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पीजी के बढ़ते बाजार में विद्यार्थियों की सुरक्षा कौन देखेगा?

अनुमतियां निर्माण के तय चरणों पर होने वाले निरीक्षणों से बंधी होती हैं। ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट तय करता है कि इमारत का कानूनी इस्तेमाल क्या हो सकता है।
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जयपुर

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Opinion Desk

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प्रवीण कौशल

Sep 10, 2026

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सत्य निकेतन की त्रासदी ने उस समस्या को उजागर कर दिया है, जो बरसों से पनप रही थी। बस, हमने कभी उसके बारे में सोचा ही नहीं। कुछ दिनों पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिणी परिसर के पास सत्य निकेतन में एक पांच मंजिला इमारत गिर गई। उसमें लड़कों का पेइंग गेस्ट आवास चल रहा था। यह घटना कई सवाल खड़े करती है। दरअसल, दिल्ली विश्वविद्यालय में ढाई लाख से अधिक छात्र हैं और हॉस्टल की सीटें हैं करीब नौ हजार। 2022 से दाखिला साझा राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा के जरिये हो रहा है, जिसने विश्वविद्यालय के दरवाजे देशभर के छोटे शहरों और अलग-अलग बोर्डों के छात्रों के लिए खोल दिए। अब उसके आधे से ज्यादा विद्यार्थी दिल्ली के बाहर से आते हैं। दाखिले की नीति बदल गई, आवास की नीति नहीं बदली। यही अंतर एक बाजार बन गया। खबरों के मुताबिक सत्य निकेतन में एक बिस्तर का किराया करीब बारह हजार रुपए महीना है। जिस मकान को छह के बजाय पच्चीस बिस्तरों में ढाला जा सके, वह अपनी मूल बनावट की कमाई से कई गुना कमाता है और हर अतिरिक्त मंजिल, हर पार्टीशन, हर बेसमेंट एक मासिक आमदनी बन जाता है। विद्यार्थियों को तीन चीजें चाहिए- सस्ता किराया, कॉलेज से नजदीकी और आने-जाने का साधन। मालिकों को मुनाफा चाहिए। जहां ये दोनों किसी नियामक की मौजूदगी के बिना मिलते हैं, वहां इमारतें उस सीमा से आगे धकेल दी जाती हैं, जिसके लिए उन्हें बनाया गया।

फिर जवाबदेही का वही ढर्रा है, जहां यह हादसा पुराने राजेंद्र नगर के कोचिंग सेंटर की मौतों से जुड़ जाता है। मालिक गिरफ्तार होते हैं। अधिकारी निलंबित होते है और निलंबन चुपचाप खत्म हो जाते हैं। लेकिन बदला हुआ बेसमेंट, जोड़ी गई पांचवीं मंजिल, पचास नौजवानों के हॉस्टल में तब्दील हो चुका पारिवारिक मकान- ये अदृश्य चीजें नहीं हैं। जिस किसी का कानूनी कर्तव्य इसे देखना था, उसने या तो देखा नहीं या देखकर नजरअंदाज कर दिया। जब तक इस सवाल के साथ कोई नाम नहीं जुड़ता, अनाधिकृत निर्माण मुनाफे का सौदा बना रहेगा, क्योंकि जोखिम पूरी तरह उन लोगों के हिस्से आता है, जो अंदर सो रहे होते हैं। अनुमतियां निर्माण के तय चरणों पर होने वाले निरीक्षणों से बंधी होती हैं। ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट तय करता है कि इमारत का कानूनी इस्तेमाल क्या हो सकता है। रिकॉर्ड सार्वजनिक होते हैं, शिकायतें दर्ज होती हैं और उन पर समय अंकित होता है और मंज़ूरी देने वाला अधिकारी बरसों बाद भी पहचाना जा सकता है।

दिल्ली भी यही कर सकती है। हर शिकायत दर्ज हो, हर निरीक्षण की तारीख हो, हर फैसले पर उस अधिकारी का नाम दर्ज हो जिसने वह फैसला लिया। यह प्रशासनिक सुधार है, विधायी नहीं, और इसे लागू करने के लिए किसी त्रासदी की इजाजत नहीं चाहिए। असुरक्षित पीजी बंद कर देना पूरा जवाब नहीं हो सकता, क्योंकि उन छात्रों को कहीं तो सोना ही है। विश्वविद्यालय और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को आज की मांग का आकलन करके सस्ते विद्यार्थी आवास का विस्तार उस पैमाने पर करना चाहिए, जो दाखिलों से मेल खाता हो। दिल्ली सरकार और नगर निगम को निजी पीजी के लिए एक वास्तविक नियामक व्यवस्था खड़ी करनी चाहिए, जिसमें पंजीकरण, ढांचागत और अग्नि-सुरक्षा प्रमाणन, रहने वालों की अधिकतम संख्या और समय-समय पर निरीक्षण शामिल हों। एक ऑनलाइन सूची हो, जो विद्यार्थियों और अभिभावकों को बताए कि कौनसे परिसर अनुमति प्राप्त हैं। तय सुरक्षा और किराया मानकों के भीतर, विशेष रूप से विद्यार्थियों के लिए बनाए गए निजी आवास की भी जरूरत पड़ेगी।प्रवेश परीक्षा ने यह कमी पैदा नहीं की। उसने बस पुरानी नाकामी को नजरअंदाज करना नामुमकिन बना दिया। जब राष्ट्रीय नीति नौजवानों को एक शहर में लाती है, तो वे सुरक्षित रूप से कहां रहेंगे, यह तय करना नगर निगम के भरोसे छोड़ी जाने वाली बात नहीं है। यह शिक्षा नीति का हिस्सा है और इसे उस दिन से बहुत पहले तय हो जाना चाहिए था जब मलबे को यह दलील देनी पड़े।

(उद्यमी एवं लोक नीति टिप्पणीकार)