योजनाएं ऊपर से थोपने के बजाय किसान की भागीदारी से बनें, तभी उनका प्रभाव टिकाऊ होगा। कृषि वैज्ञानिकों को भी अपनी भूमिका पुनर्परिभाषित करनी होगी। देश में शोध की कमी नहीं, पर प्रयोगशाला और खेत के बीच दूरी बनी हुई है।
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, कृषि एवं ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ
औपनिवेशिक काल ने भारतीय कृषि की रीढ़ तोड़ दी। नील की जबरन खेती, बुनकरी सहित कुटीर उद्योगों का विनाश, अन्यायपूर्ण भूमि व्यवस्थाएं और भारी लगान ने किसान को उत्पादनकर्ता से कर्जदार बना दिया। आजादी के बाद उम्मीद थी कि किसान की दशा बदलेगी। सरकारों ने योजनाएं बनाईं, वैज्ञानिकों ने नई किस्में दीं, किसानों ने जी-तोड़ मेहनत की, हरित क्रांति ने उत्पादन बढ़ाया और देश खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर हुआ। लेकिन एक मूल भूल लगातार बनी रही। किसानों के लिए नीतियां बनीं, पर किसानों की सहभागिता के बिना। परिणाम यह हुआ कि योजनाएं कागज पर सफल दिखीं, पर जमीन पर किसान की हालत अपेक्षित रूप से नहीं बदली। आज देश की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है, जबकि कृषि का राष्ट्रीय आय में योगदान लगभग 18 प्रतिशत के आसपास सिमट गया है। 85 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं। खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, पर न्यायसंगत मूल्य अब भी सुनिश्चित नहीं है।
विभिन्न आकलनों के अनुसार देश की लगभग 30-35 प्रतिशत कृषि भूमि उत्पादकता हास और मृदा क्षरण की समस्या से जूझ रही है। खेत बंजर होते जा रहे हैं। सरकार की आयात-निर्यात नीतियां कई बार बाजारोन्मुख रही हैं, जिसकी गाज अंतत: किसानों पर ही गिरती है। सरकारों के सामने पहली आवश्यकता यह है कि कृषि को उत्पादन नहीं, आय के दृष्टिकोण से देखा जाए। तात्कालिक स्तर पर लागत आधारित न्यायकारी मूल्य व्यवस्था, पर्याप्त भंडारण क्षमता, स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा, सिंचाई साधनों का विस्तार, गुणवत्तापूर्ण बीज, खाद और दवाइयों की उपलब्धता तथा किसान की सीधे लाभकारी बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी।
साथ ही कृषि ऋण प्रणाली को सरल और व्यावहारिक बनाना तथा फसल बीमा को वास्तव में भरोसेमंद बनाना भी अत्यंत आवश्यक है। दूरगामी नीति में टिकाऊ खेती को प्रोत्साहन, कृषि को उद्योग जैसी आधारभूत सुविधाएं, जोखिम सुरक्षा, कृषि आदानों और मशीनरी में आत्मनिर्भरता तथा कृषि उत्पादों के लिए निर्यातोन्मुख ढांचा विकसित करना अनिवार्य है। योजनाएं ऊपर से थोपने के बजाय किसान की भागीदारी से बनें, तभी उनका प्रभाव टिकाऊ होगा। कृषि वैज्ञानिकों को भी अपनी भूमिका पुनर्परिभाषित करनी होगी। देश में शोध की कमी नहीं, पर प्रयोगशाला और खेत के बीच दूरी बनी हुई है। तकनीक तभी सफल होगी जब वह छोटे किसान की आय बढ़ाने में सक्षम हो। वैज्ञानिकों को मार्गदर्शक बनना होगा, जो सिर्फ ज्ञान न दें, खेत तक पहुंचकर समाधान भी दें व स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीक विकसित करें। किसान संगठनों को भी केवल विरोध की राजनीति से आगे बढऩा होगा। प्रशिक्षण, सामूहिक विपणन, ब्रांड निर्माण, किसान उत्पादक संगठनों और सहकारी मॉडल को मजबूत करना उनकी सकारात्मक भूमिका हो सकती है। सबसे निर्णायक भूमिका स्वयं किसान की है। अन्य सभी वर्ग समय के साथ बदले, पर किसान अब भी पारंपरिक ढांचे में बंधा हुआ है।
फसल विविधीकरण, सहकारी खेती, बाजार की मांग के अनुरूप संतुलित उत्पादन, नवीन उचित किस्म के बीजों का चुनाव, सस्ती तकनीक का उपयोग, वैज्ञानिक भंडारण पद्धति का उपयोग, अपने उत्पादों का जरूरी मूल्य संवर्धन, प्राकृतिक टिकाऊ खेती तकनीकों का प्रयोग, सीधे उपभोक्ता से जुड़ाव, प्राथमिक प्रसंस्करण और आंचलिक उत्पादों की ब्रांडिंग जैसे कदम किसान को मजदूर से उद्यमी बना सकते हैं। बस्तर में 'मां दंतेश्वरी हर्बल समूह' से जुड़े किसानों ने नवाचार और सामूहिक प्रयासों से यह सिद्ध किया है कि खेती घाटे का पर्याय नहीं, बल्कि आय और रोजगार का मजबूत आधार बन सकती है। ज्ञान, तकनीक और उद्यमशीलता के जरिये ही अगली पीढ़ी को खेती से जोड़ा जा सकता है। सरकार सहयोग दे सकती है, वैज्ञानिक मार्ग दिखा सकते हैं, संगठन मंच बना सकते हैं, लेकिन अपना दीपक किसान को स्वयं बनना होगा। मनीषियों का संदेश 'अप्प दीपो भव' आज पहले से अधिक प्रासंगिक है। जब किसान आत्मनिर्भर, उद्यमी और आत्मविश्वासी बनेगा, तभी भारतीय कृषि की खोई गरिमा लौटेगी।