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दुनिया का नक्शा केवल पृथ्वी की भौगोलिक तस्वीर नहीं होता, वह हमारी सामूहिक कल्पना में यह भी तय करता है कि कौनसा महाद्वीप कितना बड़ा है, कौनसा क्षेत्र कितना महत्वपूर्ण दिखाई देता है और दुनिया का भौगोलिक संतुलन कैसा नजर आता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 4 सितंबर को पारित 'करेक्ट द मैप' प्रस्ताव ने न तो किसी देश की सीमा बदली है, न किसी महाद्वीप का वास्तविक क्षेत्रफल और न ही पृथ्वी का भूगोल। उसने चुनौती दी है तो दुनिया को देखने की उस दृश्य परंपरा को, जो 457 वर्षों से मुख्यत: जेरार्डस मर्केटर के नाम से जुड़ी रही है।
इस प्रस्ताव में विशेष रूप से 'इक्वल अर्थ' जैसे समान-क्षेत्रफल वाले प्रक्षेपणों को महत्व दिया गया है। यही वह बिंदु है, जिसके कारण सुर्खियां बनी 'अफ्रीका बड़ा हो गया', 'अमरीका छोटा हो गया', 'यूरोप सिकुड़ गया' लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। धरती पर कुछ भी बड़ा या छोटा नहीं हुआ है, केवल धरती को कागज या स्क्रीन पर दिखाने का गणित बदला है। पृथ्वी गोल है जबकि कागज सपाट। इसलिए पृथ्वी की सतह को बिना किसी विकृति के सपाट मानचित्र पर उतारना गणितीय रूप से संभव नहीं है। किसी भी मानचित्र-प्रक्षेपण को क्षेत्रफल, आकृति, दूरी, दिशा या कोण में कुछ न कुछ समझौता करना पड़ता है। इसलिए 'सह' और 'गलत' नक्शे की जगह यह पूछना अधिक वैज्ञानिक है कि किस उद्देश्य के लिए कौनसा प्रक्षेपण अधिक उपयुक्त है। यहीं मर्केटर की ऐतिहासिक उपयोगिता समझना जरूरी है।
फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में ऐसा प्रक्षेपण विकसित किया था, जिसमें दिशा और कोणों का संरक्षण नौवहन के लिए अत्यंत उपयोगी था। आधुनिक मानचित्र-विज्ञान भी इसे 'गलत नक्शा' नहीं कहता, इसकी समस्या तब पैदा होती है, जब इसे पूरी पृथ्वी के क्षेत्रफल की तुलना करने वाले विश्व मानचित्र के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मर्केटर प्रक्षेपण में भूमध्य रेखा से दूर जाते हुए क्षेत्रफल की विकृति तेजी से बढ़ती है। ध्रुवों के निकट स्थित भूभाग आवश्यकता से कहीं अधिक बड़ा दिखाई देता है। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण ग्रीनलैंड है।
वास्तविकता में अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से लगभग 14 गुना अधिक है लेकिन मर्केटर मानचित्र पर दोनों का दृश्य आकार आश्चर्यजनक रूप से तुलनीय दिखाई देता है। ऐसे ही उत्तरी गोलार्ध के उच्च अक्षांशों में स्थित यूरोप, कनाडा, रूस व उत्तरी अमरीका के भूभाग भूमध्यरेखीय क्षेत्रों की तुलना में विशाल दिखाई देते हैं। इसके विपरीत 'इक्वल अर्थ' एक समान-क्षेत्रफल वाला प्रक्षेपण है, जिसे बोयान शाव्रिच, टॉम पैटरसन और बर्नहार्ड जेनी ने 2018 में विकसित किया था। इसका मूल सिद्धांत यह है कि अलग-अलग भूभागों के वास्तविक क्षेत्रफल का आपसी अनुपात मानचित्र पर भी बना रहे। मर्केटर दिशा और कोणों के लिए उपयोगी है जबकि 'इक्वल अर्थ' महाद्वीपों के सापेक्ष क्षेत्रफल की तुलना के लिए।
अफ्रीकी संघ ने फरवरी 2026 में 'इक्वल अर्थ' को अपनाने और सदस्य देशों में इसके उपयोग को बढ़ावा देने का निर्णय किया था। इसके बाद टोगो ने इस अभियान को संयुक्त राष्ट्र तक पहुंचाया। अफ्रीकी संघ के दस्तावेजों में इस पहल को केवल तकनीकी सुधार नहीं बल्कि ज्ञान, प्रतिनिधित्व और अफ्रीका की वैश्विक छवि से जुड़ा प्रश्न माना गया है।
भारत के लिए यह बहस विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया लेकिन विदेश मंत्रालय ने एक आवश्यक अंतर स्पष्ट किया है कि मानचित्र-प्रक्षेपण और राजनीतिक मानचित्रण दो अलग-अलग विषय हैं। समान-क्षेत्रफल वाले प्रक्षेपण का समर्थन करने का अर्थ किसी विवादित सीमा या क्षेत्रीय दावे को स्वीकार करना नहीं है।
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े क्षेत्रों, विशेषकर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का चित्रण भारत के आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप होना चाहिए। साथ ही भारत ने यह भी रेखांकित किया कि संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव किसी विशेष विश्व मानचित्र या किसी विशेष राजनीतिक सीमा को वैधता प्रदान नहीं करता। इससे एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है कि क्षेत्रफल का सही चित्रण और सीमा का राजनीतिक निर्धारण एक ही बात नहीं हैं। कोई प्रक्षेपण महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल का अनुपात बेहतर दिखा सकता है लेकिन वह अपने आप यह तय नहीं करता कि किसी देश की सीमा कहां समाप्त होती है।
प्रश्न यह है कि अमरीका ने इसका विरोध क्यों किया? अमरीकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने मतदान से पहले प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र की व्यापक 'कट्टर वैचारिक परियोजना' से जुड़ा बताया। बहरहाल, 'यूएस छोटा, अफ्रीका बड़ा' जैसी सुर्खियां आकर्षक अवश्य हैं, लेकिन पूरी कहानी नहीं बताती। अमरीका छोटा नहीं हुआ, अफ्रीका बड़ा नहीं हुआ और भारत की सीमाएं भी नहीं बदली, बदला है केवल वह गणितीय माध्यम, जिसके जरिये गोल पृथ्वी को सपाट सतह पर देखने की कोशिश की जाती है। 457 वर्षों बाद इस बहस का वास्तविक महत्व इसी में है। मर्केटर ने अपने समय की एक वास्तविक समस्या (समुद्री नौवहन) का शानदार समाधान दिया था लेकिन किसी तकनीक की उपयोगिता उसके मूल उद्देश्य से बाहर जाते ही बदल सकती है। संयुक्त राष्ट्र का संदेश मर्केटर को 'गलत' घोषित करना नहीं, बल्कि मानचित्र को उसके उद्देश्य के अनुसार चुनने की आवश्यकता पर जोर देना है। धरती वही है, महाद्वीप वही हैं, समुद्र वही हैं और सीमाएं भी अपनी जगह हैं लेकिन दुनिया को देखने वाली हमारी खिड़की बदल सकती है।
(वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)
Updated on:
11 Sept 2026 03:33 pm
Published on:
11 Sept 2026 03:33 pm
