
हवाई किराये पर कैपिंग नहीं करने का सरकार का फैसला एक सीमा तक इसलिए समझ में आता है क्योंकि विमान सेवाओं का संचालन महंगा और जोखिम वाला कारोबार है। ईंधन, विमान के रखरखाव, कर्मचारियों और संचालन से जुड़ी लागत बढ़ती है तो किराया बढऩा भी स्वाभाविक है। लेकिन मुनाफे की कोई सीमा तो रखनी ही होगी। त्योहारों-छुट्टियों जैसे मौकों पर जब मांग बढ़ती है और सीटें सीमित होती हैं तो बाजार किराया बढ़ाता है। लेकिन जब सामान्य दिनों के मुकाबले यह किराया कई गुना हो जाए तो इसे क्या कहेंगे? सुप्रीम कोर्ट में 700 फीसदी हवाई किराया बढऩे की शिकायत वाली याचिका से साफ है कि यह कह देना पर्याप्त नहीं कि मांग ज्यादा है, इसलिए कीमत ज्यादा है। नई व्यवस्था में भी सरकार ने सामान्य परिस्थितियों में किराये को बाजार पर छोड़ा है, लेकिन असाधारण परिस्थिति में हस्तक्षेप का अधिकार रखा है।
ऐसे में सवाल यह होना चाहिए कि विमानन कंपनियों को घाटे से बचाना तो जरूरी है, लेकिन यात्रियों को असाधारण मुनाफाखोरी से कौन बचाएगा? बढ़े हुए किराये में वास्तविक लागत कितनी बढ़ी और मुनाफा कितना, यह कौन पूछेगा? यही वह सवाल है, जिसे हमने बाजार की आजादी के नाम पर लगभग पूछना ही छोड़ दिया है। निजी अस्पताल में इलाज की कीमत, निजी स्कूल की फीस, बिजली कंपनी की दर- हर जगह लागत और मुनाफे का सवाल उठता है। वाजिब तर्क है कि कारोबारी नुकसान किसी को नहीं होना चाहिए। लेकिन उसके बाद दूसरा सवाल भी उतनी ही मजबूती से पूछा जाना चाहिए- आखिर कितना मुनाफा? बाजार का स्वभाव अधिक से अधिक मुनाफा कमाना है। दिल्ली में बिजली कंपनियों के खातों और लागत की जांच को लेकर हुई बहस ने भी इसी बुनियादी सवाल को सामने रखा था- उपभोक्ता से वसूली जाने वाली रकम में वास्तविक लागत कितनी है, उचित रिटर्न कितना है और अतिरिक्त भार कितना? ऐसे मामलों में ऑडिट और पारदर्शिता कारोबार के खिलाफ कदम नहीं हैं। बल्कि वे यह सुनिश्चित करने का तरीका है कि बाजार में प्रतिस्पर्धा और मुनाफे की आजादी उपभोक्ता के शोषण में न बदल जाए। सवाल यही है कि सरकार लागत की पारदर्शिता, उचित रिटर्न, असाधारण मार्जिन व अचानक बढ़े किराये के बीच संबंध की जांच क्यों नहीं कर सकती? अगर किसी रूट पर लागत 20-30त्न बढ़ी है लेकिन किराया 300-700त्न बढ़ जाता है, तो उस अंतर का हिसाब तो लिया ही जाना चाहिए।
असाधारण बढ़ोतरी की स्थिति में जब भी सरकार हस्तक्षेप करे तो उसकी कसौटी सिर्फ उपलब्ध सीटें और बढ़ी हुई मांग नहीं, बल्कि असामान्य मूल्य-वृद्धि और उसके पीछे का मुनाफा भी होना चाहिए। बाजार को कीमत तय करने की आजादी दीजिए, लेकिन कीमत के भीतर छिपे मुनाफे का हिसाब मांगने का अधिकार उपभोक्ता से मत छीनिए।