज हुए। दूसरा, ईरान ने क्षेत्र में अपनी राजनीतिक और सैन्य पकड़ बढ़ाने के लिए लेबनान में हिज्बुल्लाह, यमन में हूती और इराक में हश्द अल-शाबी जैसे 'प्रॉक्सीÓ संगठन खड़े किए। गाजा में हमास को दिया गया समर्थन भी इसी रणनीति का हिस्सा था।

पिछले दो वर्षों में ईरान के कई क्षेत्रीय सहयोगी कमजोर हुए हैं और हिज्बुल्लाह के हाथ भी बंध गए हैं। आज ईरानी शासन बाहरी सैन्य दबाव और अंदरूनी असंतोष से जूझ रहा है। वर्षों से लगे आर्थिक प्रतिबंध, युवाओं का असंतोष, महिलाओं के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शन और नई पीढ़ी का मोहभंग, इन सबने क्रांति की मूल विचारधारा को कमजोर कर दिया है। फिलहाल जल्द सत्ता परिवर्तन की संभावना भी नहीं दिखती। लेकिन सर्वोच्च नेता की हत्या ने ईरानी शासन को कमजोर जरूर किया है। यह टकराव केवल अमरीका-इजराइल और ईरान के बीच एक और अध्याय नहीं है, बल्कि इस्लामी गणराज्य की वैचारिक और प्रशासनिक क्षमता की बड़ी परीक्षा भी है। यदि तेहरान ने जल्दबाजी में आक्रामक कदम उठाए, तो इससे पूरे क्षेत्र में व्यापक संघर्ष भड़क सकता है और देश के भीतर भी अस्थिरता बढ़ सकती है। इसलिए कमजोर छवि बना चुके ईरान को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा और बदली परिस्थितियों के साथ आगे बढऩा होगा।

Published on:
09 Mar 2026 01:50 pm
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