घर परिवार चलाने के लिए आजीविका की तलाश सब करते हैं। लेकिन आजीविका की इस तलाश में अपनी माटी से ही नाता टूटने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है।
घर परिवार चलाने के लिए आजीविका की तलाश सब करते हैं। लेकिन आजीविका की इस तलाश में अपनी माटी से ही नाता टूटने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है। प्रदेश के डूंगरपुर, बांसवाड़ा व वागड़ इलाकों में स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध होने का संकट इतना भयावह है कि गांव के गांव खाली होते दिख रहे हैं।
बड़ी संख्या में परिवार यहां से गुजरात और महाराष्ट्र की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। यह तो तब है कि सरकार ने रोजगार गारंटी को लेकर नियम-कायदे तक बरसों से बना रखे हैं। इन नियमों का फायदा पूरी तरह मिलता दिखे तो भला लोग दूसरे प्रदेशों का रुख क्यों करें? मनरेगा जैसे कानून गांवों को आत्मनिर्भर बनाने और पलायन रोकने के लिए ही बनाए गए थे। आदिवासी इलाकों में होली व दिवाली अब सिर्फ त्योहार नहीं रहे, पलायन के कैलेंडर बन चुके हैं। सवाल है कि जब 'काम का अधिकार' कानून में दर्ज है, तो फिर मजबूरी क्यों?
सरकार ने हाल में विकसित भारत- रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन ग्रामीण (बीवी-जी राम जी) के तहत काम के दिन 100 से बढ़ाकर 125 करने का ऐलान किया। समस्या योजना की मंशा में नहीं, उसके क्रियान्वयन की आत्मा में है। 'मांग आधारित रोजगार' के सिद्धांत को अब 'बजट आधारित प्रबंधन' ने निगल लिया है। होना तो यह चाहिए कि काम तब मिले जब मजदूर मांग करे, लेकिन अब काम तभी मिलता है जब बजट अनुमति दे।
यही कारण है कि बांसवाड़ा जैसे जिलों में तीन महीनों में ही मानव दिवस 76 प्रतिशत तक गिर गए। पिछले पांच वर्षों में बजट घटा, श्रमिकों की संख्या 46.5 प्रतिशत घटी और औसत मानव दिवस भी लगातार नीचे आया। यह संकट सिर्फ आर्थिक ही नहीं, सामाजिक भी है। पलायन से गांवों का सामाजिक ढांचा टूटता है। बच्चों की पढ़ाई छूटती है, महिलाओं की सुरक्षा प्रभावित होती है और बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं। क्या यही 'विकसित भारत' की तस्वीर है? रोजगार की गारंटी देने वाली किसी भी योजना को पूरी तरह से मांग आधारित बनाना होगा।
आशीष जोशी: ashish.joshi@in.patrika.com