ओपन स्कूल से परीक्षाएं पहले भी होती रही हैं लेकिन सबकी पहुंच में यह व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। न ही ओपन स्कूल सिस्टम का समुचित प्रचार-प्रसार हो पा रहा था। यह भी देखने में आ रहा है कि ज्यादातर विद्यार्थी कक्षा में पहली या दूसरी बार फेल होने पर स्थायी रूप से पढ़ाई से नाता तोड़ लेते हैं।
देश के सभी सरकारी हायर सेकंडरी स्कूलों में ओपन एजुकेशन की शुरुआत के फैसले को प्रारंभिक स्तर की शिक्षा में आने वाले बुनियादी अवरोधों को दूर करने की दिशा में ठोस कदम कहा जा सकता है। इस व्यवस्था का सीधा मकसद यही है कि किसी भी एक परीक्षा में विफलता किसी भी विद्यार्थी के भविष्य की राह में बाधा न बने। केंद्र सरकार नए शैक्षणिक सत्र (2026-27) से सरकारी हायर सेकंडरी स्कूलों में 'ओपन एजुकेशन' (मुक्त शिक्षा) की व्यवस्था करने जा रही है। इसके तहत एक ही छत के नीचे सामान्य व ओपन एजुकेशन दोनों केंद्र शुरू होंगे। ऐसे में कोई बच्चा सामान्य शिक्षा में फेल हुआ तो उसे ओपन एजुकेशन के जरिये पास कराने का मौका है।
परीक्षाओं में फेल होने का डर छात्र-छात्राओं में हमेशा बना रहता है। बड़ी संख्या में बच्चों के स्कूल छोडऩे की वजह भी यही रहती है। ओपन स्कूल से परीक्षाएं पहले भी होती रही हैं लेकिन सबकी पहुंच में यह व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। न ही ओपन स्कूल सिस्टम का समुचित प्रचार-प्रसार हो पा रहा था। यह भी देखने में आ रहा है कि ज्यादातर विद्यार्थी कक्षा में पहली या दूसरी बार फेल होने पर स्थायी रूप से पढ़ाई से नाता तोड़ लेते हैं। इसीलिए पांचवी, आठवीं और दसवीं के बाद पढ़ाई छोडऩे वाले विद्यार्थियों की संख्या अधिक है।
नए मॉडल में देश के हर ब्लॉक और पंचायत स्तर पर ओपन एजुकेशन सेंटर भी स्थापित किए जाएंगे, जिनमें फेल या ड्रॉप आउट छात्रों को प्रवेश दिलाकर पास कराया जा सकेगा। इस व्यवस्था में केवल उन्हीं विषयों की परीक्षा दोबारा देनी होगी, जिनमें छात्र अनुत्तीर्ण रहा है। इससे न केवल छात्रों का उत्तीर्ण प्रतिशत बढ़ेगा, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बना रहेगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह प्रयास देश में माध्यमिक स्तर पर मौजूदा लगभग 8.2% की ड्रॉपआउट दर को शून्य पर लाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होंगे। राज्यों की बात करें तो वर्तमान में केरल का सरकारी शिक्षा मॉडल पूरे देश के लिए एक नजीर बना हुआ है। केरल ने न केवल 96त्न से अधिक की साक्षरता दर हासिल की है, बल्कि वहां का समावेशी मॉडल हर तबके के बच्चे को मुख्यधारा से जोडऩे में सफल रहा है।
भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए शिक्षा में कुछ और सुधार करने जरूरी हैं। छठी कक्षा से ही व्यावसायिक कौशल को अनिवार्य करना चाहिए ताकि शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित न रहे। दूरदराज के गांवों तक हाई-स्पीड इंटरनेट और एआइ आधारित शिक्षण उपकरणों की पहुंच जरूरी है। हर स्कूल में काउंसलर की नियुक्ति की जानी चाहिए, ताकि छात्र परीक्षा के तनाव से मुक्त रह सकें। खास बात है कि शिक्षा का मूल मंत्र केवल साक्षर करना नहीं, बल्कि सामथ्र्यवान बनाना है। ओपन एजुकेशन का यह नया अध्याय निश्चित रूप से 'विकसित भारत' के संकल्प को नई ऊर्जा देगा। जब देश का हर बच्चा पढ़ेगा, तभी भारत वैश्विक पटल पर मजबूती से खड़ा होगा।