Freedom of Press: 1975 के आपातकाल में जब मीडिया मौन था, तब कुलिश जी ने खाली संपादकीय छोड़कर लोकतंत्र की रक्षा की। कर्पूर चन्द्र कुलिश जी की जन्म शती के अवसर पर पढ़ें राजस्थान पत्रिका के संस्थापक के अदम्य साहस की यह ऐतिहासिक कहानी।
Emergency in India: भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जो केवल समाचार पत्र के संस्थापक नहीं, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन, एक विचार और एक अडिग स्तंभ के रूप में याद किए जाते हैं। पत्रकारिता के मनीषी और शलाका पुरुष राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक, कर्पूर चन्द्र कुलिश जी (Karpoor Chandra Kulish)का नाम इस सूची में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। जब सत्ता का सूर्य अपने चरम पर था और लोकतंत्र पर ग्रहण लगाने की तैयारी की जा रही थी, तब उन्होंने सच लिखा। आज जब हम और आज की पत्रकारिता की तुलना करते हैं, तो कुलिश जी का व्यक्तित्व एक 'लाइटहाउस' की तरह खड़ा दिखाई देता है, जो बताता है कि जब आंधियां तेज हों, तब दीये की लौ को कैसे बचाया जाता है। एक बात का जिक्र प्रासंगिक है कि 1975 का वह दौर, भारतीय राजनीति और पत्रकारिता, दोनों के लिए अग्निपरीक्षा का समय था। जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था। यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक वज्रपात जैसा था। उस समय, जब अधिकतर मीडिया संस्थान सत्ता के भय से कांप रहे थे या मौन धारण कर रहे थे, कुलिश जी की लेखनी ने बेबाकी से सत्य का साथ दिया।
कुलिश जी का साफ तौर पर मानना था कि "लोकतंत्र में साधन की पवित्रता उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी साध्य की।" उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए लिखा कि गलत तरीके से चुनाव जीतना न केवल संविधान का अपमान है, बल्कि यह जनमत के साथ भी धोखा है। उन्होंने अपने लेखों में साफ तौर पर लिखा कि यदि शीर्ष पर बैठा व्यक्ति ही नियमों की अनदेखी करेगा, तो लोकतंत्र की नींव हिल जाएगी। खास बात यह है कि उन्होंने व्यक्ति पूजा के बजाय विधि के शासन को सर्वोपरि माना। उन्होंने आपातकाल लगने से ठीक पहले जो लिखा, वह एक भविष्यदृष्टा की चेतावनी थी।
उन्होंने भांप लिया था कि सत्ता अपनी वैधता खोने के बाद दमन का रास्ता अपनाएगी। यहां यह बात लिखना समीचीन होगा कि जब आपातकाल (Emergency 1975 India)की घोषणा के साथ ही देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ताला लगा दिया गया और सेंसरशिप लागू हो गई थी। ऐसे समय में कुलिश जी ने चार प्रमुख आलेखों लिखे, जिनका जिक्र अक्सर 'हस्ताक्षर' पुस्तक के संदर्भ में होता है, वे पत्रकारिता के छात्रों के लिए 'केस स्टडी' हैं। अहम बात यह है कि आपातकाल से ठीक पहले और बाद के उनके अग्रलेखों में एक गजब का संतुलन और साहस था। उन्होंने यह कहने में संकोच नहीं किया कि जनादेश का सम्मान होना चाहिए, लेकिन वह जनादेश छल से प्राप्त नहीं होना चाहिए।
जब सेंसरशिप के कारण लिखना असंभव हो गया, तो कुलिश जी ने विरोध का एक ऐसा तरीका अपनाया, जो इतिहास बन गया। उन्होंने संपादकीय की जगह को 'खाली' छोड़ना शुरू कर दिया। अहम बात यह थी कि उन्होंने सेंसरशिप के समय संपादकीय खाली छोड़ कर मौन विद्रोह का शंखनाद किया। यह कोरा कागज सत्ता के मुंह पर किसी भी लिखे हुए शब्द से ज्यादा जोरदार तमाचा था। यह मौन चीख-चीख कर कह रहा था कि लोकतंत्र का गला घोंटा जा रहा है। उनके आलेखों का सार यह था कि सरकारें आती-जाती रहेंगी, लेकिन पत्रकारिता का धर्म 'जनता की आवाज' बनना है। उन्होंने अपने आलखों के माध्यम से पाठकों को यह समझाने की कोशिश की कि नागरिक अधिकारों का हनन किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
कुलिश जी के दौर की पत्रकारिता, जिसे हम 'कल की पत्रकारिता' कह सकते हैं, वह एक 'मिशन' थी। उस समय पत्रकारिता व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का एक उपकरण थी। कुलिश जी जैसे संपादकों की रीढ़ की हड्डी सीधी थी। वे विज्ञापन या सरकारी सुविधाओं के लिए अपनी कलम गिरवी नहीं रखते थे। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि उस दौर में लिखे गए उनके एक-एक शब्द का वजन होता था। सरकारें हिल जाया करती थीं क्योंकि उन शब्दों के पीछे 'सत्य का नैतिक बल' होता था।
जब हम 'कुलिश जी' को आधार बनाकर 'आज की पत्रकारिता' का विश्लेषण करते हैं, तो तब पत्रकारिता मूल्यों पर आधारित थी और अब दृश्य कुछ धुंधला और चिंताजनक नजर आता है। आज पत्रकारिता 'मिशन' से हट कर 'प्रोफेशन' और कई बार 'कॉरपोरेट पीआर' नजर आती है। कुलिश जी का मानना था कि पत्रकार का काम 'विपक्ष' की भूमिका निभाना है, यानि सत्ता से सवाल पूछना। आज की पत्रकारिता अक्सर सत्ता से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से सवाल पूछ रही है, जो पत्रकारिता के मूल सिद्धांत के विपरीत है।
आज के दौर में उनके विचारों की प्रासंगिकता सबसे अधिक है। उनका लेखन हमें याद दिलाता है कि पत्रकार का काम सत्ता के गलियारों में रसूख बनाना नहीं, बल्कि धूल भरे रास्तों पर चलते आम आदमी की पीड़ा को शब्द देना है। अखबार का मालिक व्यापारी हो सकता है, लेकिन संपादक को ऋषि होना चाहिए। कुलिश जी ने इस लकीर को इतना गहरा खींचा कि आज भी राजस्थान पत्रिका उसी 'क्रेडिबिलिटी' (विश्वसनीयता) के दम पर खड़ा हुआ है। तकनीक बदल गई है, प्रिंट से हम डिजिटल में आ गए हैं, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा वही है-साहस। यदि आपके पास सच बोलने का कलेजा नहीं है, तो आप पत्रकार नहीं, केवल सूचना प्रदाता हैं।
कुलिश जी का जीवन व उनके विचार यह साबित करते हैं कि अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो, एक अकेला दीपक उसे चुनौती दे सकता है। आपातकाल के दौरान जब बड़े-बड़े सूरमाओं ने घुटने टेक दिए थे, तब कुलिश जी तनकर खड़े रहे। यह क्रांतिकारी कदम और विचार ही राजस्थान पत्रिका की थाती है। युवा पत्रकारों को यह सीखने की जरूरत है कि "चुनाव जीतना ही सब कुछ नहीं है, चुनाव कैसे जीता गया, यह महत्वपूर्ण है।" और "खबर छापना ही सब कुछ नहीं है, खबर का असर और उसकी नैतिकता महत्वपूर्ण है।" कर्पूर चन्द्र कुलिश केवल एक व्यक्ति नहीं थे, वे पत्रकारिता के एक ऐसे संस्थान थे जिन्होंने सिखाया कि जब कलम और तलवार की लड़ाई होती है, तो अंततः जीत कलम की ही होती है, बशर्ते उस कलम को पकड़ने वाले हाथ में कंपन न हो। आज की पत्रकारिता को अपने हाथों का वह कंपन दूर करने के लिए कुलिश जी के आदर्शों की संजीवनी की आवश्यकता है।
(यह आलेख श्री कर्पूर चन्द्र कुलिश जी के जन्म शताब्दी वर्ष में ज्वलंत मुद्दों पर आज भी प्रासंगिक विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)