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पाकिस्तान का दोहरा खेल और भारत को सतर्कता की जरूरत

लेकिन पीछे मुड़कर घटनाओं पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि यह एक बहुआयामी अभियान था। इसका उद्देश्य पाकिस्तान और उसके आतंकी नेटवर्क को उस दुस्साहस का सबक सिखाना था, जो उन्होंने कश्मीर में 26 नागरिकों की हत्या करके किया था। मारे गए लोगों में ज्यादातर पर्यटक थे, जिन्हें उनके धर्म के आधार पर मारा गया।

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May 07, 2026

अरुण जोशी, (दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार) - देश ऑपरेशन सिंदूर की पहली वर्षगांठ मनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। इस सैन्य अभियान ने 7 मई 2025 की तड़के शुरुआत के महज 22 मिनट के भीतर पाकिस्तान के आतंकवादियों और उनके आतंकी ढांचे को ध्वस्त कर दिया था। एक वर्ष बाद, ऑपरेशन सिंदूर केवल सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सशस्त्र बलों की अद्भुत वीरता और रणनीतिक विजय का प्रतीक भर नहीं रह गया है, बल्कि यह आतंकवाद के पीडि़तों को न्याय दिलाने और प्रतिशोध लेने की भारतीय शैली का घोष बन चुका है। फिर भी, बीते एक वर्ष में केवल पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के संदर्भ में भी कई नई चुनौतियां उभरकर सामने आई हैं।

कुछ समय पहले तक यह धारणा थी कि ऑपरेशन सिंदूर केवल पहलगाम के निकट बैसरन घाटी में हुए भीषण आतंकी हमले की प्रतिक्रिया थी। हालांकि यह सच भी है, क्योंकि दक्षिण कश्मीर के इस विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के पास हुए हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। लेकिन पीछे मुड़कर घटनाओं पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि यह एक बहुआयामी अभियान था। इसका उद्देश्य पाकिस्तान और उसके आतंकी नेटवर्क को उस दुस्साहस का सबक सिखाना था, जो उन्होंने कश्मीर में 26 नागरिकों की हत्या करके किया था। मारे गए लोगों में ज्यादातर पर्यटक थे, जिन्हें उनके धर्म के आधार पर मारा गया। छब्बीसवां पीडि़त एक कश्मीरी मुस्लिम था, जिसने इन उन्मादी आतंकवादियों का मुकाबला किया और उनसे भिड़ गया। कश्मीर पिछले 36 वर्षों से आतंकवाद का शिकार रहा है। अनेक अवसरों पर आतंकवादियों ने जिन्ना के द्विराष्ट्र सिद्धांत को पूरा करने के उद्देश्य से लोगों की हत्याएं कीं। लेकिन पहलगाम नरसंहार के मायने अलग थे। यह उस समय हुआ, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व में कश्मीर आतंक की छाया से निकलकर सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहा था। अनुच्छेद 370 और 35-ए की समाप्ति तथा जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन से सामान्य हालात लौटने लगे थे। उस समय कश्मीर में अशांति फैल सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि लोगों को विश्वास था कि देश में एक दृढ़ और साहसी नेतृत्व मौजूद है।

इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। उसने इस गलतफहमी में पहलगाम नरसंहार को अंजाम दिया कि वह बच निकलेगा और कश्मीर के लोग इसका विरोध नहीं करेंगे। लेकिन कश्मीरियों ने पाकिस्तान को गलत साबित कर दिया। वे आतंकी हमले के खिलाफ सड़कों पर उतर आए, गुस्से और पीड़ा के साथ प्रदर्शन किए। आतंकवादियों और उनके संरक्षकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की। यह पाकिस्तान की हरकतों के खिलाफ जनाक्रोश था। नरसंहार के तुरंत बाद यह स्पष्ट हो गया था कि भारत सरकार आतंकवादियों और सीमा पार बैठे उनके आकाओं को कड़ी सजा देगी, साथ ही कश्मीर में हुए आतंकवाद विरोधी प्रदर्शनों ने घाटी को ऑपरेशन सिंदूर के समर्थन में खड़ा कर दिया। कश्मीर ने दिखा दिया कि वह पाकिस्तान के दुष्प्रभाव से मुक्त हो चुका है। देश जब इस अभियान की वर्षगांठ मना रहा है, कुछ बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं। भारत अब आतंकवाद का कोई भी रूप बर्दाश्त नहीं करेगा। 7 मई 2025 की सुबह भारत ने आतंकवाद के प्रति अपनी शून्य सहिष्णुता की नीति को वास्तविकता में बदलते हुए मात्र 22 मिनट में लक्ष्य प्राप्त कर लिया। इसके बाद पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा से सटे जम्मू-कश्मीर के राजौरी और पुंछ क्षेत्रों में गोलाबारी शुरू की, जिसमें स्कूली बच्चों सहित कई नागरिक मारे गए। भारत ने इसका करारा जवाब दिया और पाकिस्तान को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े। अंतत: उसने सैन्य कार्रवाई रोकने की गुहार लगाई।

भारत ने पाकिस्तान की गुहार को स्वीकार करते हुए सैन्य कार्रवाई पर विराम लगाया, लेकिन यह भी स्पष्ट कर दिया कि अभियान समाप्त नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था, 'हमने अपनी जवाबी कार्रवाई को केवल स्थगित किया है।' इसका अर्थ था कि जरूरत पडऩे पर कार्रवाई फिर शुरू की जा सकती है। यह भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान भारत, विशेषकर जम्मू-कश्मीर में अशांति फैलाने की अपनी हरकतें लगातार जारी रखे हुए है। वह यह नैरेटिव भी फैलाता रहता है कि कश्मीर मुद्दा अनसुलझा है, जबकि यह उसका भ्रम है। पहलगाम नरसंहार के बाद उसकी आतंकी गतिविधियां निंदा के दायरे में आ गई हैं। अब पाकिस्तान अमरीका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनने का प्रयास कर रहा है, इसके पीछे उसके भारत-विरोधी इरादे छिपे हैं। उसके सेना प्रमुख आसीम मुनीर की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'शांतिदूतÓ की छवि बनाने की कोशिश की जा रही है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। यह स्थिति दक्षिण एशिया में नए खतरों के संकेत दे रही है।

Published on:
07 May 2026 04:01 pm
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