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PATRIKA PODCAST : भोग नहीं, जीवन का बोध

आज जहां एक तरफ भौतिक सुख चरम पर है, वहीं आंतरिक मूल्यों का खालीपन गहराता जा रहा है। सांस्कृतिक परम्पराएं आज रूढि़वादिता का हिस्सा बनकर रह गईं। इस परिवेश में हम कैसे सुसंस्कृत संतान की कल्पना कर सकते हैं।
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Gulab Kothari Article : इस परिवेश में हम कैसे सुसंस्कृत संतान की कल्पना कर सकते हैं। मां अपना दायित्व भूल बैठी। सत्ता, पद, अभिजात्य जीवन ही उनको आकृष्ट कर रहा है। संतान के प्रति उनके कत्र्तव्य मात्र सुख सुविधा जुटाकर देने तक ही सीमित हो गया। पिता भी उसी धन-प्राप्ति की अंधी दौड़ में लगा है। परिवार का सुख धन रूप हो गया। स्वस्थ पारिवारिक वातावरण के अभाव में संतानें भी जीवन के प्रति उदारवादी दृष्टिकोण को नहीं समझ पा रही।