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जयपुर में अब किसकी ‘जय’, बाजी छोटी… इम्तिहान बड़ा

जयपुर में मुकाबला भले ही 150 वार्डों का हो, लेकिन दांव कई दिग्गजों की सियासी साख पर लगा है। भाजपा के सामने राजधानी में अपनी पकड़ मजबूत रखने की चुनौती है तो कांग्रेस के लिए खोई जमीन वापस पाने की परीक्षा। बागी और निर्दलीय कई वार्डों में मुकाबले को बहुकोणीय बना रहे हैं।
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Sep 10, 2026
jaipur nagar nigam chunav
Jaipur: नगर निगम चुनाव (फोटो-एआई)

जयपुर के 150 वार्डों में फिलहाल मुकाबला पार्षद बनने का है, लेकिन दांव इससे कहीं बड़ा है। दस विधानसभा क्षेत्रों में फैली इस सियासी बिसात पर कहीं मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की साख का सवाल है, कहीं उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी की पकड़ की परीक्षा और कहीं कैबिनेट मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की सियासी ताकत का इम्तिहान। हर वार्ड में समीकरण अलग हैं। कहीं ‘कमल’ और ‘हाथ’ आमने-सामने हैं तो कहीं अपनों की नाराजगी ने मुकाबले में नया कोण जोड़ दिया है।

इसलिए नगर निगम का यह चुनाव सिर्फ पार्षदों की संख्या का हिसाब नहीं, राजधानी में सियासी असर की पैमाइश भी है। इस सबसे ऊपर बिना पार्षद बने किसी बाहरी को भी महापौर बनाने की ‘रस्म-ए-रियायत’ भी तमाम सियासी जोड़-बाकी के गणित को बिगाड़ने के लिए काफी है।

भाजपा ने प्रचार के आखिरी दिन मुख्यमंत्री को जयपुर में उतारकर अपनी प्राथमिकता साफ कर दी। इससे पहले संगठन महामंत्री बी.एल. संतोष की बैठक भी पार्टी की गंभीरता का संकेत दे चुकी है। अब अपनों को साधना और वोटों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती है। मालवीय नगर और झोटवाड़ा में टिकट को लेकर उपजी नाराजगी ने कई वार्डों में मुकाबले के कोण बढ़ा दिए हैं। सांगानेर में सीएम की साख के साथ निर्दलीयों ने समीकरणों में तड़का लगाया है, जबकि विद्याधर नगर में कहीं दो, कहीं तीन तो कहीं चार कोण तक मुकाबले हैं।

कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ मैदान में है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली भी बुधवार को अलवर में मतदान कर राजधानी पहुंचे और उन्होंने यहां कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए जनसम्पर्क किया। कांग्रेस के विधायक और विधानसभा चुनाव के प्रत्याशी अपने-अपने इलाकों में सक्रिय हैं। उसके लिए यह चुनाव सत्ता की लड़ाई से ज्यादा राजधानी में अपनी राजनीतिक जमीन नापने का मौका है।

आदर्श नगर में पार्टी के भीतर की खींचतान, सिविल लाइंस में नए चेहरों की आजमाइश और हवामहल में पुराने चेहरों व व्यक्तिगत पकड़ का असर दिख रहा है। यहां भी बागी और निर्दलीय अधिकृत प्रत्याशियों के सामने नई चुनौती बनकर खड़े हैं। इसी बीच, एआइएमआइएम सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी की गुलाबीनगर परिक्रमा ने भी छोटे चुनाव पर बड़ा सियासी तड़का लगा दिया है।

दसों विधानसभा क्षेत्रों का अपना अलग मिजाज है। कहीं संगठन की पकड़ भारी है, कहीं व्यक्तिगत रिश्ते और राजनीतिक विरासत, तो कहीं बागी उम्मीदवार पूरे गणित को नए सिरे से लिखने की कोशिश में हैं। बगरू में व्यक्तिगत पकड़ और पार्टी की साख आमने-सामने है, किशनपोल में पुराने शहर के स्थानीय और सामाजिक समीकरण अपना रंग दिखा रहे हैं, जबकि आमेर में सीधे मुकाबलों के बीच निर्दलीय तीसरा कोण बना रहे हैं। लेकिन वार्ड की चौखट पर बड़े नेताओं के नाम से ज्यादा सड़क, सीवर, सफाई, जलभराव, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, ट्रैफिक और अतिक्रमण जैसे सवाल असर डालेंगे। यही छोटे मुद्दे बड़े नारों की हवा निकाल सकते हैं और किसी प्रत्याशी की नैया पार भी लगा सकते हैं।

पिछली बार 250 वार्डों वाला जयपुर ग्रेटर और हैरिटेज के दो निगमों में बंटा था। अब शहर फिर एक निगम और 150 वार्डों में लौट आया है। नक्शा बदला है, मगर सियासत की गलियां वही हैं। रिश्ते भी, नाराजगी भी और अपने-पराए का हिसाब भी वैसा ही है। 14 सितंबर का नतीजा बताएगा कि इस बार वार्ड की चौखट से निकली सियासी लहर किसके दरवाजे तक पहुंची।

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