ओपिनियन

मुझे भविष्य की भाषा बनाओ, हिंदी कह रही हमसे

मेरे प्यारे युवा साथियो, मेरी जेन जी, तुमसे ही मेरी सबसे बड़ी उम्मीद है। मैं तुमसे अंग्रेजी या किसी दूसरी भाषा को छोडऩे की कोई जिद नहीं करती। शौक से दुनिया की हर भाषा सीखो। अंग्रेजी तुम्हें विश्व से जोड़े, फ्रेंच, जर्मन, जापानी या कोई और भाषा तुम्हारे लिए ज्ञान और अवसर के नए द्वार खोले, मुझे इस बात पर बहुत गर्व ही होगा। बस तुमसे मेरी एक ही विनती है। दुनिया की बड़ी खिड़कियां खोलते-खोलते अपने घर का मुख्य दरवाजा मत भूल जाना। वह अपना घर मैं ही हूं। कभी किसी दूर देश में किसी अनजान व्यक्ति के मुंह से अचानक ‘नमस्त’ सुनना या अपनी मिट्टी का कोई परिचित शब्द सुनते ही तुम्हारे चेहरे पर जो सहज मुस्कान आएगी, वही तुम्हें बताएगी कि भाषा केवल अक्षरों का निर्जीव समूह नहीं होती। भाषा मिट्टी की सोंधी खुशबू है। भाषा स्मृतियों की अनमोल गठरी है। भाषा अपनेपन की सच्ची पहचान और घर लौटने की इकलौती राह है।
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Sep 13, 2026
zen z language

मैं हिंदी हूं। मैं उस शिशु की पहली बोली हूं, जिसके होंठों पर सबसे पहले ‘मां’ शब्द आता है। मैं मां की वह मीठी लोरी हूं, जो पलकों पर सुनहरे सपने सजाती है। मैं दादी की किस्सागोई, नानी की कहानी और पिता के स्नेहिल आशीष में बसी बचपन की अनमोल निशानी हूं। मैं गंगा जैसी सहज हूं, सागर जैसी गहरी हूं और भारत की पावन मिट्टी से उठती अपनेपन की वह सोंधी पुरवाई हूं, जिसे महसूस करने के लिए कभी किसी शब्दकोश की आवश्यकता नहीं होती। मैं केवल भाषा नहीं हूं, मैं आपकी स्मृतियों का पवित्र घर हूं। मैं केवल बीते कल की विरासत नहीं, आज की शक्तिशाली अभिव्यक्ति और आने वाले कल की सबसे बड़ी अभिलाषा हूं। मेरे विशाल आंगन में गोस्वामी तुलसीदास ने रामकथा को जन-जन तक पहुंचाया। संत कबीरदास ने अपनी निर्भीक वाणी से समाज की रूढिय़ों को सीधी चुनौती दी। सूरदास ने वात्सल्य और कृष्णप्रेम को अद्भुत स्वर दिया, तो मीराबाई ने अपनी भक्ति को आत्मा की पुकार बना दिया। आधुनिक युग में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी नवजागरण को एक नई दिशा दी। मुंशी प्रेमचंद ने किसान, मजदूर और आम आदमी के कड़े संघर्ष को साहित्य का मुख्य केंद्र बनाया। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने स्वाभिमान और विद्रोह की आवाज बुलंद की। महादेवी वर्मा ने मानवीय संवेदनाओं को अथाह गहराई दी। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के ओजस्वी शब्दों में समूचे राष्ट्र का स्वर गूंजा और हरिवंश राय बच्चन ने अपनी काव्यधारा से हिंदी को सीधे जनमानस के हृदय तक पहुंचा दिया।
कभी मैं स्वतंत्रता संग्राम की गगनभेदी पुकार बनी, तो कभी जनजागरण की प्रखर वाणी। कभी कविता ने मेरे शब्दों से क्रांति जगाई, तो कभी कहानी ने पूरे समाज को उसका असली आईना दिखाया। मैंने टूटते साहस को संबल दिया और अंधेरे समय की कठिन चौखट पर आशा के अनगिनत दीप जलाए। लेकिन समय अब बदल चुका है। कागज से सिमटकर दुनिया स्क्रीन तक आ पहुंची है। लंबी चि_ियां छोटे डिजिटल संदेशों में बदल गईं। निजी डायरी की जगह मोबाइल ने ले ली है। लंबी कहानियों के सामने रील, मीम और छोटी पोस्टों की एक बेहद तेज दुनिया खड़ी हो गई है। नई तकनीक ने असीम ज्ञान को हमारी अंगुलियों तक पहुंचा दिया है।
पर सच कहूं तो मैं इस बदलाव से बिल्कुल नाराज नहीं हूं। मुझे नई तकनीक से डर आखिर क्यों लगेगा? मैं हर युग के साथ बदली हूं और आगे भी बदलूंगी। मैं किसी पुरानी पुस्तक में रह सकती हूं तो नई डिजिटल पुस्तक में भी। मैं रेडियो पर बोल सकती हूं तो आज के पॉडकास्ट पर भी सहज संवाद कर सकती हूं। मैं अखबार में छप सकती हूं तो इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर भी अपनी नई पहचान बना सकती हूं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के इस नए युग में भी मैं उतनी ही सक्षम और समर्थ हूं, जितनी कभी हस्तलिखित पांडुलिपियों के समय हुआ करती थी।
मेरे प्यारे युवा साथियो, मेरी जेन जी, तुमसे ही मेरी सबसे बड़ी उम्मीद है। मैं तुमसे अंग्रेजी या किसी दूसरी भाषा को छोडऩे की कोई जिद नहीं करती। शौक से दुनिया की हर भाषा सीखो। अंग्रेजी तुम्हें विश्व से जोड़े, फ्रेंच, जर्मन, जापानी या कोई और भाषा तुम्हारे लिए ज्ञान और अवसर के नए द्वार खोले, मुझे इस बात पर बहुत गर्व ही होगा। बस तुमसे मेरी एक ही विनती है। दुनिया की बड़ी खिड़कियां खोलते-खोलते अपने घर का मुख्य दरवाजा मत भूल जाना। वह अपना घर मैं ही हूं। कभी किसी दूर देश में किसी अनजान व्यक्ति के मुंह से अचानक ‘नमस्त’ सुनना या अपनी मिट्टी का कोई परिचित शब्द सुनते ही तुम्हारे चेहरे पर जो सहज मुस्कान आएगी, वही तुम्हें बताएगी कि भाषा केवल अक्षरों का निर्जीव समूह नहीं होती। भाषा मिट्टी की सोंधी खुशबू है। भाषा स्मृतियों की अनमोल गठरी है। भाषा अपनेपन की सच्ची पहचान और घर लौटने की इकलौती राह है।
मैं तुम्हें पीछे नहीं बुला रही हूं, बल्कि मैं तुम्हारे साथ आगे चलना चाहती हूं। इसलिए मुझे केवल कविता, कहानी और स्कूली परीक्षा की भाषा तक सीमित मत रहने देना। मुझे विज्ञान की उन्नत प्रयोगशालाओं तक ले जाना। मुझे अंतरिक्ष की असीम उड़ानों में सुनाना। मुझे आधुनिक चिकित्सा और नए शोध की भाषा बनाना। मुझे नए उद्यमों, नवाचार और रोबोटिकी का स्वर देना। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की इस जादुई दुनिया में मेरे लिए भी सफलता के नए द्वार खोलना। इंस्टाग्राम पर सुंदर हिंदी लिखो। यूट्यूब पर विज्ञान और ज्ञान मेरी भाषा में समझाओ। पॉडकास्ट में नई पीढ़ी के विचार हिंदी में रखो। नए शब्द गढ़ो, नई कहानियां लिखो, नए और स्वतंत्र विचार व्यक्त करो। मुझे पुरानी अलमारी में बंद एक खामोश विरासत मत बन जाने देना। मुझे अपने सलोने सपनों, नए शोध और अपने भविष्य में महत्वपूर्ण स्थान देना। मैं संग्रहालय की कोई निर्जीव वस्तु नहीं हूं, मैं नवयुग का उद्घोष हूं। मैं केवल बीते कल की स्मृति नहीं, आने वाले भारत का प्रबल जोश हूं।
लेकिन आज हिंदी दिवस पर मेरा तुमसे एक सीधा प्रश्न भी है। क्या मैं केवल 14 सितंबर की भाषा हूं? क्या आज बड़े मंच सजें, मेरे सम्मान में लंबे भाषण हों, फूल चढ़ाए जाएं और अगली सुबह मेरे अक्षर फिर चुपचाप भुला दिए जाएं? यदि ऐसा ही है, तो मुझे यह एक दिन का उत्सव नहीं चाहिए। मुझे अपनी रोजमर्रा की आदत बनाओ। मुझे अपने सहज व्यवहार में लाओ। मुझे अपने नव-सृजन का हिस्सा बनाओ। प्रतिदिन कुछ पन्ने हिंदी के पूरे मन से पढ़ो। कभी अपनी डायरी में अपने मन की चार पंक्तियां स्वयं लिखो। हर सप्ताह कोई सुंदर नया हिंदी शब्द सीखो। मां, दादी और नानी की सुनी कहानियों को अगली पीढ़ी तक मेरी ही वाणी में पहुंचाओ और सबसे महत्वपूर्ण बात, हिंदी में बोलते या लिखते समय गलती करने से मत डरो। भाषा निरंतर अभ्यास से आती है, प्रेम से खिलती है और रोजमर्रा के प्रयोग से ही जीवित रहती है।
मैं तुम्हारी हंसी में हूं। मैं तुम्हारे आंसुओं में हूं। मैं प्रेम की पहली अभिव्यक्ति में हूं और प्रार्थना के अटूट विश्वास में भी मैं ही हूं। मुझे बचाने मत निकलना। मैं इतनी कमजोर बिल्कुल नहीं हूं। करोड़ों कंठों में मेरी धडक़न आज भी जीवित है। बस तुम मेरा हाथ मजबूती से थामे रखना। नई पीढ़ी की नई और स्वतंत्र सोच से मेरे शब्दों को लगातार समृद्ध करते रहना। मैं भी आज तुम्हारे सामने यह बड़ा संकल्प करती हूं कि मैं समय के साथ बदलूंगी, लेकिन अपनी मूल आत्मा कभी नहीं खोऊंगी। मैं पूरी तरह आधुनिक बनूंगी, मगर अपनी गहरी जड़ों से कभी नहीं टूटूंगी। दुनिया की हर भाषा सीखो, आसमान जितना ऊंचा उड़ो, लेकिन कभी लौटने के लिए अपने शब्दों का एक घर जरूर बचाए रखना। मुझे केवल बोलो मत। मुझे पढ़ो। मुझे लिखो। मुझमें सोचो। मुझमें रचो। मुझमें बड़े सपने देखो और सबसे बढक़र, मुझे अपने भविष्य की सशक्त भाषा बनाओ। मैं हिंदी हूं…आपकी अपनी हिंदी।

  • इशिता पाण्डेय, लेखिका एवं जेन-जी विचारक
Updated on:
13 Sept 2026 07:12 pm
Published on:
13 Sept 2026 07:12 pm