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जनता की स्मृतियों में जिंदा हैं जिम कॉर्बेट

इसके इतर वे गरीबों के प्रति अत्यधिक उदार और मानवीय गुणों से भरे संवेदनशील भलमानुष भी थे। उन्होंने अनेक बार स्वयं के जीवन को गंभीर संकट में डालकर मानव जीवन की रक्षा की।
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Jul 25, 2026
jim corbett
jim corbett

प्रयाग पाण्डे, नैनीताल

प्रकृति के सजग चितेरे, वन्यजीव विज्ञानी, शिकार कथाओं के लेखक और प्रसिद्ध शिकारी जेम्स एडवर्ड कॉर्बेट यानी जिम कॉर्बेट का 25 जुलाई को 151वाँ जन्मदिन है। जिम कॉर्बेट भले ही शारीरिक रूप से अब दुनिया में नहीं हैं। उन्होंने 79 वर्ष पहले भारत को अलविदा कह दिया था। 71 वर्ष पूर्व उनकी आत्मा अनंत में विलीन हो चुकी है। इसके बावजूद अपनी नेकदिली और भलमनसाहत के चलते जिम कॉर्बेट भारत के सामाजिक जीवन का अटूट हिस्सा बने हुए हैं। जिम कॉर्बेट को मानवीय गुणों से सुसंपन्न, भारत एवं भारत के गरीबों के आत्मीय दोस्त और शुभचिंतक के रूप में आज भी याद किया जाता है। जिन लोगों ने जिम कॉर्बेट को कभी देखा नहीं, वे भी गरीबों से अगाध प्रेम करने वाले नेक दिल इंसान के रूप में जिम के प्रति श्रद्धा रखते हैं, प्रतिवर्ष उनका जन्मदिन और पुण्यतिथि मनाते हैं। जिम की उदारता के लिए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

जेम्स एडवर्ड कॉर्बेट के पुरखे मूलतः आयरिश नागरिक थे। कॉर्बेट का कुटुंब तीन पीढ़ियों तक भारत में रहा। जिम कॉर्बेट का जन्म 25 जुलाई,1875 को नैनीताल में हुआ था। इस दृष्टि से वे जन्म से भारतीय थे। संस्कारों से भी। जिम के पिता का नाम क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट था। वे नैनीताल के हेड पोस्ट ऑफिस में पोस्ट मास्टर थे। उनकी माँ का नाम मैरी जेन कॉर्बेट था।
जिम, क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट और मैरी जेन की आठवीं, क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट की ग्यारहवीं जबकि मैरी जेन की बारहवीं संतान थे।

जिम कॉर्बेट की ख्याति एक कुशल शिकारी और शिकार कथाओं के रूप में है, लेकिन यह उनके व्यक्तित्व का अधूरा पक्ष है। वे अचूक निशानेबाज तो थे ही, इसी से उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली। इसके इतर वे गरीबों के प्रति अत्यधिक उदार और मानवीय गुणों से भरे संवेदनशील भलमानुष भी थे। उन्होंने अनेक बार स्वयं के जीवन को गंभीर संकट में डालकर मानव जीवन की रक्षा की। गरीबों के हितों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहे। इसी भलमनसाहत के चलते जिम कॉर्बेट के जन्म से ईसाई होने के बावजूद उत्तराखंड की धर्मभीरू जनता ने उन्हे 'गोरा साधु' की संज्ञा दी थी।

जिम कॉर्बेट ने स्वयं संघर्षपूर्ण जीवन जिया। व्यक्तिगत जीवन में अनेक संकट झेले, लेकिन जनता के व्यापक हित में अपने निजी और पारिवारिक कष्टों को नजरअंदाज कर दिया। जिम कॉर्बेट ने करीब डेढ़ हजार लोगों को मारने के लिए जिम्मेदार दर्जन भर से अधिक खूंखार नरभक्षियों का अत्यंत साहस और बहादुरी के साथ मुकाबला किया। अपने प्राणों की परवाह किए बिना नरभक्षियों से लड़े। जिन आदमखोरों के सामने देश- विदेश के अनेक नामचीन निशानेबाजों ने हथियार डाल दिए थे, जिम कॉर्बेट ने अकेले उनका खात्मा कर उत्तराखंड के निवासियों को नरभक्षियों के आतंक से मुक्ति दिलाई। नरभक्षियों को ठिकाने लगाने में उनके द्वारा दिखाए गए अदम्य साहस को देखते हुए उत्तराखंड का जनमानस जिम कॉर्बेट को चमत्कारिक शक्ति से संपन्न व्यक्ति मानता था।

जिम कॉर्बेट के जीवन का अधिकांश हिस्सा कुदरत के निकट सान्निध्य में बीता। उन्होंने जंगल को अपने भीतर सोख लिया था। उनका संपूर्ण जीवन प्रकृति के सूक्ष्म और गहन रहस्यों को जानते और आत्मसात करने में बीता। स्वअर्जित जंगल ज्ञान के बूते ही वे प्रकृति के ज्ञाता बने और दुर्दांत नरभक्षियों को मारने में सफल हुए।

जिम कॉर्बेट का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे प्रकृति विज्ञानी, वन्यजीव विशेषज्ञ एवं मशहूर शिकारी थे साथ ही वन्यजीव रक्षक भी। उन्होंने रेलवे में नौकरी की। सेना में भी सेवाएं दी। जिम कॉर्बेट को सेना में कर्नल की पदवी से नवाजा गया था। वे लोकप्रिय जनप्रतिनिधि भी रहे। जिम कॉर्बेट ने 1907 से 1940 के कालखंड में नैनीताल नगर पालिका के सदस्य, उपाध्यक्ष, वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं कार्यवाहक अध्यक्ष के दायित्वों का निर्वहन किया। वे ठेकेदार भी थे और संपत्ति एजेंट भी। जिम सिद्धहस्त लेखक भी थे और प्रसिद्ध वन्यजीव फोटोग्राफर भी। जिम की तत्कालीन अंग्रेज शासकों के साथ निकटता भी थी और वे भारत के गरीबों के अजीज दोस्त एवं हमदर्द भी थे। जिम कॉर्बेट के व्यक्तित्त्व का सबसे उजला पक्ष था- उनकी दानशीलता और गरीबों के प्रति आत्मीयता।

1893 से 1914 के दौरान मोकामाघाट में रेलवे की नौकरी के कालखंड को छोड़कर जिम कॉर्बेट का अधिकांश जीवन नैनीताल और कालाढूंगी में ही बीता। जिम कॉर्बेट भारत भूमि और भारत के गरीबों से बेपनाह मोहब्बत करते थे। जिम कॉर्बेट ने अपनी बहुचर्चित किताब "माय इंडिया" हिंदुस्तान के गरीबों को समर्पित की है। जिम कॉर्बेट ने "माय इंडिया" की प्रस्तावना में लिखा है:- "जिस हिंदुस्तान को मैं जानता हूँ, उसमें चालीस करोड़ लोग रहते हैं, जिनमें से नब्बे फीसदी लोग सीधे- सादे, ईमानदार, बहादुर, वफादार और मेहनती हैं,जिनकी रोजाना की इबादत- ऊपर वाले से और जो भी सरकार गद्दी पर हो, से यही रहती है कि उनकी जान-माल की सलामती बनी रहे और वो अपनी मेहनत का फल अच्छे से खा सकें। हिंदुस्तान के ये वो लोग हैं, जो निपट गरीब हैं और जिन्हें अक्सर 'हिंदुस्तान के करोड़ों अधपेटे' कहा जाता है। ये वे लोग हैं जिनके बीच मैं रहा हूँ और जिनसे मैं मोहब्बत करता हूँ। यही वो लोग हैं जिनके बारे में बताने की कोशिश मैं इस किताब के पन्नों में करूँगा,और यह किताब मैं अपने उन्हीं दोस्तों के नाम करता हूँ। हिंदुस्तान के गरीबों के नाम।"

जिम कार्बेट और उनकी बहन मारग्रेट विनिफर्ड "मैगी" ने 30 नवंबर, 1947 को भारी मन से नैनीताल को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था। वे रोते- बिलखते सेवकों को छोड़कर केन्या की ओर चल पड़े। जिम कॉर्बेट और मैगी कभी नैनीताल नहीं छोड़ना चाहते थे। नैनीताल छोड़ते समय अपनी मनोदशा के बारे में जिम कॉर्बेट की बहन मैगी ने केन्या से अपने किसी मित्र को भेजे पत्र में लिखा था:-"जिस सुबह हम निकलने वाले थे,सुबह सबसे पहले हमने तालाब को देखा, सुबह की रोशनी में तालाब बेहद खूबसूरत दिख रहा था। तालाब की इस खूबसूरती को शब्दों में व्यक्त कर पाना असंभव है। हमारे नौकरों ने हमारा जाना आसान नहीं किया, वे रो रहे थे। उनके आंसू गालों से नीचे को लुढ़क रहे थे।जब हम पहाड़ी से नीचे उतर रहे थे, हमने मुड़कर उस घर (गर्नी हाउस) को देखा, जिस घर को अब हम दुबारा कभी नहीं देख पाएंगे।"

जिम कॉर्बेट बेहतरीन शिकारी ही नहीं बल्कि उच्चकोटि के आदर्शवादी इंसान भी थे। जिम कॉर्बेट ने दर्जनों आदमखोर बाघ,तेंदुए और शेरों को उनके अंतिम अंजाम तक पहुँचाया, लेकिन वे आमदखोर जानवर को भी अपने बचाव का भरपूर अवसर देने के प्रबल पक्षधर थे। जिम कॉर्बेट के इस उच्च स्तरीय आदर्शवादिता को एक वाकये से बखूबी समझा जा सकता है।

जब जिम कॉर्बेट मोहान के खूंखार नरभक्षी शेर को मारने के लिए घने जंगल में अकेले उसका पीछा कर रहे थे, एकाएक एक गहरी संकरी खाई में जिम कॉर्बेट और नरभक्षी शेर का प्रत्यक्ष आमना- सामना हो गया। शेर, चारे के रूप में लगाए गए कटड़े को खा कर संकरी खाई में टूटे वृक्ष के तने के नीचे आराम फरमा रहा था। नरभक्षी को खोजते हुए जिम उसके बेहद करीब पहुँच गए। नरभक्षी शेर के मुँह और जिम के बीच केवल पाँच फिट का फासला था,शेर नींद में था। जिम ने नरभक्षी शेर के माथे पर दनादन दो गोलियां उतार दीं।शेर वहीं पर ढेर हो गया। जिम कॉर्बेट इस नरभक्षी को मारने के निमित्त महीनों से दिन -रात जंगलों की खाक छान रहे थे। उनका काम पूरा हो गया था। इस वाकये के वक्त वहाँ जिम और नरभक्षी के अलावा कोई और चश्मदीद नहीं था। शेर को मारने के बाद जिम शेर की लाश के पास ही गिरे हुए पेड़ के तने पर बैठ गए,सिगरेट सुलगाई और सोचने लगे कि उन्होंने नरभक्षी शेर को मारने का यह काम ठीक ईमानदारी से नहीं किया। जिम कॉर्बेट सोते हुए शेर को मार गिराने को नैतिक रूप से उचित ठहराने के लिए मन ही मन अनेक तर्क गढ़ने लगे। उन्होंने खुद को तसल्ली देने के लिए तर्क दिया कि शेर नरभक्षी था,जिसका जीवित रहने से मर जाना बेहतर था, इसलिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि जब उसे मारा गया वह जागा हुआ था या सोया हुआ। यदि उसे छोड़ दिया जाता तो उन सभी मानवों की संभावित मृत्यु के लिए, जिन्हें वह उसके बाद मारता,उसके लिए नैतिक रूप से वे (जिम) ही जिम्मेदार होते। जिम कॉर्बेट का मानना था कि सोये हुए शेर को मारने के लिए इन बलवान तर्कों के बावजूद यह खेद फिर भी बचा रह जाता है कि उन्होंने सोते हुए जानवर को बचाव के लिए खिलाड़ी जैसा मौका दिए बिना मार दिया। जिम कॉर्बेट का मानना था कि आदमखोर जानवर को भी बचाव का उचित अवसर मिलना चाहिए। जिम ने इस घटना पर अफसोस जताते हुए खुद इसका उल्लेख अपनी किताब "कुमाऊँ के नरभक्षी" में किया है।

जिम कॉर्बेट में गजब की दानशीलता थी। कालाढूंगी का छोटी हल्द्वानी नाम का गाँव जिम कॉर्बेट की दानशीलता का जीवंत प्रमाण है। जिम पूरे छोटी हल्द्वानी गाँव की जमीन के मालिक थे। उन्होंने 1915 में 221 एकड़ रकबे वाला यह गाँव खुद खरीदा था। जिम ने इस गाँव में चालीस गरीब परिवारों को आसामी के रूप में बसाया था। उन्होंने अपने आसामियों के लिए घर बनाए, पीने और सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था की और गाँव की सुरक्षा के लिए चारों ओर पत्थर की चहारदीवारी बनवाई। जिम कॉर्बेट द्वारा गाँव की हिफाज़त के लिए बनाई गई दीवार का कुछ हिस्सा अभी भी मौजूद है।

तब यूनाइटेड प्रोविंसेज (अविभाजित उत्तर प्रदेश) के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर सर विलियम मैल्कम हैली के साथ जिम कॉर्बेट की घनिष्ठता थी। सर हैली और जिम ने मिलकर अनेक शिकार यात्राएं की थी। जिम कॉर्बेट के सुझाव पर ही सर मैल्कम हैली ने 1934 में रामगंगा से लगे 324 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को अभयारण्य घोषित किया था। यहाँ हैली नेशनल पार्क नाम से भारत का पहला राष्ट्रीय अभयारण्य बना, जो अब जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के नाम से ख्यात है। भारत छोड़ने से पहले जिम छोटी हल्द्वानी गाँव को अपने किराएदारों को मुफ़्त में दे गए। केन्या चले जाने के बाद भी जिम छोटी हल्द्वानी गाँव की लगान की राशि, अपने पुराने सेवकों को आर्थिक सहायता और उत्तराखंड के सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों के लिए चढ़ावा/दान केन्या से नियमित रूप से भेजा करते थे। जिम की मृत्यु के बाद उनकी बहन मैगी ने भी आर्थिक सहयोग भेजने का यह सिलसिला अनवरत जारी रखा। मैगी इस निमित्त न्येरी (केन्या) से हर साल नौ - दस हजार रुपए भेजती थीं। वर्तमान में जिम के गाँव छोटी हल्द्वानी में करीब दो सौ परिवार निवास कर रहे हैं। इनमें से अधिकांश लोगों की आजीविका आज भी जिम कॉर्बेट के नाम पर ही चल रही है।

जिम कॉर्बेट ने अपने जीते - जी समाज की खूब नि:स्वार्थ सेवा की। उनकी मृत्यु के 71 वर्ष बीत जाने के बाद भी आज उनके नाम से कालाढूंगी और रामनगर क्षेत्र में सालाना हजारों करोड़ रुपए का पर्यटन व्यवसाय चल रहा है। इस क्षेत्र में फड़ - खुमचों से लेकर बड़े - बड़े टूरिस्ट रिसॉर्ट जिम कॉर्बेट के नाम पर चल रहे हैं। जीवित रहते जिम कॉर्बेट ने सशरीर आम लोगों की भरपूर मदद की, उनकी मृत्यु के बाद उनका नाम लोगों की मदद कर रहा है। इस दृष्टि से जिम कॉर्बेट अविस्मरणीय थे और रहेंगे।

Updated on:
25 Jul 2026 03:05 pm
Published on:
25 Jul 2026 03:04 pm