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बुद्धिमत्ता पर असर डाल रहा वायु प्रदूषण

विकासशील देशों पर प्रदूषण की सबसे ज्यादा मार है। वहां यह नुकसान 19 अंक तक हो सकता है जबकि वैश्विक औसत 1 अंक से 2 अंक के बीच है। सबसे दुखदायी यह है कि 15 साल से कम उम्र के लगभग 2.02 करोड़ बच्चे इस प्रदूषण के शिकार हैं।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 22, 2026

ज्ञानेन्द्र रावत - वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद्,

वायु प्रदूषण अब गंभीर जानलेवा समस्या बन गया है। यह शरीर के हर अंग को प्रभावित कर रहा है। इसका मस्तिष्क पर भी गंभीर असर पड़ रहा है, जिससे डिमेंशिया का खतरा बढ़ गया है। कारण अब वातावरण में मानक से भी ढाई गुणा ज्यादा प्रदूषक कण मौजूद हैं। अब तो वायु प्रदूषण बच्चों की बुद्धिमता पर भी असर डाल रहा है। एनपीजे क्लीन एयर नाम से प्रकाशित शोध में इस तथ्य का खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण के कारण इंसान की सोचने-समझने की शक्ति आइक्यू भी प्रभावित हो रही है। बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने कुल 134 देशों में मौजूद 7800 से अधिक शहरों में सेटेलाइट से सूक्ष्म कणों के लॉन्ग-लीनियर मॉडल का इस्तेमाल कर गणना की कि वायु प्रदूषण का आइक्यू पर कितना असर पड़ सकता है।

वैज्ञानिकों ने अध्ययन के बाद कहा है कि हवा में मौजूद पीएम 2.5 (सूक्ष्म कण) की वजह से पूरी दुनिया की आबादी को 65 अरब आइक्यू अंक का नुकसान हो रहा है। उनके अनुसार पीएम कण इतने सूक्ष्म हैं कि वे शरीर के माध्यम से सीधे मस्तिष्क तक पहुंच रहे हैं। इससे दिमाग में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और सूजन पैदा हो रही है। धूल के इन कणों में कैडमियम, मैगनीज और आर्सेनिक जैसी जहरीली धातुएं होती हैं, जो बच्चों के मानसिक विकास के लिए बेहद हानिकारक हैं। यह खतरनाक स्थिति है। दरअसल वैज्ञानिकों ने यह शोध आइक्यू एक संख्या मानकर किया है जो यह बताती है कि किसी व्यक्ति की सोचने, समझने, तर्क करने और समस्याओं को सुलझाने की क्षमता, उसकी उम्र के अन्य लोगों की तुलना में कितनी है। उन्होंने शोध में पाया कि हवा में मौजूद पीएम 2.5 के हर एक माइक्रोग्राम बढऩे पर आइक्यू स्कोर में कितनी गिरावट आई है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रति व्यक्ति आइक्यू हानि का स्तर उन्नत देशों में ज्यादा है, जहां पीएम 2.5 का स्तर बहुत ज्यादा है। भारत में अत्यधिक प्रदूषण के कारण आइक्यू का नुकसान 20 अंक तक पहुंच गया है। कम और मध्यम आय वाले देश इस संकट की सबसे ज्यादा मार झेल रहे हैं। इस दृष्टि से भारत में नुकसान ज्यादा है।

शोध के अनुसार इससे बच्चों का विकास सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। यही नहीं सूक्ष्म कणों के असर से गर्भवती महिलाओं पर इसका ज्यादा खतरा है। गर्भावस्था के दौरान सूक्ष्म कणों का प्रभाव ( 1 से 6 अंक की हानि) या शराब के सेवन (3 से 7 अंक की हानि) जैसे स्थापित जोखिम कारकों के समान है। विकासशील देशों पर प्रदूषण की सबसे ज्यादा मार है। वहां यह नुकसान 19 अंक तक हो सकता है जबकि वैश्विक औसत 1 अंक से 2 अंक के बीच है। सबसे दुखदायी यह है कि 15 साल से कम उम्र के लगभग 2.02 करोड़ बच्चे इस प्रदूषण के शिकार हैं। हकीकत यह है कि वायु प्रदूषण से हर साल तकरीबन 20 लाख से ज्यादा लोग मौत के मुंह में चले जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज 93 फीसदी बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। जहां तक दिल्ली का सवाल है, वह आज भी सबसे गंभीर वायु प्रदूषण का सामना करने को विवश है। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां पीएम 2.5 का सालाना औसत आज भी सर्वाधिक है। चिंतनीय यह कि यहां पर गंभीर और आपात श्रेणी के वायु गुणवत्ता वाले दिनों की तादाद सबसे ज्यादा दिनों की अवधि तक बनी रहती है। अब तो सर्दियों के दिनों में उत्तरी भारत के मुकाबले साफ माने जाने वाले देश के दक्षिणी राज्यों के प्रमुख शहर चेन्नई और बेंगलूरु में वायु गुणवत्ता बिगडऩे के संकेत मिल रहे हैं जो एक खतरनाक नया जोखिम है। इसके पीछे मौसम को जिम्मेदार बताया जा रहा है।

असलियत में अब वायु प्रदूषण केवल सर्दियों के मौसम का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि सालभर जारी रहने वाला गंभीर स्वास्थ्य खतरा बन चुका है। भारत में सभी श्वसन संबंधी मौतों में से एक तिहाई से अधिक वायु गुणवत्ता से जुड़ी हैं। गौरतलब है कि शुद्ध हवा व पानी अनिवार्य तत्व हैं। जाहिर है इनकी अनिवार्यता का कोई विकल्प नहीं है। इसके लिए संकीर्ण राजनीति और तंत्र की नाकामी जिम्मेदार है। यहां इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता कि आज जब दुनिया के कई शहर प्रदूषण मुक्त हो चुके हैं व वहां की नदियां भी प्रदूषण मुक्त होकर बह रही हैं, उस दशा में हम क्यों नाकाम हो रहे हैं। यह चिंतनीय और विचार का विषय है।