
डॉ. गौरव बिस्सा
जीवन प्रबंधक विशेषज्ञ
संसार के सबसे पवित्र रिश्तों में से एक मित्रता आजकल मंदी की मार झेल रही है। आज युवा वर्ग ‘फ्रेंडशिप रिसेशन’ अर्थात मित्रता में ‘मंदी की समस्या’ से जूझ रहा है। दोस्ती के संबंध स्वार्थ और कार्यसिद्धि पर आधारित होकर ‘स्वार्थ’ प्रथम को जीते नजर आ रहे हैं। यह एक सामाजिक संकट है। समस्या यह है कि आज के हालात में युवा का कोई सच्चा मित्र मानो है ही नहीं। मन की सुनने वाले, कष्ट में काम आने वाले और परिवार से भी बढक़र साथ देने वाले मित्रों की संख्या नगण्य होती जा रही है। इस कारण युवा वर्ग के सामने यह संकट खड़ा हो गया है कि वह अपनी अंदरूनी भावनाओं को किसके साथ साझा करे? उसके मन और मस्तिष्क का ‘वेंटिलेशन’, अर्थात वैचारिक विनिमय कैसे हो? यह सुनना कष्टप्रद है, लेकिन आज यदि कोई व्यक्ति अपने दस मित्रों की सूची बनाकर यह देखे कि क्या वे उससे निस्वार्थ भाव से जुड़े हैं, तो उत्तर बड़ा कठोर हो सकता है। इसके पीछे स्वार्थपरकता का बढऩा, अहंकार का अत्यधिक भाव और रिश्तों को निभाने के लिए आवश्यक प्रयास न करने की प्रवृत्ति प्रमुख कारण हैं।
बढ़ रहा ‘ह्यूमन लाइब्रेरी’ का प्रचलन
डेनमार्क सहित अनेक यूरोपीय देशों में ‘ह्यूमन लाइब्रेरी’ का प्रचलन बढ़ रहा है। सामान्य लाइब्रेरी में पुस्तक किराए पर ली जाती है, जबकि ह्यूमन लाइब्रेरी में एक व्यक्ति। वह व्यक्ति आपकी भावनाएं सुनता है, आपके मन का दर्द समझता है और आपको खुलकर अपनी बात कहने का अवसर देता है। इससे मानसिक वेंटिलेशन होता है, तनाव कम होता है और मन हल्का हो जाता है। सोचिए, संसार किस स्तर तक मित्रहीन होता जा रहा है? क्या हम भी ऐसी ह्यूमन लाइब्रेरियों के बनने का इंतजार कर रहे हैं?
आखिर आज युवा वर्ग मित्रहीनता का शिकार क्यों हो रहा है? युवा किसी से मिलने या संबंध निभाने से क्यों कतरा रहा है? मित्रों से मेल-मिलाप क्यों कम होता जा रहा है? शोध इन प्रश्नों के उत्तर देता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के अध्ययन के अनुसार, सामाजिक चिंता (सोशल एंग्जायटी) से पीडि़त व्यक्ति को यह डर रहता है कि लोग उसके बारे में नकारात्मक सोचते हैं। आत्मविश्वास की कमी के कारण वह लोगों से मिलने से बचता है। कई बार व्यक्ति अपनी आत्मकेंद्रित मानसिकता के कारण स्वयं की इच्छाओं, प्राथमिकताओं और ज्ञान को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है। ऐसा ‘नार्सिसिस्टिक’ व्यवहार लोगों को उससे दूर कर देता है। जब व्यक्ति यह मान बैठता है कि केवल वही सही है, तो लोग उससे संबंध निभाने में असहज महसूस करने लगते हैं। परिणामस्वरूप रिश्तों में दरार आने लगती है।
युवा हो रहे सामाजिक मेल-मिलाप से दूर
टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की रिपोर्ट के अनुसार, शहरी भारत में डिजिटल बातचीत में 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि आमने-सामने होने वाली सामाजिक बातचीत में 60 प्रतिशत की कमी आई है। यह डिजिटल लत (डिजिटल एडिक्शन) का परिणाम है। काम का दबाव, आर्थिक चुनौतियां और मानसिक थकान भी युवाओं को सामाजिक मेल-मिलाप से दूर कर रही हैं। पारिवारिक और सामाजिक विवाद तनाव को बढ़ाते हैं, जिससे व्यक्ति मित्रों से भी दूरी बनाने लगता है। आज मित्रता सोशल मीडिया तक सीमित होती दिखाई देती है। जीवन की गति इतनी तेज हो गई है कि मानो किसी के पास भावनाओं के लिए समय ही नहीं बचा। ‘मित्र’ अब केवल प्रोफाइल फोटो या व्हाट्सऐप चैट तक सीमित होकर रह गए हैं। यहीं से व्यवहार में रिक्तता, अकेलापन और अवसाद जन्म लेने लगते हैं।
समाधान रिश्तों में वास्तविक जुड़ाव से
इन समस्याओं का समाधान केवल संपर्क बनाए रखने में नहीं, बल्कि रिश्तों में वास्तविक जुड़ाव बढ़ाने में है। परस्पर विश्वास, मित्र की कमियों के बावजूद उसे स्वीकार करना, कठिन समय में उसका साथ देना और बिना किसी स्वार्थ के प्रेम करना, ये मित्रता के आधार स्तंभ हैं। भारतीय परंपरा में जीवन का वास्तविक अर्थ ही साथ मिलकर, समन्वय के साथ जीना माना गया है। विज्ञान भी इस विचार का समर्थन करता है। ग्लासगो यूनिवर्सिटी के शोध के अनुसार, जो लोग अपने प्रियजनों और मित्रों से नियमित रूप से नहीं मिलते, उनमें मृत्यु का जोखिम 77 प्रतिशत अधिक पाया गया। इसी शोध में यह भी सामने आया कि अकेले रहने वालों या मित्रों से न मिलने वालों में हार्ट अटैक की संभावना 53 प्रतिशत अधिक तथा हृदय रोगों से मृत्यु का खतरा 48 प्रतिशत अधिक था।
मित्रों से लगातार जुड़े रहना, केवल संदेश भेजने के बजाय सीधे फोन करना या मिलने जाना, जन्मदिन और वर्षगांठ जैसे अवसरों पर व्यक्तिगत रूप से मिलना तथा छोटे-छोटे उपहारों का आदान-प्रदान करना रिश्तों को मजबूत बनाता है। ‘11-3 का नियम’, अर्थात वर्ष में कम-से-कम 11 बार मिलना और तीन बार लगभग तीन-तीन घंटे साथ बिताना, मित्रता को सशक्त बनाने का एक अच्छा उपाय हो सकता है। कार्य और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाकर अपने भीतर के बच्चे को मित्रों के साथ जीवंत रखना भी रिश्तों को मजबूत करता है।
दिलों का जुड़ाव ही अच्छे रिश्तों का वास्तविक प्राणतत्त्व
परस्पर जुड़ाव बनाए रखने की सबसे बड़ी शर्त है, मित्रों के दोष खोजने की आदत का त्याग। दोषों को लगातार याद रखना व्यक्ति को नकारात्मकता की ओर ले जाता है। एक बुरी बात का अनावश्यक विश्लेषण अनेक नई नकारात्मक धारणाओं को जन्म देता है। इसके बाद व्यक्ति मनगढ़ंत बातें सोचकर स्वयं ही मित्रता को नष्ट करने लगता है। यदि पचास वर्ष का कोई व्यक्ति अपने पुराने मित्र की दस कमियां देखकर उससे रिश्ता तोडऩे की सोच रहा हो, तो उसे यह भी विचार करना चाहिए कि क्या उसके पास फिर से किसी नए मित्र को परखने के लिए अगले पचास वर्ष उपलब्ध हैं? शायद नहीं। इसलिए मित्रता निभाना और रिश्तों को बनाए रखना ही बुद्धिमानी है।
मारवाड़ में एक सुंदर शब्द प्रचलित है ‘छौ’। इसका अर्थ है ‘कोई बात नहीं, जाने दो, क्षमा करो और भूल जाओ।’ यही जीवन-दर्शन हमें क्षमा करना और रिश्तों को बचाए रखना सिखाता है। अंतत:, केवल संपर्क बनाए रखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि दिलों का जुड़ाव ही अच्छे रिश्तों का वास्तविक प्राणतत्त्व है।