राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चंद्र कुलिश के लेखों से प्रेरित होकर कोटा की कम्पोजर कॉलोनी निवासी हेरराज भार्गव ने 44 साल पहले पत्रिका का संग्रह शुरू किया और आज उनके घर में अलमारी लाइब्रेरी तैयार हो चुकी है।
जयपुर। राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चंद्र कुलिश के लेखों से प्रेरित होकर कोटा की कम्पोजर कॉलोनी निवासी हेरराज भार्गव ने 44 साल पहले पत्रिका का संग्रह शुरू किया और आज उनके घर में अलमारी लाइब्रेरी तैयार हो चुकी है। हेरराज भार्गव 1982 के आसपास आईटीआई में पढ़ाई करते थे। उस समय धान मंडी क्षेत्र में रेलवे स्टेशन के पास चाय पीने जाते थे, वहां राजस्थान पत्रिका भी आती थी।
वहीं कुलिशजी के लेख और सम्पादकीय उन्हें इतने अच्छे लगे कि उन्होंने हर दिन राजस्थान पत्रिका मंगाना शुरू कर दिया। समय के साथ यह लगाव संग्रह में बदल गया। उन्होंने 1982 से अब तक के कई राजस्थान पत्रिका के संस्करण सहेज रखे हैं। पत्रिका में प्रकाशित प्रेरक प्रसंग, सामाजिक सरोकार से जुड़ी खबरें और ‘आओ गांव चलें’ जैसे अभियानों की कटिंग्स अलग से सुरक्षित रखी हैं।
उनके अनुसार, पत्रिका की खबरों के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी दिखाई देती है। वे हर 9 जनवरी को कुलिशजी की पुण्यतिथि पर सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्यक्रम करते हैं, उनकी आवाज में समाचार वीडियो सुनाते हैं और धरोहरों राजस्थान अभियान से प्रेरित होकर आज भी पत्राचार करते हैं। उनके अनुसार, राजस्थान पत्रिका की बात ही अलग है।
प्रेषक : हेरराज भार्गव, कोटा
मरुधरा की रेत में जब सच की पगडंडी धुंधली थी।
जब शब्द बिक रहे थे बाजार में और आवाज संकुचित थी।
तब एक फकीर उठा, आंधियों से जिसने मशालों को जिया।
वह थे कर्पूर चंद्र कुलिश, जिन्होंने कलम को न झुकने दिया।
उन्होंने स्याही को साहस दिया, हर अक्षर को आत्मा दी।
पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, एक पावन तपस्या दी।
राजस्थान पत्रिका बनी जननी, जैसे नभ में कोई सूर्य खिला हो।
हर पृष्ठ बना जन-मन की धड़कन, हर शब्द सत्य की शपथ कहे।
यह पत्र नहीं… शहर है, यह कागज नहीं… आकाश है।
अन्याय जहां भी सिर उठाए, वहां इसका नैतिक अंजल है।
कुलिश जी का स्वप्न आज भी हर शीर्षक में जीवित है।
हर पृष्ठ में उनका साहस, हर संवाद में विचारों की शक्ति है।
हम नई पीढ़ी हैं जब हाथों में यह विरासत आती है।
तो पृष्ठ भर की बात नहीं जिम्मेदारी साथ निभाती है।
नाम अगर द्रौपदी है हंस अकेला कौन सा धर्म हुआ।
स्याही जो सच रच जाए, उसे हर युग में जलाया गया।
जब सत्ता की आंधी चली और सच के दीपक बुझे थे।
तब कुलिश की कलम चली, जैसे रण में कोई शंख बजे थे।
शब्दों में जिसमें प्राण फूंके, वह सूरज ढलता नहीं।
सत्य की स्याही से लिखा नाम कभी धुंधला पड़ता नहीं।
झूठ-भय के गूंजते वन में निर्भीक स्वर की ज्योति।
कुलिश के आदर्शों में बसता है पत्रकारिता का सम्मान।
कुलिश केवल इतिहास नहीं एक जागरण की लौ हैं।
सच लिखना ही सच्ची श्रद्धांजलि, यही क्लिश कहानी है।
सुरभि खींची, जोधपुर