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हमारी सृष्टि का आधार है पुरुष और प्रकृति। यह मूल में ब्रह्म और माया का विकसित स्वरूप है। पुरुष को रस तथा माया को बल कहा जाता है। सृष्टि में जो कुछ दिखाई देता है, वह ब्रह्म का विवर्त ही है। इसमें से मायाभाव के हटते ही फिर से पुरुष भाव ब्रह्म में लीन हो जाता है। यही कारण है कि सृष्टि को पुरुष प्रधान कहते हैं। इसका एक वैज्ञानिक आधार भी है। पुरुष रूप अग्नि में स्त्री रूप सोम आहुत होता है, तब नया निर्माण होता है। सोम का अस्तित्व गौण रहता है। अग्नि-सोम का यह संबंध एकपक्षीय है। यह भी पुरुष प्रधान सृष्टि का आधार है, इसलिए ही पुरुष की भोक्ता संज्ञा है। जब भी अग्नि-सोम अथवा रस-बल से सृष्टि होती है, इसमें यदि रस की प्रधानता हो तो उसे मन-प्राण-वाक् कहते हैं। बल अथवा प्रकृति प्रधान हो तो सत-रज-तम कहते हैं।
सत्वगुण प्रकाश रूप, रजोगुण प्रवृत्तिकारक तथा तमोगुण आवरक है। मन-प्राण-वाक् में भी प्राण क्रियावाचक है। सत और तम निश्चल हैं। मन और वाक् भी निश्चल हैं। क्रिया शून्य हैं। जब तीनों गुण अपने ही रूपों में परिणित होते रहते हैं, उनको 'स्वाप' कहा जाता है। जब तीनों गुणों की एक-दूसरे में व्याप्ति होती रहती है, तब उसे 'जागरण' कहते हैं। यही स्वभाव है। यही विक्षोभ है। ब्रह्म की सृष्टि निर्माण की इच्छा इस विक्षोभ की जनक है।
एकोऽहं बहु स्याम् कामना की पूर्ति में ब्रह्म प्रजोत्पत्ति हेतु स्वयं को दो भागों में विभक्त करता है। उसका अद्र्धांग वृषा तथा शेष अद्र्धांग योषा है। इस युगल से ही विराट् प्रजा की उत्पत्ति हुई। यज्ञ का प्रयोजन दिव्यात्मा को उत्पन्न करना है जो ब्रह्म का अंशभूत है। यह प्रजनन यज्ञ प्राण देवता और सोम प्राण रूप देव पत्नियों के मिथुन पर अवलम्बित है। जब तक प्रार्थना द्वारा इनको आत्मसात् नहीं कर लिया जाता तब तक प्रजा की उत्पत्ति नहीं हो सकती। स्थूल जगत् में भी यज्ञ में पत्नी के योग का अभिप्राय यही है। पत्युर्नो यज्ञसंयोगे इस पाणिनीय सिद्धान्त के अनुसार यज्ञ में योग होने से ही पत्नी शब्द निष्पन्न होता है। बिना पत्नी के यज्ञ अपूर्ण रहता है। शतपथ ब्राह्मण में पात्नीव्रत ग्रहयाग भी इसी सन्दर्भ को विवेचित करता है। यहां केवल साथी की उपस्थिति नहीं, बल्कि यज्ञ के पूर्णता भाव की भी अनिवार्यता है। पत्नी भी यजमान की ऊर्जा, समर्पण और गृहस्थ जीवन की पूर्णता की द्योतक महत्त्वपूर्ण इकाई है।
याज्ञिक प्रक्रिया में पात्नीव्रत ग्रह एक विशेष पात्र है जो अग्नि और देवपत्नियों को समर्पित होता है। ऋ ग्वेद में पात्नीव्रत का अर्थ यज्ञ की प्रक्रिया में पति-पत्नी के सामूहिक कल्याण भाव से है, जहां दोनों मिलकर यज्ञ को पूर्ण करते हैं। मूलत: यह सोम याग है। याज्ञिक प्रक्रिया में इस अनुष्ठान को चालीस ग्रह पात्रों से पूर्ण किया जाता है, जिसमें 38 ग्रह आग्नेय हैं, वृषात्मक हैं। 39 वां ग्रह पात्नीव्रत ग्रह कहलाता है जो सौम्य है, योषा है। और 40 वां हारीयोजन ग्रह छन्ददेवता से सम्बद्ध है। यह मूलत: इन्द्र प्राण का द्योतक है। इन्द्रो वै मरुत: श्रुति वचन के अनुसार मरुत् प्राण ही इन्द्र है। गर्भ प्रतिष्ठा और गर्भ च्युति दोनों ही अवस्थाओं में यह मरुत प्राण विशेष सहयोगी है। इसको मातरिश्वा वायु भी कहा जाता है। साथ ही यह गर्भकाल में भी गर्भस्थ की रक्षा करता है।
38 ग्रह पुरुषत्व, वीर्य और स्थिरता के प्रतीक हैं। ये 38 सूक्ष्म धाराएं हैं, जो बीज के भीतर छिपी सभी सृष्टि-शक्तियों को एकत्रित करती हैं। स्त्री पात्र स्त्रीत्व, गर्भाशय और धारणशक्ति का प्रतीक है। इसी पात्र में प्रविष्ट होकर 38 बीजधाराएं समाहित होती हैं। संयुक्त पात्र (चालीसवां) वह केन्द्र बिन्दु है जहां पुरुषधाराएं स्त्री-पात्र में प्रवेश करती हैं। यूं तो स्त्री-पुरुष दोनों में सभी 40 ग्रह रहते हैं किन्तु पुरुषों में पुरुष-ग्रह प्रधान रहते हैं। स्त्रियों में स्त्री-ग्रह प्रधान रहते हैं। पुरुष ग्रह द्यावापृथिवी से सम्बन्ध रखते हैं जबकि पात्नीव्रत ग्रह का सौम्य अन्तरिक्ष से सम्बन्ध है। अन्तरिक्ष के एक ओर द्युलोक है तथा दूसरी ओर पृथिवी है। अन्तरिक्ष में ही सोम भरा है। यही सोम अन्धकार को दूर करता है- त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ (ऋ .1.91.22)। इसी सोम से सभी ग्रह वीर्यवान है। यद्यपि प्राकृतिक यज्ञ में स्त्रियां निर्वीर्य हैं किन्तु पुरुषों की वीर्य सम्पत्ति की हेतु स्त्रियां ही हैं। सोम के अभाव में अग्नि बुझ जाता है क्योंकि सोम ही अग्नि की शक्ति है। इसी शक्ति के कारण वह शक्तिमान है। यही कारण है कि शक्तिरूपा स्त्री के बिना पात्नीव्रत यज्ञ अधूरा रहता है। अत: यज्ञों में देवपत्नियों को भी शामिल किया जाता है।
इन 38 ग्रहों में 36 सृष्टि की जड़ संरचना से जुड़े हैं और 2 तत्व प्राण और चेतना है। 36 ग्रहों में 5 महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी), 5 तन्मात्राएं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध), दस इन्द्रियां (5 ज्ञानेन्द्रिया और 5 कर्मेन्द्रियां), 4 अन्त:करण (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार), 5 प्राण वायु (प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान), 3 गुण (सत्व, रजस, तमस), 4 आत्म तत्व (काल, नियति, राग, विद्या) समाहित हैं।
ये चालीस पात्र सोम के 40 सूक्ष्म रूपों के प्रतीक हैं जो गर्भ में मातृक कर्म (मां के संस्कार), पितृक कर्म (पिता के बीज) और जीवात्मा के प्रारब्ध को मिलाकर शिशु के भविष्य का निर्माण करते हैं। चालीस पात्रों में भरा सोम जब सन्तुलित होता है, तब सृष्टि करता है और जब असन्तुलित होता है तो क्षय करता है। शतपथ ब्रह्माण में कहा गया है-सोमो वै रेत:। यज्ञ में सोम रस निकालना और उसे पात्रों में भरना वस्तुत: वीर्य को गर्भ में स्थापित करने का वैदिक रूपक है।
गर्भ में इन 38 धाराओं का प्रभाव मूलत: 3 गुणों से प्रभावित रहता है। गर्भ में हर क्षण में देव और असुर भावों का संघर्ष चलता रहता है। यह बाहरी युद्ध नहीं बल्कि मां के भीतर चलने वाली सूक्ष्म क्रियाएं हैं। सत्व प्रधान अवस्था में शिशु को समय पर पोषण मिलता है, अंग-प्रत्यंग ठीक बनते हैं, मां का मन शांत और भयमुक्त रहता है। प्रसव समय पर और सहज प्रक्रिया से होता है। राजसिक अवस्था में गर्भ में असामान्य रूप से तेज या कम हलचल महसूस की जा सकती है। मां में चिड़चिड़ापन, बैचेनी और घबराहट बढऩे लगती है। इस कारण समय पूर्व प्रसव होने की आशंका बढ़ जाती है। तमो गुण जब प्रभावी होता है तब आलस्य, अवसाद और नकारात्मक भाव ही मां को घेरते हैं। जिसका सीधा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है। उसके पोषण में रुकावट आने से शिशु का विकास पूर्णभाव में नहीं हो पाता। विकृति की संभावना बढ़ जाती है।
वैद्यकीय दृष्टि से गर्भकाल मूलत: 40 सप्ताह अर्थात दस महीने का होता है। संवत्सर चक्र में छ: ऋतुओं का दो-दो माह का काल माना गया है। वसन्त वह काल है जब प्रजनन यज्ञ का प्रारंभ होता है। इसे मधुमास भी कहते हैं। सर्वत्र माधुर्य का वर्षण, प्रकृति के मातृत्व भाव के प्रस्फुटन और सृष्टि का कारक काल होने से यह काल विशिष्ट बन जाता है। वसन्त का परिपाक मूलरूप से दस मास पश्चात् ही पूर्ण होता है। सूक्ष्म ही स्थूल रूप में परिणत होता है। यही दस मास की अवधि मानवोत्पत्ति में भी है। यहां दस मास में ही गर्भस्थ शिशु पूर्ण विकसित होकर भूमिष्ठ होता है।
क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com
Updated on:
12 Sept 2026 11:53 am
Published on:
12 Sept 2026 11:53 am
