
product passport
नि संदेह तीव्रता से बढ़ते औद्योगिक उत्पादन ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, किन्तु साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता दोहन, ऊर्जा की खपत और अपशिष्ट की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। पारंपरिक रैखिक अर्थव्यवस्था 'बनाओ, उपयोग करो और त्याग दो' के मॉडल पर आधारित उत्पाद के उपयोग के बाद उसकी उपयोगिता समाप्त मान ली जाने वाली व्यवस्था के विकल्प के रूप में सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा सामने आई है, जिसका उद्देश्य उत्पादों, सामग्रियों और संसाधनों को अधिकतम समय तक आर्थिक चक्र में बनाए रखना है। इसके लिए मरम्मत, पुन: उपयोग, नवीनीकरण, पुनर्निर्माण और पुनर्चक्रण को प्राथमिकता दी जाती है।
सर्कुलर इकोनॉमी को प्रभावी बनाने के लिए केवल उत्पाद का पुन:उपयोग पर्याप्त नहीं है, इसके निर्माण, सामग्री, घटकों, मरम्मत और पुनर्चक्रण से जुड़ी विश्वसनीय जानकारी भी आवश्यक है। इसी आवश्यकता से डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट की अवधारणा विकसित हुई है। इसे किसी उत्पाद का डिजिटल पहचान-पत्र भी कहा जा सकता है, जिसमें उसके पूरे जीवन-चक्र से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी इन्द्राज रहती है। इसमें निर्माता, प्रयुक्त सामग्री, स्थिरता, रखरखाव, मरम्मत, स्पेयर पाट्र्स, पुन:उपयोग और पुनर्चक्रण संबंधी विवरण सम्मिलित किए जा सकते हैं। उत्पाद अथवा उसकी पैकेजिंग पर उपलब्ध क्यूआर कोड अथवा अन्य डिजिटल माध्यम से इस जानकारी तक सुलभता से पहुंच बनाई जा सकती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट सर्कुलर इकोनॉमी के लिए आवश्यक सूचना-तंत्र तैयार करने में सक्षम है।
डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट सर्कुलर इकोनॉमी को व्यावहारिक बनाता है, जो उत्पाद और सामग्री का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करता है। यह आवश्यक सूचना देकर मरम्मत, पुन: उपयोग और पुनर्चक्रण सुगम बनाता है। इसे सर्कुलर इकोनॉमी की डिजिटल रीढ़ भी कहा जा सकता है। इसका लाभ उपभोक्ताओं तक ही सीमित नहीं है वरन यह निर्माताओं के लिए पारदर्शिता और ट्रेसबिलिटी बढ़ाने का माध्यम भी सिद्ध हो सकता है। साथ ही कच्चे माल, घटक, और निर्माण जानकारी को व्यवस्थित किया जा सकता है, जिससे गुणवत्ता नियंत्रण, संसाधन प्रबंधन, और उत्पाद जीवन चक्र का आकलन सरलता से हो सकेगा। साथ ही मरम्मत व पुनर्निर्माण उद्योग को तकनीकी जानकारी और स्पेयर पाट्र्स की उपलब्धता में भी सहायता मिल सकती है।
भारतीय उद्योगों के लिए गुणवत्ता के साथ-साथ ट्रेसबिलिटी, संसाधन दक्षता, टिकाऊपन और पुनर्चक्रण की क्षमता भी आवश्यक हो गई है। यदि निर्माता प्रारंभ से ही उत्पादों की डिजिटल पहचान और जीवन चक्र जानकारी ठीक से व्यवस्थित कर लें, तो घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा सुदृढ़ हो सकेगी। इससे संसाधनों का श्रेष्ठकर उपयोग होगा और भारतीय उत्पाद विश्वसनीय बनेंगे, साथ ही यह पहल आत्मनिर्भर भारत, डिजिटल भारत और सतत विकास के राष्ट्रीय अभियानों को भी समर्थन देगी।भविष्य में किसी उत्पाद की पहचान केवल उसके नाम या मूल्य से नहीं होगी, अपितु उसके पूरे जीवन-चक्र से होगी। एक छोटे से क्यूआर कोड को स्कैन करके उपभोक्ता उसके निर्माण से लेकर पुनर्चक्रण तक की पूरी जानकारी प्राप्त कर सकेगा। यही पारदर्शिता, जवाबदेही और संसाधनों के प्रति उत्तरदायित्व भविष्य की अर्थव्यवस्था की पहचान बनेगी। सर्कुलर इकोनॉमी केवल पर्यावरण बचाने का विचार मात्र नहीं है, अपितु यह आने वाली पीढिय़ों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखने का एक व्यावहारिक और दायित्वपूर्ण माध्यम है। डिजिटल प्रोडक्ट पासपोर्ट इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकता है।
(एमबीएम विश्वविद्यालय, जोधपुर)
Updated on:
11 Sept 2026 03:44 pm
Published on:
11 Sept 2026 03:42 pm
