कुछ अप्रिय घटनाक्रम भी हुए लेकिन नियमों और मान्य परंपराओं की मर्यादाओं को कभी जानबूझ कर ओझल नहीं होने दिया गया। सत्ता-पक्ष और विपक्ष ने एक-दूसरे की सहमति और असहमति का सदैव सम्मान और आदर किया है। फिर अब ऐसा क्या हुआ कि विपक्ष आक्रामकता के चरम पर पहुंच कर मर्यादाओं का ध्यान नहीं रख रहा है?
नरेंद्र सिंह तोमर - अध्यक्ष, मध्य प्रदेश विधानसभा,
भारतीय संसदीय प्रक्रिया उन मानक प्रक्रियाओं में सम्मिलित है जिसका अनुकरण पूरी दुनिया के लोकतंत्र करते हैं। राजशाही और तानाशाही जैसी शासन प्रणाली को छोड़कर लोकतंत्र को अपनाने के उत्सुक देश भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली की ओर श्रद्धा से देखते हैं। विधायिका यानी संसद और विधानसभाओं में होने वाली कार्यवाहियों में लोकतंत्र स्पंदित होता है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में संसद में विपक्ष ने जिस व्यवहार का प्रदर्शन किया है, वह इन कार्यवाहियों में बाधा ही नहीं है अपितु लोकतंत्र को ठेस पहुंचाने वाला कार्य है।
हाल ही लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध लाया गया विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव सदन में खारिज हो गया। यह प्रस्ताव संख्या बल के कारण तो खारिज हुआ ही, इसे तो विपक्ष के मंतव्य के कारण भी खारिज हो जाना था। संसदीय कार्य व्यवस्था नियमों और मान्य परंपराओं से संचालित होती हैं। वह विपक्ष या सत्ता पक्ष की मनमर्जी से संचालित नहीं हो सकती है। संविधान को आत्मार्पित करने के उपरांत अब तक भारतीय लोकतांत्रिक परंपराएं 76 वर्ष की यात्रा पूर्ण कर चुकी हैं। इस अवधि में संसद कई तरह की घटनाओं की साक्षी रही है। हमारी आस्था के केंद्र वरिष्ठ नेताओं की तीखी बहसें, आरोप-प्रत्यारोप, विरोध और असहमतियों के लंबे विमर्श लोकसभा और राज्यसभा के गौरवशाली अतीत में दर्ज हैं। कुछ अप्रिय घटनाक्रम भी हुए लेकिन नियमों और मान्य परंपराओं की मर्यादाओं को कभी जानबूझ कर ओझल नहीं होने दिया गया। सत्ता-पक्ष और विपक्ष ने एक-दूसरे की सहमति और असहमति का सदैव सम्मान और आदर किया है। फिर अब ऐसा क्या हुआ कि विपक्ष आक्रामकता के चरम पर पहुंच कर मर्यादाओं का ध्यान नहीं रख रहा है? यह प्रश्न सामयिक है और इस पर चिंतन होना चाहिए।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के अध्यक्षीय कार्यकाल को देखें तो पाएंगे कि विपक्ष के जिद्दी और आक्रामक रवैये के क्षणों में भी उन्होंने अकल्पनीय संयम, संतुलन और निष्पक्षता का परिचय दिया है। वे नियमों के पालन के प्रति सजग थे और यही सजगता विपक्ष को खटकती रही। विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा में उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया जाता। इस आरोप के जवाब में गृहमंत्री अमित शाह की ओर से प्रस्तुत किए गए तथ्यों को अवश्य देखा जाना चाहिए। गृह मंत्री ने बताया कि 17वीं लोकसभा में कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले 6 गुना अधिक समय मिला। 18वीं लोकसभा में 10 मार्च तक कांग्रेस की ओर से 71 घंटे बोला गया, जबकि उनके 99 सदस्य हैं। भाजपा को 122 घंटे मिले हैं, जबकि भाजपा के 239 सदस्य हैं।
सदन की कार्यवाहियां साक्षी हैं कि अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में ओम बिरला ने निरंतर यह प्रयत्न किया है कि अधिक से अधिक सांसदों को सदन में बोलने का अवसर मिले। युवा सांसदों, पहली बार निर्वाचित होकर आए जनप्रतिनिधि को, महिला सांसदों और संख्या में कम सांसदों को भी पर्याप्त समय देना सुनिश्चित किया गया। ऐसा होने पर ही 17वीं लोकसभा ने लगभग 97 प्रतिशत की कार्य उत्पादकता हासिल की है। यह पिछले दो दशकों की उल्लेखनीय उपलब्धि है। 2019 से अब तक आयोजित 21 सत्रों में से 10 सत्र ऐसे रहे, जिनमें सदन की उत्पादकता 100 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई। वर्ष 2025 के शीतकालीन सत्र में तो लोकसभा ने निर्धारित समय से भी अधिक काम करते हुए 103 प्रतिशत कार्य निष्पादन किया है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के नेतृत्व में होने वाले नवाचारों की सूची विस्तृत है। इसके बाद भी यदि संसद में उनके विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, तो यह सिर्फ एक प्रक्रिया भर नहीं है बल्कि संसदीय परंपराओं पर ही प्रश्नचिह्न है। लोकतंत्र का आदर्श होना किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं है बल्कि यह समवेत प्रयासों का सुफल है। जनप्रतिनिधियों का दायित्व है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को समृद्ध करें, इसका संरक्षण करें, इसे संवर्धित करें लेकिन इसे अशक्त बनाने का कार्य न करें। विपक्ष के अमर्यादित व्यवहार के समक्ष लोकसभा अध्यक्ष का कार्यकाल प्रेरणा और उम्मीद का पर्याय बन गया है।