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संपादकीय: गंभीर सामाजिक समस्या पर कोर्ट का संवेदनशील हस्तक्षेप

हाईकोर्ट ने 'केयर लीवर्स' के जीवन की हर व्यावहारिक कठिनाई का समाधान खोजने का प्रयास किया है। संस्था छोडऩे से पहले 17.5 साल की उम्र से ही आधार कार्ड, बैंक खाता और पहचान पत्र बनाने के निर्देश देना व्यवस्था की बुनियादी खामी को दूर करता है।
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चिल्ड्रेन होम और बाल देख-रेख संस्थानों से 18 साल की उम्र पूरी कर बाहर निकलने वाले युवाओं, जिन्हें 'केयर लीवर्स' कहा जाता है, के लिए शिक्षा व नौकरियों में एक फीसदी आरक्षण और अन्य सहूलियतों के लिए स्थायी नीति बनाने का निर्देश देना राजस्थान हाईकोर्ट का ऐतिहासिक कदम है। जब तक स्थायी नीति नहीं बनती तब तक आयु सीमा में छूट, परीक्षा शुल्क से पूर्ण राहत, छात्रवृत्ति और ब्याज-मुक्त ऋण जैसी अंतरिम राहतें देने के आदेश दिए गए हैं। यह फैसला गंभीर सामाजिक समस्या पर अदालत का संवेदनापूर्ण हस्तक्षेप कहा जाएगा। चिल्ड्रेन होम और बाल संरक्षण संस्थानों में ऐसे असहाय बच्चे पलते हैं, जिनका दुनिया में 'अपना' कोई नहीं होता। जिजीविषा उन्हें अपराध की दुनिया में धकेलने के लिए विवश करती रहती है।

अदालत ने बेहद संजीदगी से इस कड़वी सच्चाई को रेखांकित किया और कहा कि है कि सरकार माता-पिता की तरह इन युवाओं की अंगुली तब तक थामे रखे, जब तक वे अपने पैरों पर पूरी तरह खड़े न हो जाएं। हाईकोर्ट ने 'केयर लीवर्स' के जीवन की हर व्यावहारिक कठिनाई का समाधान खोजने का प्रयास किया है। संस्था छोडऩे से पहले 17.5 साल की उम्र से ही आधार कार्ड, बैंक खाता और पहचान पत्र बनाने के निर्देश देना व्यवस्था की बुनियादी खामी को दूर करता है। अक्सर देखा गया है कि कागजात न होने के कारण ये युवा किसी भी सरकारी योजना का लाभ पाने से वंचित रह जाते थे। इसके अलावा, राज्य व जिला स्तर पर 'केयर लीवर्स सचिवालय' और 'आफ्टरकेयर आइडी कार्ड' की व्यवस्था से इनका एक प्रामाणिक डिजिटल डेटाबेस तैयार हो सकेगा, जिससे नीतिगत लाभ सीधे इन तक पहुंचेंगे। उच्च शिक्षा के लिए मासिक छात्रवृत्ति, मुफ्त हॉस्टल सुविधा और पांच लाख रुपए तक का ब्याज-मुक्त ऋण देना इन युवाओं को न केवल आर्थिक संबल प्रदान करेगा, बल्कि उनमें यह आत्मविश्वास भी जगाएगा। हाईकोर्ट ने जिस प्रकार मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 'राज्य बाल न्याय परिषद' का गठन करने, प्रत्येक जिले में 'केयर लीवर्स सचिवालय' बनाने और आठ सप्ताह में अनुपालना रिपोर्ट पेश करने के कड़े निर्देश दिए हैं, जो इस बात का संकेत है कि अदालत केवल फैसला सुनाकर शांत बैठने वाली नहीं है।

अब गेंद केंद्र और राज्य सरकार के पाले में है। राज्य सरकार को चाहिए कि वह इस अवसर का उपयोग देश के समक्ष एक आदर्श 'आफ्टरकेयर मॉडल' प्रस्तुत करने के लिए करे। हम उम्मीद कर सकते हैं कि व्यापक नीति बनाते समय सरकार चिल्ड्रेन होम या बाल संरक्षण संस्थानों को यह जिम्मेदारी भी देगी कि वे भोजन और छत के साथ-साथ ऐसी शिक्षा भी दें कि बालिग होने के बाद वे अपनी योग्यता के साथ उच्च शिक्षा या नौकरियों में अपना दावा मजबूती से रख सकें। सिर्फ आरक्षण देने से बात नहीं बनेगी। माता-पिता से वंचित ऐसे बच्चों को योग्य नागरिक बनाना भी सरकार का ही दायित्व होना चाहिए।