
यौन हिंसा की पीडि़ताओं की निजता, उनके अधिकारों, सुरक्षा व जांच प्रक्रिया से जुड़े मामलों को लेकर देश की शीर्ष अदालत से लेकर राज्यों के उच्च न्यायालयों तक ने सरकारों को दिशा-निर्देश दिए हैं। झारखंड हाईकोर्ट की ओर से एक हालिया फैसले में बलात्कार के मामलों में एफआइआर को अनिवार्य रूप से दर्ज करने, अमानवीय और अपमानजनक ‘टू फिंगर टेस्ट’ को बंद करने व पीडि़ताओं के पुनर्वास व शिक्षा को लेकर दिए गए दिशा-निर्देश बताते हैं कि अभी भी प्रभावी तौर पर निर्देशों की पालना नहीं की जा रही। जबकि न्याय व्यवस्था को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में यौन हिंसा पीडि़ताओं को पर्याप्त संरक्षण जरूरी है। अदालत की इस टिप्पणी पर भी गौर करना होगा, जिसमें उसने कहा है कि कई मामलों में बलात्कार पीडि़ताओं को सामाजिक उपहास और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है।
सच भी यही है कि अपराधी कोई और होता है और सवालों की बौछार का सामना पीडि़ताओं को करना पड़ता है। जांच प्रक्रिया के दौरान भी कभी पीडि़ता के वस्त्रों पर चर्चा होती है तो कभी उसके चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं। इतना ही नहीं, पीडि़ता के बाहर निकलने के समय को लेकर भी बहस होती है। हालात ऐसे हो जाते हैं मानो अदालत के कठघरे में पीडि़ता ही अपराधी की तरह खड़ी हो। झारखंड हाईकोर्ट ने यौन हिंसा की पीडि़ताओं के अधिकारों, सुरक्षा, न्याय और पुनर्वास से जुड़ी जनहित याचिका पर राज्य सरकार, पुलिस विभाग और संबंधित एजेंसियों को साफ कहा है कि किसी भी संज्ञेय अपराध, विशेषकर यौन हिंसा और पॉक्सो के मामलों में, क्षेत्राधिकार का हवाला देकर एफआइआर दर्ज करने से इनकार नहीं किया जा सकता। जीरो एफआइआर दर्ज करना पुलिस की जिम्मेदारी है। एफआइआर दर्ज नहीं करना कानून के उल्लंघन के समान है। बलात्कार पीडि़ताओं के सरकारी व निजी अस्पतालों में अपमानजनक टू फिंगर टेस्ट को पूरी तरह से बंद करने के निर्देश देते हुए अदालत ने यह भी कहा है कि इसका उल्लंघन पेशेवर कदाचार माना जाएगा। जाहिर है, जांच के अमानवीय तरीकों का वैज्ञानिक आधार न होने के बावजूद लंबे समय तक जारी रहना तंत्र की संवेदनहीनता का परिचायक है।
बलात्कार के कई मामलों में पीडि़ताएं पुलिस थानों और मेडिकल जांच के लिए भी अस्पतालों का रुख इसी डर से नहीं कर पातीं कि कहीं पुलिस की जांच प्रक्रिया ही उनके लिए नई यातना का कारण न बन जाए। आवश्यकता केवल कानूनी सख्ती की ही नहीं, समूची मानसिकता में बदलाव की भी है। स्कूलों और कॉलेजों में लैंगिक संवेदनशीलता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, ताकि पीडि़ताओं के प्रति सहानुभूति का पक्ष अधिक मजबूत हो सके। बलात्कार पीडि़ता की सबसे बड़ी त्रासदी उसके प्रति समाज के सवाल उठाते व्यवहार की है। यौन हिंसा के मामलों में पीडि़ताओं को संदेह की नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान की रक्षा करने वाली दृष्टि से देखना होगा।