
thyroid
कुछ बीमारियां शरीर से ज्यादा हमारी कल्पना पर कब्जा कर लेती हैं। थायरॉइड उनमें से एक है। वजन बढ़े तो सलाह आती है- थायरॉइड चेक कराओ। हाइपोथायरॉइडिज्म हो तो गोभी, फूलगोभी और सोया से दूर रहने को कहा जाता है। कई लोग मान बैठते हैं कि थायरॉइड की बीमारी हो गई तो जिंदगी भर वजन, कमजोरी, बांझपन और दवाओं से संघर्ष ही नियति है। विज्ञान अधिकांश ऐसी धारणाओं का समर्थन नहीं करता। सबसे प्रचलित भ्रम वजन को लेकर है। हाइपोथायरॉइडिज्म से वजन बढ़ सकता है, लेकिन अधिकांश लोगों में यह वृद्धि बहुत अधिक नहीं होती। आमतौर पर कुछ किलो वजन बढ़ता है और उसका कुछ हिस्सा शरीर में नमक और पानी रुकने से होता है। इसलिए यदि वजन 15 या 20 किलो बढ़ गया है, तो पूरा कारण थायरॉइड को मानना ठीक नहीं। उचित थायरॉक्सिन खुराक के बाद टीएसएच और टी4 सामान्य हों, लेकिन मोटापा बना रहे, तो भोजन, शारीरिक गतिविधि, नींद, तनाव, दवाओं, आनुवंशिक प्रवृति और इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसे कारणों को देखना चाहिए।
दूसरा खतरनाक भ्रम है कि थायरॉक्सिन की ज्यादा खुराक वजन कम करा सकती है। जरूरत से अधिक थायरॉक्सिन लेने से चर्बी सुरक्षित तरीके से कम नहीं होती। इसके बजाय तेज धड़कन, हाथ कांपना, कमजोरी, हृदय संबंधी समस्याएं और हड्डियों तथा मांसपेशियों का नुकसान हो सकता है। थायरॉक्सिन हाइपोथायरॉइडिज्म की दवा है, वजन घटाने की नहीं। खानपान को लेकर भी अनावश्यक डर है। गोभी, फूलगोभी, ब्रोकली, सरसों और सोया को अक्सर 'थायरॉइड खराब करने वाला' भोजन बताया जाता है। सोया थायरॉइड ग्रंथि को नष्ट नहीं करता, लेकिन थायरॉक्सिन की गोली के तुरंत बाद या पहले लेने पर उसके अवशोषण को प्रभावित कर सकता है। समाधान सोया बंद करना नहीं, बल्कि दवा और भोजन के बीच पर्याप्त समय रखना है। 'थायरॉइड है, इसलिए बांझपन होगा' जैसी धारणा गलत है और अनावश्यक तनाव पैदा करती है। एक और भ्रम आधुनिक 'वेलनेस' संस्कृति ने पैदा किया है-सेंधा, गुलाबी या हिमालयन नमक को आयोडीनयुक्त नमक से बेहतर मानना। असली प्रश्न है कि नमक पर्याप्त आयोडीन देता है या नहीं। आयोडीन थायरॉइड हार्मोन के निर्माण के लिए अनिवार्य है और गर्भावस्था तथा बचपन में इसकी कमी मस्तिष्क विकास को प्रभावित कर सकती है। आयोडीनयुक्त नमक सार्वजनिक स्वास्थ्य की बड़ी सफलता है। इसलिए गैर-आयोडीनयुक्त नमक अपनाना समझदारी नहीं। ज्यादा आयोडीन भी ठीक नहीं, लक्ष्य पर्याप्तता है, अति नहीं।
थायरॉइड जांच को लेकर भी एक उपयोगी बात समझनी चाहिए। टीएसएच में दिनभर प्राकृतिक उतार-चढ़ाव होता है। इसलिए फॉलोअप जांच लगभग समान समय पर व संभव हो तो सुबह कराना बेहतर है। थायरॉक्सिन लेने वालों में कई बार सुबह की गोली से पहले रक्त का नमूना देना रिपोर्टों की तुलना को अधिक स्पष्ट बना सकता है। बच्चों में थायरॉइड को हल्के में लेना गंभीर गलती हो सकती है। थायरॉइड हार्मोन मस्तिष्क और शारीरिक वृद्धि के लिए जरूरी है। यदि किसी बच्चे की लंबाई अपेक्षित गति से नहीं बढ़ रही, वजन असामान्य रूप से बढ़ रहा है, वह सुस्त है, लगातार कब्ज रहता है या युवावस्था देर से शुरू हो रही है, तो उचित मूल्यांकन जरूरी है। लंबाई और वजन हर वर्ष ग्रोथ चार्ट पर दर्ज करना चाहिए। वृद्धि बचपन का महत्वपूर्ण जैविक संकेत है। सबसे संवेदनशील मामला नवजात शिशुओं का है। जन्मजात हाइपोथायरॉइडिज्म मिलने पर मां अक्सर स्वयं को दोष देने लगती है। अधिकांश मामलों में यह धारणा गलत है। अच्छी चिकित्सा केवल बीमारी का इलाज नहीं करती, वह डर, अपराधबोध और भ्रम भी दूर करती है।
(स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ) , (वरिष्ठ चिकित्सक)
Updated on:
12 Sept 2026 06:50 pm
Published on:
12 Sept 2026 06:50 pm
