
नेपाल में हालिया सांप्रदायिक हिंसा महज कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है। दक्षिणी मैदानी क्षेत्र के सुनसरी और सिरहा में हिंदू धार्मिक आयोजन को लेकर शुरू हुआ विवाद हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच हिंसा में बदल गया, जिसमें कम से कम तीन लोगों की मौत हुई और करीब 25 लोग घायल हुए। कफ्र्यू और सुरक्षा बलों की तैनाती से स्थिति नियंत्रित हुई लेकिन इसने उस देश में एक खतरनाक सामाजिक दरार उजागर कर दी, जो लंबे समय से सामुदायिक सह-अस्तित्व के लिए जाना जाता रहा है। रिपोट्र्स के अनुसार, पिछले आठ वर्षों में तराई क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम तनाव की कम से कम 17 घटनाएं हो चुकी हैं। अधिक चिंताजनक यह है कि धार्मिक तनाव अब पहचान की राजनीति, संस्थागत कमजोरी और प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से बढ़ती निराशा के साथ जुड़ रहा है। प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की प्रतिक्रिया में देरी ने उनकी नई सरकार की गंभीर कमजोरियों को उजागर किया है। इनमें राजनीतिक प्रतिक्रिया में सुस्ती, प्रशासनिक अनुभव की कमी और स्थिति बिगडऩे के बाद सुरक्षा उपायों पर निर्भरता प्रमुख हैं।
सुनसरी में 26 जुलाई को हिंसा शुरू हुई, लेकिन शाह शुरुआत में काफी हद तक मौन रहे। धार्मिक झंडों और तेज संगीत को लेकर शुरू हुआ स्थानीय विवाद मधेश के अन्य हिस्सों तक फैल गया और कफ्र्यू लगाए जाने से पहले तीन लोगों की मौत हो गई। सबसे गंभीर बात यह है कि सरकार ने शुरुआत में इसे सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्या माना, जबकि इसके तेजी से उभरतेे सांप्रदायिक और राजनीतिक आयामों को समय रहते नहीं पहचाना। इससे राष्ट्रीय संकटों से निपटने की शाह की क्षमता पर सवाल उठे हैं। उनकी सरकार पहले ही निर्णयों में देरी, कार्यपालिका के हस्तक्षेप और संस्थागत समन्वय की कमजोरी को लेकर आलोचना झेल रही है। यदि सरकार दोनों समुदायों में विश्वास बहाल करने और भड़काऊ लामबंदी रोकने में विफल रहती है, तो हिंदू राष्ट्र बनाम धर्मनिरपेक्षता का विवाद और धु्रवीकृत हो सकता है। इससे शाह को सत्ता तक पहुंचाने वाली जेन-जी पीढ़ी में भी मोहभंग बढ़ सकता है।
संगीत, धार्मिक झंडों और जुलूसों को लेकर विवाद तत्काल कारण रहा हो सकता है, लेकिन ऐसे विवाद गहरे अविश्वास के बिना आमतौर पर हिंसक नहीं होते। सार्वजनिक स्थानों और धार्मिक अभिव्यक्ति को लेकर प्रतिस्पर्धा तेजी से सांप्रदायिक रंग ले सकती है। सोशल मीडिया ने खतरा और बढ़ा दिया है।अफवाहें, भड़काऊ वीडियो और अपुष्ट दावे प्रशासन की प्रतिक्रिया से कहीं तेजी से फैलते हैं। स्थानीय विवाद देखते ही देखते धार्मिक पीडि़त होने की व्यापक कथा बन सकता है। सुरक्षा बल हिंसा रोक सकते हैं, लेकिन कफ्र्यू आपसी अविश्वास खत्म नहीं कर सकता। नेपाल के लिए सबसे बड़ी क्षति उसके सामाजिक ताने-बाने की हो सकती है। तराई की शांति रोजमर्रा के सामाजिक संपर्क, साझा आर्थिक हितों और स्थानीय स्तर की आपसी समझ पर टिकी रही है। यदि पड़ोसी एक-दूसरे को मुख्यत: धार्मिक पहचान से देखने लगे तो सामान्य विवाद भी विस्फोटक बन सकते हैं।
लंबे समय का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नेपाल की राजनीतिक अस्थिरता को और गहरा कर सकता है। हिंसा ने यह पुराना प्रश्न फिर सामने ला दिया है कि नेपाल धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बना रहे या हिंदू राष्ट्र की पहचान बहाल करे। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन ऐसी मांग तेज कर रहे हैं, जबकि धर्मनिरपेक्ष और गणतांत्रिक ताकतें इसे संवैधानिक बहुलवाद के लिए खतरा मानती हैं। शाह को राज्य को किसी भी पक्ष का राजनीतिक हथियार बनने से रोकना होगा। शाह का उदय नेपाल की पारंपरिक राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ असाधारण जनविद्रोह का परिणाम था। मार्च 2026 के चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने 275 में से 182 सीटें जीतीं और 27 मार्च को शाह प्रधानमंत्री बने। उनकी जीत भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पुराने राजनीतिक प्रतिष्ठान के खिलाफ जेन-जी के आक्रोश का प्रतीक थी। लेकिन राजनीतिक विद्रोह को प्रभावी शासन में बदलना कठिन साबित हो रहा है।
शाह को केवल एक दल को दूसरे दल से बदलने के लिए नहीं चुना गया था। उन्हें पीढ़ीगत परिवर्तन का चेहरा माना गया। लेकिन अनुभव की कमी और राजनीतिक अनिश्चितता ने वादों और प्रदर्शन के बीच खाई बढ़ा दी है। जेन-जी ने पुराने राजनीतिक प्रतिष्ठान को खारिज किया था। यदि उसे जल्द परिणाम नहीं मिले तो वही पीढ़ी नए नेतृत्व से मोहभंग का शिकार हो सकती है। नेपाल की स्थिरता में भारत का हित जुड़ा है। लंबे समय तक सांप्रदायिक तनाव सीमा-पार चिंता, व्यापारिक व्यवधान और सीमा प्रबंधन की कठिनाइयां बढ़ा सकता है। इसलिए भारत को नेपाल के हिंदू राष्ट्र बनाम धर्मनिरपेक्षता विवाद में सीधे खिंचने से बचते हुए स्थिरता, संस्थागत सहयोग और जन-से-जन संबंधों को मजबूत करना होगा। शाह को मिला ऐतिहासिक जनादेश उन्हें नया रास्ता बनाने का अवसर देता है। लेकिन यदि वह राजनीतिक विद्रोह को विश्वसनीय शासन और सामाजिक समरसता में नहीं बदल पाए, तो नए नेपाल का सपना भी उसकी स्थिरता की लंबी तलाश में एक और अधूरा अध्याय बन सकता है।