- पत्रिका में कुलिश जी ने पत्रकार के लेखन और संपादक के विचारों से मतभेद पर भी कभी आपत्ति नहीं की।
विजय भंडारी, पूर्व संपादक, राजस्थान पत्रिका
राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चन्द्र कुलिश से मेरा परिचय दिसम्बर 1955 में हुआ था, जब मैं राजस्थान विश्वविद्यालय के कन्वोकेशन में डिग्री लेने आया था। कुलिश जी से मेरा परिचय कोमल कोठारी ने कराया जो मेरे बुआ के पुत्र थे। कुलिश जी तब राष्ट्रदूत में थे जहां घुमक्कड़ उपनाम से उनकी डायरी हर बुधवार को छपती थी।
उन्हीं दिनों सोवियत संघ के नेता बुलगानिन और खु्रश्चेव जयपुर आने वाले थे। रामनिवास बाग के म्यूजियम पर उनका स्वागत समारोह था। जयपुर में वे पूर्व महाराजा एवं राजप्रमुख सवाई मानसिंह के अतिथि थे। उन्हें निजी महल में ठहराया गया था। सिटी पैलेस में पूर्व महाराजा की ओर से अभिनंदन किया गया था। उसमें जयपुर रियासत के सभी सरदारों को सामंती वेशभूषा में बुलाया गया था। उस समारोह को लेकर कुलिश जी ने कड़ी टिप्पणी की थी। राजस्थान मंत्रिमंडल के सदस्यों को भी आमंत्रित किया गया था। लेकिन उनके बैठने की दीर्घा को लेकर मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाडिय़ा ने आपत्ति की थी। दूसरी टीका का कारण राज्य सरकार के रुपयों से की गई सिटी पैलेस का रंग-रोगन और साज-सज्जा थी। कुलिश जी ने राजकीय धन से यह खर्च करने पर आपत्ति की थी। उनकी आलोचना का कारण यह था कि जब वे महाराजा के मेहमान हैं तब उनके निजी पैलेस पर सरकारी रुपया क्यों खर्च किया जा रहा है? राजस्थान के मंत्री जनप्रतिनिधि हैं और लोकतांत्रिक सरकार है, तब उनके बैठने का स्थान सम्मानजनक होना चाहिए। जबकि रियासत के सरदारों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। जैसे कोई राजदरबार हो रहा हो। इन टीकाओं को लेकर जनता उद्वेलित थी तथा महाराजा ने राष्ट्रदूत के मालिक हजारीलाल जी से शिकायत की। इस विरोध को मान्य करने पर कुलिश जी ने राष्ट्रदूत से ही त्यागपत्र दे दिया था। वे इसे पत्रकार की स्वतंत्रता पर आघात मानते थे। वे पत्रकार की लेखनी पर किसी प्रकार के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष अंकुश और दबाव के घोर विरोधी थे। पत्रिका में उन्होंने पत्रकार के लेखन और संपादक के विचारों से मतभेद पर भी कभी आपत्ति नहीं की थी। ऐसे स्वतंत्र विचारों के संपादक-स्वामी दुर्लभ ही मिलते हैं।
(विजय भंडारी की हाल ही प्रकाशित पुस्तक 'भूलूं कैसे' से)